1. सम्पादकीय

आर्थिक और व्यापार नीति विश्लेषक ने किसान दिवस पर क्या कहा, बाजार की मांग के अनुसार खेती क्यों जरूरी?

हेमन्त वर्मा
हेमन्त वर्मा
Kisan Diwas 2020

Kisan Diwas 2020

किसान दिवस के अवसर पर कृषि जागरण द्वारा वर्चुअल प्रोग्राम आयोजित किया गया. इस मौके पर कृषि जागरण और एग्रीकल्चर वर्ल्ड के प्रधान संपादक श्री एम.सी. डॉमिनिक के अलावा पद्मश्री अवार्डी श्री भरत भूषण त्यागी (प्रगतिशील किसान), श्री विजय सरदाना (आर्थिक और व्यापार नीति विश्लेषक), श्री विनोद कुमार गौड़ (अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, नेशनल सीड्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड), श्री आशीष अग्रवाल (प्रमुख - एग्री बिजनेस, बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी), श्री K. U. Thankachen (निदेशक विपणन, राष्ट्रीय रसायन और उर्वरक लिमिटेड.), श्री बसंत कुमार (सीनियर मैनेजर, फ़ार्म इक्विपमेंट एंड पावर सोलुफ़ियन बिज़नेस ग्रीव्स कॉटन लिमिटेड), श्री हरि रजागोपाल (VP- Capital Markets and Strategic Initiatives Samunnati) और श्री जुझार सिंह विर्क (Sr. Vice President Marketing, VST Tillers Tractors Limited) ने अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किए.

किसान दिवस पर कृषि जागरण द्वारा वर्चुअल प्रोग्राम में आर्थिक और व्यापार नीति विश्लेषक के तौर पर श्री विजय सरदाना (Vijay Sardana) ने किसानों और खेती की वर्तमान स्थिति, एमएसपी, कृषि सुधार बिल आदि विषय पर खुलकर अपने विचार प्रस्तुत किए. तो आइये जानते है, श्री विजय सरदाना जी ने क्या कहा.

किसानों और कृषि जागरण के दर्शकों को किसान दिवस पर बधाई (Congratulations to farmers and viewers of Krishi Jagran on Farmers Day)

सबसे पहले तो सरदाना जी ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती पर कृषि जागरण के दर्शकों और देश के किसानों को बधाई दी. इस दौरान उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह जी के जयंती पर जो हम किसान दिवस बनाते हैं, यह इस बात का बहुत क्लियर मैसेज है कि किसान इस देश के लिए महत्वपूर्ण है. इतना ही नहीं उन्होंने आगे कहा कि जब तक किसान है तब तक अनाज है. साथ ही कहा कि हमें इस बात पर ध्यान देना पड़ेगा कि जो हमारा किसान है, जो मेहनत करता है, उसको उसका उचित मूल्य मिले. तभी देश के किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और देश की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा. इसके अलावा ओवरऑल एग्रीकल्चर के अलावा जो इकोनॉमिक्स फेक्टर हैं उनमें भी मांग (डिमांड) बढ़ेगी क्योंकि किसानों की खरीदने की क्षमता (परचेसिंग पावर) बढ़ेगी और यह हमारे सोशल सोसाइटी की इकोनामिक ग्रोथ के लिए और ओवरऑल समृद्धि (पर्सपेक्टिव) के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. 

देश में कृषि उपज की वास्तविक स्थिति (Actual condition of Agriculture produce in the country)

श्री विजय ने कहा कि किसान को भारत में कृषि क्षेत्र में डिमांड सप्लाई की स्थिति (सिचुएशन) क्या है यह बात समझ होगी. उदाहरण के लिए गन्ने किसान आज भी गन्ना उगा रहा है, जबकि इस देश में गन्ना की स्थिति अतिरिक्त उपज (सरप्लस) है. आज देश में गन्ने की अतिरिक्त जरूरत नहीं है यानी जितनी चीनी हम पैदा कर रहे हैं उतनी चीनी की जरूरत नहीं है. उसी प्रकार गेहूं, चावल में हमारे पास स्थिति स्तरप्लस है, दूसरी तरफ हमारे पास ऑयलसीड (तिलहन फसल) की उपज में कमी है, उनमें हमारे पास खाद्य तेल की कमी (शॉर्टेज) है. इसी प्रकार दालों के मामले में भी देश को अतिरिक्त दाले दूसरे देशों से आयात करनी पड़ती है यानि इसकी भी हमारे पास कमी है. अतः बहुत सारे हमारे पास क्षेत्र (सेक्टर) है, जहां पर आयात पर निर्भर हैं और कई चीजें ऐसी है जिसमें देश सरप्लस की स्थिति में है. इन पर बैलेन्स करना जरूरी है, इसीलिए मुझे यह लगता है कि जब से आजादी मिली है, (पिछले 70 सालों से) एक नहीं सभी कानूनों को दोबारा से देखने की जरूरत है क्योंकि यदि हम एक आधा कानून देखेंगे तो असंतुलन (इंबैलेंस) क्रिएट होगा. एक मार्केटिंग कानून है, एमएसपी (MSP) कानून है, टेक्नोलॉजी रिलेटेड कानून है, जितने भी कानून है उन सब को हमें दोबारा विचार करना पड़ेगा कि 21वीं शताब्दी में भारत के लिए क्या ये कानून सही है. किसानों के लिए क्या सही है ये जानना बेहद जरूरी है तभी इस समस्या का समाधान निकलेगा, नहीं तो ऐसे किसान आंदोलन उठते रहेंगे.  

किसानों की मौजूदा स्थिति में सुधार कैसे हो (How to improve the present situation of farmers)

इस समय देश के किसान की हालत किस प्रकार से सुधारी जा सके और किस प्रकार से बदलाव लाया जा सके, जब यह सवाल आर्थिक और व्यापार नीति विश्लेषक श्री विजय सरदाना से पूछा गया तो उन्होने कहा कि बदलाव का एक ही तरीका है वह है उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) और गुणवत्ता (क्वालिटी). प्रोडक्टिविटी और क्वालिटी में हमें नई सोच लाने की जरूरत है एक तरफ हम कहते हैं कि हमें नई टेक्नोलॉजी चाहिए, जब हम नई टेक्नोलॉजी नहीं लाने की बात करते हैं तो हमारी प्रोडक्टिविटी नहीं बढ़ती है. पुराने तरीकों से खेती करने से उत्पादन में लागत बढ़ती है जब हमारी उत्पादन में लागत (कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन) बढ़ती है तो किसान की यह मांग रहती है कि किसानों को एमएससी बढ़ाकर दी जाए और जब सरकार एमएससी बढ़ा देती हैं तो दुनिया में आपका उत्पाद सबसे महंगे हो जाते हैं, और जब उत्पाद महंगे हो जाते हैं तो आपका निर्यात (एक्सपोर्ट) खत्म हो जाता है. जब आपका एक्सपोर्ट खत्म हो जाता है तो डिमांड खत्म हो जाती है. इसके बाद उपज या उत्पाद की कीमत बढ़ने की जगह घटने लगती हैं. अतः यह एक चक्र (सर्किल) है. हमें पहले कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन घटानी होगी दूसरा यह कहना है कि जो MSP का फार्मूला है, वह 70 साल पुराना जो सिस्टम चल रहा है उसमें अब उसकी लाइफ पूरी हो चुकी है. अब हमें नया कुछ सोचना पड़ेगा कि किसानों को हम कैसे इनकम दें, उनकी माली हालत कैसे सुधरे? MSP पर भरोसे में रहेंगे तो किसानों को आने वाले दिनों में और नुकसान होगा. सरकार यदि हर साल एमएसपी बढ़ाएंगी तो अंतरराष्ट्रीय बाजार से हमारे उत्पादन बहुत ज्यादा ऊपर हो जाएंगे. व्यापारी किसानों से माल खरीदने के बजाय दूसरे देशों से आयात में ज्यादा भरोसा करेगा और समस्या ज्यादा गंभीर होती चली जाएंगी.

आर्थिक और व्यापार नीति विश्लेषक श्री विजय सरदाना का कहना है कि एमएसपी की एक्सपायरी डेट आ चुकी है, हम जितना जल्दी इस सच्चाई को समझें उतना अच्छा होगा. बहुत मुश्किल है पॉलीटिशियन के लिए यह बात समझना क्योंकि बहुत आसान है पॉलिटिक्स करना लेकिन किसानी करना इतना आसान नहीं है. यदि हम कृषि (एग्रीकल्चर) को नहीं समझेंगे तो हम देखेंगे कि 4 या 5 साल बाद में यह बहुत बड़ी समस्या हो जाएगी इसीलिए मैं इस बात को बार-बार कह रहा हूं. पूरे एग्रीकल्चर क्षेत्र में रिफॉर्म की आवश्यकता है.

2022 तक किसानों की आय डबल कैसे हो (How to Double Farmers' Income By 2022)

विजय सरदाना जी ने आगे कहा कि 2022 तक जब सरकार किसानों की इनकम डबल करने की बात कहती हैं तो आपको वह सारी सारी बाधाएं हटानी पड़ेगी जिससे किसानों को नुकसान होता है. दूसरी तरफ किसानों की पैदावार बढ़ानी होगी, जिससे किसानों की आमदनी बढ़े, अतः खर्चे कम हो और इनकम बढ़े तभी किसान (फार्मर) की आमदनी अधिक होगी. यह जानना जरूरी है कि एमएसपी से आमदनी डबल नहीं होगी. मेरा यह कहना है कि सबसे पहले हमें यह सोचना पड़ेगा कि किस फसल में आज कितनी प्रोडक्शन है और कितनी उपज की लागत (प्रोडक्शन की कॉस्ट) है और उसकी कॉस्ट कितनी होनी चाहिए ताकि किसानों की आमदनी डबल हो और उस लागत पर पैदा करने के लिए कौन सी टेक्नोलॉजी चाहिए. हमें ये बात स्पष्ट करनी पड़ेगी कि इसमें हम पॉलिटिक्स नहीं कर सकते. किसी को पसंद हो या नहीं लेकिन सच्चाई यह है कि आज के हालात में जिस तरह से हमारी प्रोडक्टिविटी है, इनकम डबल नहीं होगी. दूसरी तरफ क्या हमारे पास ऐसे क्वालिटी कृषि उपज है जो बाजार में ग्राहक (कंजूमर) जिसके डबल पैसे दे सके या हम उसकी प्रोसेसिंग करके डबल पैसा किसान तक पहुंचा सके. जब तक यह दो चीजें नहीं होगी तब तक आप की इनकम डबल नहीं होगी. ये सब कहने से तो होगा नहीं सरकार ने तो सिर्फ मनसा दिखाई है. उसके लिए आपको टेक्नोलॉजी चाहिए, उसके लिए आपको बाजार चाहिए. इन दोनों चीजों में जब सुधार होता है तो इनमें विरोध भी शुरू होता है. ना हम बाजार सुधारना चाहते हैं ना टेक्नोलॉजी सुधारना चाहते हैं लेकिन हम इनकम सुधारना चाहते हैं. किसानों और उनके हितेषी दोनों को ये सोचना होगा कि इनकम कैसे डबल हो? सरकार के पास तो पैसे नहीं है सारी उपज खरीदने के लिए यह भी हमको मानना पड़ेगा.  

कृषि जागरण के दर्शकों के नाम विजय सरदाना का संदेश (Message from Vijay Sardana to the audience of Krishi Jagran)

अगला सवाल जब सरदाना जी से पूछा गया कि आप कृषि जागरण के दर्शकों को क्या संदेश देना चाहेंगे, तो जवाब में उन्होने कहा कि मेरा कहना है कि देश में आबादी बढ़ रही है, जमीन कम होती जा रही है, पानी का स्तर घटता जा रहा है और जमीन की क्वालिटी खराब होती जा रही है. इस हालात में अगर हमें खेती को फायदेमंद बनाना है तो दो काम हमें करने होंगे. एक तो हमें बाजार को समझ कर खेती करनी होगी. उदाहरण के तौर पर किसान आज चना उगा रहा है, गेहूं उगा रहा है मगर बाजार को चाहिए मक्का, सरसों, दाले किसानों को यह सोचना पड़ेगा.

सरकार को यह संदेश देना होगा कि कौनसी फसल उगाएं (The Government has to give the message that which crop to grow)

किसान यदि कहेगा मैं कुछ नहीं बदलना चाहता मुझे तो सिर्फ गेहूं ही उगाने है या गन्ना ही उगाना है तो उगाते रहिए. बाजार में खरीदार कोई नहीं होगा और जब खरीदार नहीं होगा तो आपको यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सरकार खरीदें क्योंकि सरकार ने तो आपको कहा नहीं था, कि ये फसले उगानी है. मुझे लगता है कि सरकार को भी यह मैसेज क्लियर कर देना चाहिए कि किसानों से क्या चाहिए चावल कितना चाहिए, गेहूं कितना चाहिए, चीनी कितने चाहिए. कौनसी अतिरिक्त उपज (Surplus Production) है उन्हें उन किसानों को यह साफ कह देना चाहिए. सरकार को यह साफ कर देना चाहिए कि यह तीन चार पांच फसलें हैं इन्हें सरकार खरीदने को तैयार हैं अगर यदि आप उगाते हैं तो सरकार खरीद पाएगी. मेरे को लगता है कि आज सच बोलने का टाइम आ गया है हमने आज तक एग्रीकल्चर में बहुत पॉलिटिक्स कर ली उसका खामियाजा यह है कि किसान किस तरह, दूसरी तरफ उपभोक्ता किस तरह, तीसरी तरफ देश में सब्सिडी का बिल बढ़ता जा रहा है, और चौथी तरफ से इस संकट (Crisis) का फायदा बिचौलियों ने उठाया है. इसलिए एग्रीकल्चर में आज एक-एक ही तंत्र अधिक काम कर रहा है वह है बिचौलियों का, बाकी सब परेशान है.

उसके बाद भी बिचौलिया तंत्र कोई सुधार की मांग नहीं करता और जिनको सुधार की मांग करनी चाहिए, वे वही कह रहे हैं जो कि बिचौलिया तंत्र (Middleman system) कह रहा है.

अगर हम किसान दिवस मना रहे हैं तो नया सोचना होगा, अगर हम वही करते रहे जो पिछली शताब्दी में कर रहे थे तो इस देश में किसानों की हालत ज्यादा खराब हो जाएगी. अतः किसानों को बदलने की जरूरत है, सोच बदलने की जरूरत है, चाहे वह नई टेक्नोलॉजी हो या मार्केट हो या नया काम करने का तरीका हो. हमें वो सब कुछ अपनाना पड़ेगा जिससे किसानों को फायदा हो.

English Summary: On Farmers Day, Economic & Trade Policy Analyst said that cultivate according to market demand

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