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Monsoon Delay: मानसून की धीमी चाल से खरीफ की बुवाई पिछड़ी, पढ़िए इसका खेती पर पड़ेगा क्या प्रभाव?

कंचन मौर्य
कंचन मौर्य
Kharif Crop

Kharif Crop

मानसून में हुई देरी  देश के अधिकांश किसानों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है. जिन किसानो ने बोवनी कर दी है उनकी फसल पर ख़राब होने का खतरा मंडरा रहा  है और जिन्होंने बोवनी नही की है वो सोच रहे है कि बोवनी करे या नहीं. खरीफ सीजन की फसलों की बुवाई मानसून (Monsoon) पर निर्भर होती है, लेकिन इस साल मानसून (Monsoon) की चाल धीमी हो गई है.

देश के अधिकतर राज्यों में मानसून (Monsoon) की बारिश में देरी हुई, जिसके चलते खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ती दिख रही है. हालांकि, कुछ राज्यों में सामान्य बारिश हुई, लेकिन इसके बावजूद भी मूंग, उड़द और कपास की बुवाई के लिए बहुत कम समय बचा है. इस कारण किसानों के चेहरे मायूस है, क्योंकि मानसून (Monsoon) की देरी से उनकी आय पर प्रभाव पड़ सकता है.

कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले साल इस वक्त तक करीब 588.11 लाख हेक्टेयर के रकबे में खरीफ फसलों की बुवाई हो गई थी. मगर इस साल अभी तक सिर्फ 499.87 लाख हेक्टेयर में ही बुवाई हुई है. मानसून (Monsoon) में देरी की वजह से मूंग, सोयाबीन, धान और कपास समेत सभी खरीफ फसलों की बुवाई पिछड़ गई है.

कम हो रही है बुवाई

पिछले साल खरीफ फसलों की बुवाई काफी अच्छी हुई थी. अगर सोयाबीन की बात करें, तो इसकी बुवाई करीब 92.36 लाख हेक्टयर में की गई थी, लेकिन इस साल अब तक सिर्फ 82.14 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई है. इसके साथ ही मूंग की बुवाई 13.49 लाख हेक्टेयर के रकबे में हुई थी, लेकिन इस साल 11.92 लाख हेक्टेयर तक ही पहुंची है. इसके अलावा कपास की बुवाई भी काफी पिछड़ गई है. बता दें कि खरीफ सीजन की प्रमुख फसल बाजरा भी है, जिसकी बुवाई में भी काफी कम हुई है. अगर पिछले साल की बात करें, तो करीब 25.32 लाख हेक्टेयर जमीन में बाजार बोया गया था, लेकिन इस साल अभी तक सिर्फ 15.74 लाख हेक्टेयर जमीन में ही बुवाई हुई है.

इतना ही नहीं, रिपोर्ट के अनुसार अगर वर्ष 2019-20 में चावल के उत्पादन की बात करें, तो पिछले साल की तुलना में 8.21 प्रतिशत कम आ सकती है. मक्का में करीब 11.86 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है, लेकिन ज्वार के उत्पादन में 1.07 प्रतिशत सुधार होने की संभावना है. अगर गन्ना उत्पादन की बात करें, तो इसमें करीब 21.98 प्रतिशत की कमी आने का अनुमान है.

तिलहन की बुवाई में देरी

इस सीजन में पिछले साल करीब 126.13 लाख हेक्टेयर जमीन में तिलहन की बुवाई हुई थी, लेकिन इस साल करीब 112.55 लाख हेक्टेयर जमीन में तिलहन की बुवाई हो पाई है. इसके अलावा दलहन फसलों की बुवाई 53.35 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जो कि इस साल 52.49 लाख हेक्टेयर तक पहुंची है.

कम बारिश से खेती खराब हुई

10 जुलाई 2021 तक 11 मिलियन हेक्टयेर क्षेत्र में ही धान की बुवाई हुई है. जबकि सामान्य स्थिति में अब तक यह 11.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में होना चाहिए था.इसके साथ-साथ ज्वार,बाजरा जैसे मोटे अनाजों की भी बुवाई मानसून में देरी के कारण प्रभावित हुई है.  देश के कई राज्यों में बारिश की कमी के चलते किसान कम समय में पकने वाली फसलों की बुवाई कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि शायद मानसून की रफ्तार तेज होगी और खेती की मिट्टी में नमी बढ़ पाएगी, जिससे वो बुवाई बढ़ा सकेंगे. कुछ मुख्य राज्यों के मानसून का खरीफ फसलों की बुवाई की स्थिति पर पड़ने वाले असर का आकलन  इस प्रकार है .

उत्तरप्रदेश में फसलों की स्थिति

बात उत्तरप्रदेश की करें तो  राज्य में मानसून ने इस बार एक हफ्ते पहले यानी 13 जून के आसपास ही दस्तक दे दी थी. लेकिन इसका असर सिर्फ पूर्वी यूपी तक ही सीमित होकर रह गया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मानसूनी बारिश का अभी भी बेसब्री से इंतजार है.  एक ओर जहां पूर्वांचल में लगातार हो रही बारिश से लोग बेहाल हैं, तो वहीं पश्चिमी और मध्य यूपी में गर्मी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश खेती किसानी के लिए जाना जाता है.  यहां के किसान बारिश को लेकर आकाश की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं.  इस रीजन में अब तक मानसूनी बारिश नहीं होने से धान और गन्ने की खेती पिछड़ रही है. किसानों को सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और पंपिंग मशीनों का सहारा लेना पड़ रहा है. आसमान से बरस रही तपिश से हरे चारे की फसल करने वाले किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया है. चारे की फसल की बुवाई देरी से होने के कारण पशु पालकों को भी महंगे दाना पानी की मुसीबत झेलनी पडे़गी.

उत्तर प्रदेश के अकेले फरीदाबाद जिले में चरी, बरसीम और रिजका की खेती करने वाले किसानों की संख्या करीब दस हजार है. लगभग 15 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में होने वाली इन फसलों की बुवाई सामान्य तौर पर 20 जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक होती है.  लेकिन आषाढ़ की तपिश से हरे चारे की खेती करने वाले किसान परेशान हैं. विशेषज्ञों की मानें तो इस सप्ताह बरसात नहीं होने की स्थिति में हरे चारे की खेती करने वाले किसानों की परेशानियां और बढेंगी. पशुपालकों को भी आने वाले दिनों महंगा चारा खरीदने के लिए विवश होना पड़ेगा.

देश के कई जिलों में बारिश में देरी से खरीफ फसलों का आच्छादन प्रभावित हुआ है. खासकर धान की रोपाई पिछड़ चुकी है. मक्का को छोड़ अन्य फसलों का रकबा अभी भी थमा हुआ है. अभी तक बारिश को धान के लिए अनुकूल नहीं कहा जा सकता. अभी मानसून में देरी का असर फसलों पर दिखाई दे रहा है.  मानसून में हो रही देरी के कारण जून के प्रथम सप्ताह में बुवाई करने वाले किसान परेशान हैं.  जिन स्थानों पर नहर अथवा सिंचाई के लिए पानी के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. उन कृषि क्षेत्रों में धान की पौध मुरझा रही है.अगर इस सप्ताह बारिश नहीं हुई तो हरे चारे की फसल करने वाले किसानों को खासी दिक्कतें होंगी. हालांकि नहर किनारे के खेतों में ज्यादा परेशानी नहीं होगी. वर्षा में देरी के कारण उत्पादन प्रभावित होगा. वहीं हरे चारा खास तौर पर बाजरा की चरी के दाम बढेंगे.

बिहार में आ गया है  मानसून 

बिहार में मानसून की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में अच्छी है.  बिहार में  समय पर मानसून के आगमन का अनुकूल असर खेती किसानी पर पड़ता है. खरीफ फसल की पैदावार 2016-17 सीजन के बाद बाढ़ या सूखे के कारण काफी प्रभावित हुई है. इस बार बेहतर पैदावार की उम्मीद होगी. इस बार प्री मानसून अच्छा रहा तो समय पर बीज डाल दिए गए हैं.  25 मई से 10 जून तक पांच महीने (लंबी अवधि) वाले धान के लिए इस बार बारिश अच्छी हुई है. 20 जून के आसपास रोपनी का अनुकूल समय होता है. इस समय की अच्छी बारिश काफी हद तक धान की पैदावार को बेहतर बनाती है. मानसून का समय पूर्व आगमन शुभ संकेत है. बस इसके बाद बारिश के बीच लंबा अंतराल न हो.

मध्यप्रदेश में फसलों की स्थिति है खराब

मध्यप्रदेश में मानसून देर से आने के कारण फसलों पर हुए प्रभाव की बात करें तो, बारिश की खेंच किसानों के लिए फिर मुसीबत बनकर खड़ी हो गई है.  इस बार भी मौसम दगा देता नजर आ रहा है.  बारिश की बेरूखी से सोयाबीन संकट में आ गया है. ज्वार और मक्का पर दोबारा बोवनी के बादल छा गए हैं. मानसून मेहरबान नहीं हैं. जिसकी वजह से मध्यप्रदेश में कई स्थानों पर ज्वार और मक्का लेकर दोबारा बोवनी की स्थिति निर्मित हो गई हैं. मानसून की पहली बरिश के बाद किसानों ने क्षेत्र में बोवनी कर दी है, लेकिन मौसम दगा देता नजर आ रहा है. जिससे किसानों के सामने फसल के सूखने की चिंता खड़ी हो गई है. बारिश की लंबी खेंच से कहीं कहीं ज्वार और मक्का की दोबानी बोवनी करना पड़ सकती है.

बारिश नहीं होने से मौसम में गर्माहट हैं और जिसका नतीजा है कि खेतों में नमी कम हो गई है. रोज आसमान में बादल छा रहे हैं, लेकिन बरस नहीं रहे हैं. किसानों ने फसल को बचाने के लिए डोरे चलाना शुरू कर दिया हैं विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो किसानों को सोयाबीन को लेकर भी नुकसान उठाना पड़ सकता है. किसान खेतों में डोरे चला रहे हैं. डोरे चलाने से जमीन मुलायम रहती है. फसल खराब नहीं होती. मौसम की ऐसी बेरूखी में फसल को संबल मिलता है. ज्वार और मक्का को लेकर कुछ क्षेत्रों में खराब होने की बात सामने आई है. कुछ क्षेत्रों में ज्वार व मक्का को लेकर दोबारा बोवनी करने की स्थिति बन रही है. सीहोर और आष्टा के आसपास के क्षेत्रों की सोयबीन की पौध मुरझाने लग गयी है. मध्यप्रदेश मे इस वक्त बारिश की जरूरत है. अगर बरिश में देरी होती है तो ज्वार , मक्का, सोयाबीन सहित खरीफ फसलों की बोवनी पर असर  पड़ेगा. किसानों को सलाह है कि अब जल्द लगने वाली फसल लगाए. डोरे चलाने से भी फायदा होगा

मौसम विभाग का अनुमान

अगर मौसम विभाग के संशोधित अनुमान की मानें, तो देश के सभी इलाकों में मानसून की बारिश 8 जुलाई होनी थी, लेकिन 9 जुलाई तक सिर्फ 229.7 मिमी. बारिश ही हुई. यह 243.6 मिमी. की सामान्य बारिश से 6 प्रतिशत कम है. इस खरीफ मौसम के मोटे अनाजों, दलहन, तिलहन और गन्ने के उत्पादन में और बड़ी गिरावट आ सकती है.

नेशनल बल्क हैंडलिंग कॉर्पोरेशन (एनबीएचसी) की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में बताया गया कि खरीफ सीजन 2019-20 के मोटे अनाज, दालों, तिलहन और गन्ने का उत्पादन पिछले अनुमान की तुलना में क्रमश: 14.14 प्रतिशत, 14.09 प्रतिशत, 53.31 प्रतिशत और 11.07 प्रतिशत रह सकता है.

उपयुक्त जानकारी से साफ होता है कि देश के कई राज्यों में किसान मानसून की दस्तक का इंतजार कर रहे हैं. कई राज्यों में खरीफ फसलों की बोवनी मानसून की देरी से प्रभावित हो रही है. उम्मीद कर सकते है कि बरसात अच्छी हो और आप सब किसान भाइयों की फसल भी अच्छी हो और  फसल का उचित मूल्य पाकर आप सब संपन्न हो.

(खेती संबंधी और जानकारी पढ़ने के लिए कृषि जागरण की हिंदी वेबसाइट पर विजिट करें.)

English Summary: sowing of kharif crops due to delay in monsoon backward

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