भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा नई दिल्ली के गुरुग्राम के शिकोहपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा संचालित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद - कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (राजस्थान) द्वारा क्रियान्वित महत्वपूर्ण आर्या परियोजना के तहत मशरूम उत्पादन तकनीकी पर एक सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें गुरुग्राम ज़िले के पुखरपुर, जसात एवं गुरुग्राम के ग्रामीण अंचल के 15 युवक व युवतियों ने भाग लिया.
इस अवसर पर केंद्र के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बी.के. नंदा ने प्रशिक्षण में भाग लिए सहभागियों के उत्साहवर्धन तथा केंद्र द्वारा हर सम्भव सहयोग किये जाने व मशरूम की खेती को अतिरिक्त आमदनी का माध्यम सुनिस्चित करने के प्रति प्रेरित किया.
प्रशिक्षण कार्यक्रम के कार्डिंनेटर व केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. भरतसिंह ने जानकरी दी कि मशरूम की खेती को कृषि कार्यों के साथ आशानी पूर्वक किया जा सकता है जो कि समन्वित खेती प्रणाली का एक विशेष अंग है. प्रशिक्षण में भाग ले रहे व्यक्तियों को मशरूम ग्रह निर्माण, कम्पोस्ट, केसिंग मिट्टी तैयार करने की विधी, इसके निर्जलीकरण, मशरूम ग्रह में नमी व तापक्रम प्रबंधन, स्पानिंग इत्यादि तकनीकों के साथ साथ, मशरूम हार्वेस्टिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग की विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई.
इस दौरान विशेषज्ञ डॉ. भरत सिंह ने कहा कि मशरूम की खेती के लिए कम लागत से मशरूम ग्रह तैयार कर प्राकृतिक वातावरण में मौसम आधारित वर्ष में 2-3 बार मशरूम की फसल ली जा सकती है, जबकि उच्च तकनीकी युक्त मशरुम गृह निर्माण कर वर्ष में 4-6 बार मशरूम फसलें जैसे श्वेत बटन मशरुम, ढिंगरी मशरुम, दूधिया मशरुम की फसलें लगाकर आमदनी अर्जित की जा सकती है.
कम लागत से मशरुम गृह बनाने के लिए समतल तथा ऊंची उठी हुई जगह, जहां पर पानी का भराव न होता हो वहां पर फसलों के अवशेषों जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का, धान सरकंडा/मूंज के सूखे पूलों व फूंस से झोंपड़ीनुमा मशरूम घर तैयार कर उसके अंदर अलग अलग ऊंचाइयों पर बांस, पॉलीथीन व सुतली का इस्तेमाल कर 3-5 सतहों के रैक तैयार किए जाते हैं. जिन पर गेहूं, जौ या धान के भूसे बनी मशरुम कंपोस्ट में मशरुम बीज जिसे स्पॉन कहते हैं, उसे मिला दिया जाता है.
अब इसे साफ कागज या पारदर्शी व पतली पॉलीथीन से 10-12 दिनों के लिए ढक दिया जाता है, जब पूरी तरह मशरुम जाल/माइसीलियम जाल फैल जाने पर विषेश रूप से तैयार की गई केसिंग मिट्टी 1-1.5 इंच ऊपर से परत चढ़ा दी जाती है. इस प्रक्रिया के 12-15 दिन बाद विशेष रूप से श्वेत बटन मशरुम कटाई कर उपज एवं आमदनी प्राप्त होने लगती है.
श्वेत बटन मशरुम की खेती के लिए सितम्बर से फरवरी तक का मौसम अनूकूल रहता है. अलग अलग मौसम के अनुसार मार्केट में मशरूम के भाव में उतार चढाव जो कि 100 रुपए से लेकर 400 रुपए प्रति किलोग्राम या इससे भी अधिक देखा जा सकता है. जबकि वर्षभर मार्किट में ताजा मशरुम की हमेशा मांग बनी रहती है. ठीक उसी तरह ढिंगरी एवं दूधिया मशरुम की खेती से भी मांग व मार्केट की आवश्यकतानुसार उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है. विशेषज्ञ डॉ. भरत सिंह ने प्रशिक्षिण में भाग ले रहे युवकों को कृषि कार्यों के साथ मशरुम व्यवसाय का संचालन कर कृषिगत आमदनी में बढ़ोतरी के लिए प्रेरित किया.
प्रशिक्षण को सफल वनाने के प्रयासों में केंद्र पर आर्या परियोजना के तहत कार्यरत एसआरएफ राघवेंद्र प्रताप सिंह ने बेहद सहयोग किया. कार्यक्रम के समापन के अवसर पर केंद्र के प्रसार विशेषज्ञ डॉ गौरव पपनै ने प्रशिक्षण के सफल आयोजन के लिए केंद्र के अध्यक्ष, सभी विशेषज्ञों तथा प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया.
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