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भूजल को लेकर IIT की शोध में बड़ा खुलासा, इस फसल के दुष्प्रभाव से बिगड़ी स्थिति

कंचन मौर्य
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Agriculture News

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खरीफ सीजन में अधिकतर किसान धान की खेती करते हैं, लेकिन इसकी खेती से भूजल पर काफी दुष्प्रभाव पड़ता है. अगर पिछले 50 सालों की बात करें, तो भूजल स्तर लगातार नीचे  गिर रहा है. भूजल से जुड़ा यह चौंकाने वाला खुलासा आईआईटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. राजीव सिन्हा ने किया है.

दरअसल, आईआईटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. राजीव सिन्हा ने धान की खेती पर एक शोध किया है. यह शोध पंजाब व हरियाणा के भूजल स्तर को लेकर किया गया है. शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर जल्द ही भूजल प्रबंधन को लेकर उचित रणनीति तैयार नहीं की गई, तो भूजल की स्थिति और भी बेकाबू हो सकती है. यह शोध पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड के निर्देशन में पूरा किया गया. इसे आईआईटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. राजीव सिन्हा और पीएचडी स्कॉलर्स डॉ. सुनील कुमार जोशी की देखरेख में टीम ने किया. भूजल के आधार और इससे मिलने वाली सेवाओं, दोनों के बारे में पर्याप्त समझ का अभाव है. इस लेख में पढ़िए भूजल का महत्व और भूजल संकट के बारे में बताते हैं.

क्या है भूजल?

धरती की सतह के नीचे चट्टानों के कणों के बीच के अंतराकाश में मौजूद जल को भूगर्भीय जल (Groundwater) कहा जाता है. भूजल मीठे पानी के स्रोत के रूप में एक प्राकृतिक संसाधन है, जो कि मानव के लिए जल की प्राप्ति का एक प्रमुख स्रोत है. भूजल के अंतर्गत कुओं और नलकूपों द्वारा पानी निकाला जाता है. भू-जल को भारत में पीने योग्य पानी का सबसे प्रमुख स्रोत माना जाता है. आँकड़ों पर गौर करें तो भू-जल देश के कुल सिंचित क्षेत्र में लगभग 65 प्रतिशत और ग्रामीण पेयजल आपूर्ति में लगभग 85 प्रतिशत योगदान देता है.

क्यों बढ़ा भूजल का संकट?

  • बढ़ती जनसंख्‍या, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की बढ़ती हुई मांग के कारण देश के सीमित भू-जल संसाधन खतरे में हैं. देश के अधिकांश क्षेत्रों में व्‍यापक और अनियंत्रित भू-जल दोहन से इसके स्‍तर में तेज़ी से और व्‍यापक रूप से कमी दर्ज़ की जा रही है.

  • आँकड़ों के मुताबिक भारत विश्व में भू-जल के दोहन के मामले में सबसे आगे है, हालाँकि 1960 के दशक में भू-जल को लेकर देश में यह स्थिति नहीं थी,  जानकारों का मानना है कि हरित क्रांति ने भारत को भू-जल दोहन के मामले में शीर्ष स्थान पर पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

हरियाणा और पंजाब में धान की खेती का क्षेत्र

हरियाणा- धान की खेती का क्षेत्र वर्ष 1966-67 में 192,000 हेक्टेयर था. यह वर्ष 2017-18 में बढ़कर 1422,000 हेक्टेयर हो गया.

पंजाब- धान का क्षेत्र वर्ष 1966-67 में 227,000 हेक्टेयर था, जो कि वर्ष 2017-18 में बढ़कर 3064,000 हेक्टेयर पहुंच गया है.

कृषि की मांग के लिए भूजल का अवशोषण

रिपोर्ट में बताया है कि मौजूदा समय में कृषि बढ़ोत्तरी या कृषि की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, इसलिए कृषि संबंधित मांगो को पूरा करने के लिए भूजल का तेजी से अवशोषण किया जा रहा है. अगर क्षेत्र के आधार पर देखा जाए, तो भूजल में सबसे अधिक गिरावट कुरुक्षेत्र, पटियाला, फतेहाबाद, पानीपत व करनाल में आई है. यह हश्र सिर्फ हरियाणा व पंजाब का नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा किनारे वाले जिलों का भी है.

कैसे ठीक करें स्थिति

प्रो. सिन्हा द्वारा सुझाव दिया गया है कि अगर भूजल की स्थिति को सुधारना है, तो सिंचाई के अन्य साधनों का उपयोग बढ़ाना होगा. वर्षा का जल संचयन किया जाए. उनका मानना है कि अगर अभी भूजल की स्थिति पर ध्यान नहीं दिया, तो आगे परिणाम अच्छे नहीं होंगे.

(खेती संबंधी अधिक जानकारी के लिए कृषि जागरण की हिंदी वेबसाइट के लेखों और ख़बरों को जरुर पढ़ें.)

English Summary: iit kanpur did research on groundwater

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