1. औषधीय फसलें

कम लागत में अधिक मुनाफा चाहते हैं तो करें यह फसल

मनीशा शर्मा
मनीशा शर्मा

कम लागत में अधिक मुनाफा चाहते हैं तो करें यह फसल

भारत में किसानों की आमदनी का मामला हमेशा से ही गंभीर रहा है. इसके पीछे कई वजहें गिनाई जा सकती हैं. सरकार भी किसानों को इस स्थिति से निकालने के लिए कई योजनाएं चला रही है. इसके अलावा किसान खुद भी खेती के परंपरागत तरीकों को छोड़कर नए और कारगर तरीकों से खेती कर सकते हैं और अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं. यहां कुछ ऐसी ही फसलों के बारे में जानकारी दी जा रही है जिनसे किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

खस की खेती

खस एक औषधीय फसल है. जिसकी जड़ों से प्राप्त तेल इत्र, साबुन, कॉस्मेटिक आदि पदार्थों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है. इसके अतिरिक्त तंबाकू, पान मसाला, शीतल पेय पदार्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है.

यह भी पढ़ें- 1.5 लाख रूपये प्रति एकड़ की उपज देती है यह घास

साधारण नाम : खस, वेटीवर

वनस्पतिक नाम : क्राईसोपोगान जिजैनियोइडिस

उन्नत किस्में : के. एस 1, धारिणी, केशरी, गुलाबी, सिमैप खस -15, सिमैप  खस -22

जलवायु : इसकी खेती मुख्य रूप से समशीतोष्ण जलवायु में की जा सकती है.

भूमि : खस की खेती के लिए बलुई दोमट, भारी, बलुई भूमि उपयुक्त होती है. जल भराव व असिंचित क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा सकती है.

प्रवर्धन

खस मुख्यत : कल्लों (सिप्लस) द्वारा लगाई जाती है. 5 -6 माह पुराने खस के कल्ले को 25 -30 से.मी ऊपर से काट देते हैं. उसके बाद क्लम्प (मूंजड़ ) को खोदकर स्लिप को अलग कर देते है.

यह भी पढ़ें- इस औषधीय पौधे की खेती कर 50 हजार की लागत में कमाए सालाना 10 लाख रुपए

पौधा रोपण व भूमि की तैयारी

सामान्य तौर पर इसकी रोपाई जुलाई -अगस्त माह में करते हैं. किन्तु उत्तर भारत में खस की एकवर्षीय फसल के लिए स्लिप रोपण का उपयुक्त समय अक्टूबर- नवंबर एवं फरवरी -मार्च है. रोपाई 50 *50  से.मी. की दूरी पर करनी चाहिए. अंत : अधिक पैदावार के लिए रोपाई 60 *40  से.मी. की दूरी पर करें. भूमि की अच्छी तरह जुताई करके उसमें 10 -15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद डालनी चाहिए.

अंत : फसल -

अक्टूबर-नवंबर में रोपी खस के साथ गेहूं या मसूर तथा जनवरी -फरवरी में रोपी खस के साथ मेंथा  एवं तुलसी की फसल ली जा सकती है. इस प्रकार अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है.

खाद एवं उर्वरक -

खस की फसल में 10 -15 ट्रॉली सड़ी गोबर की खाद तथा 80- 100 कि.ग्रा  नाइट्रोजन, फॉस्फोरस 50-60 किग्रा एवं 40-50 किग्रा  पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है. रोपाई के क्रमश: 30, 60, 90 एवं 120 दिन बाद चार बराबर भागों में नाइट्रोजन की मात्रा दी जाती है.

सिंचाई  

पौधा रोपण के तुरंत बाद पहली सिंचाई करनी चाहिए और फिर आवश्यकता अनुसार 7 -8 सिंचाई करनी चाहिए.

यह भी पढ़ें-  लेमन ग्रास है बेस्ट स्टार्ट-अप !

कटाई -

जड़ो की खुदाई 11 -13 माह में करनी  चाहिए 1 जड़ो की खुदाई दिसंबर एवं जनवरी माह में करना उचित रहता है.

उपज -

जड़ों की उपज 15 -25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर जिससे 18 -25 किग्रा  तेल की प्राप्ति होती है. जड़ों से तेल आसवन द्वारा निकाला जाता है.

आमदनी

इसकी खेती पर प्रति हेक्टेयर 9 लाख रुपए की लागत आती है. जबकि प्रति हेक्टेयर कुल 3 लाख 25 हज़ार रुपए की आमदनी होती है. इस लिहाज से प्रति हेक्टेयर 2 लाख 35 हज़ार रुपए का शुद्ध लाभ ले सकते हैं. इस प्रकार खस की खेती से अच्छी आमदनी ली जा सकती है.

शिवम् तिवारी (एमएससी एग्रीकल्चर)

मोबाइल न. 9554814506

जिला- शाहजहांपुर (उत्तरप्रदेश)

English Summary: If you want more profits in lower cost, then crop it

Like this article?

Hey! I am मनीशा शर्मा. Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

Share your comments

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें. कृषि से संबंधित देशभर की सभी लेटेस्ट ख़बरें मेल पर पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें.

Subscribe Newsletters

Latest feeds

More News