b आलू की खेती करने जा रहे हैं तो ये जानकारी आपके लिए लाभकारी हो सकती है....
  1. बागवानी

आलू की खेती करने जा रहे हैं तो ये जानकारी आपके लिए लाभकारी हो सकती है....

KJ Staff
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Potato Cultivation

आलू को सब्जियों का राजा कहा जाता है. भारत में शायद ही कोई ऐसा रसोई घर होगा, जहाँ पर आलू ना दिखे. इसकी मसालेदार तरकारी, पकौड़ी, चॉट, पापड चिप्स जैसे स्वादिष्ट पकवानों के अलावा अंकल चिप्स, भुजिया और कुरकुरे भी हर जवां के मन को भा रहे हैं, प्रोटीन, स्टार्च, विटामिन सी और के अलावा आलू में अमीनो अम्ल जैसे ट्रिप्टोफेन, ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन आदि काफी मात्रा में पाये जाते है, जो शरीर के विकास के लिए आवश्यक है. 

आलू भारत की सबसे महत्वफपूर्ण फसल है. तमिलनाडु एवं केरल को छोडकर आलू सारे देश में उगाया जाता है. किसान आज से लगभग 7000 साल पहले से आलू उगा रहे हैं. 

जलवायु (Climate)

आलू के लिए छोटे दिनों कि अवस्था आवश्यक होती है भारत के विभिन्न भागों में उचित जलवायु की उपलब्धता के अनुसार किसी न किसी भाग में सारे साल आलू की खेती कि जाती बढ़वार के समय आलू को मध्यिम शीत की आवश्यवकता होती है। मैदानी क्षेत्रो  में बहुधा शीतकाल (रबी) में आलू की खेती प्रचलित है । आलू की वृद्धि एवं विकास के लिए इष्टतम तापक्रम 15- 25 डिग्री सेल्सियस के मध्य होना चाहिए। इसके अंकुरण के लिए लगभग 25 डिग्री सेल्सियस संवर्धन के लिए 20 डिग्री सेल्सियस और कन्द विकास के लिए 17 से 19 डिग्री सेल्सियस तापक्रम की आवश्यकता होती है,  उच्चतर तापक्रम (30 डिग्री सेल्सियस) होने पर आलू  विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है अक्टूबर से मार्च तक,  लम्बी रात्रि तथा चमकीले छोटे दिन आलू बनने और बढ़ने के लिए अच्छे होते है। बदली भरे दिन, वर्षा तथा उच्च आर्द्रता का मौसम आलू की फसल में फफूँद व बैक्टीरिया जनित रोगों को फैलाने के लिए अनुकूल दशायें हैं। 

भूमि (Land)

आलू को क्षारीय मृदा के अलावा सभी प्रकार के मृदाओ में उगाया जा सकता है परन्तु जीवांश युक्त रेतीली दोमट या सिल्टी दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम है भूमि में उचित जल निकास का प्रबंध अति आवश्यक है मिटटी का P H मान 5.2 से 6.5 अत्यंत उपयुक्त पाया गया है - जैसे जैसे यह P H मान ऊपर बढ़ता जाता है दशाएं अच्छी उपज के लिए प्रतिकूल हो जाती है. आलू के कंद मिटटी के अन्दर तैयार होते है, अत मिटटी का भली भांति भुर भूरा होना नितांत आवश्यक है पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करे दूसरी और तीसरी जुताई देसी हल या हीरो से करनी चाहिए यदि खेती में धेले हो तो पाटा चलाकर मिटटी को भुरभुरा बना लेना चाहिए बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है यदि खेत में नमी कि कमी हो तो खेत में पलेवा करके जुताई करनी चाहिए . 

आलू की किस्में (Potato Varieties)

विदेशी किस्में

कुछ विदेशी किस्मो का भारतीय परिस्थियों के लिए अनुकूल किया गया है जिनमे कुछ के नाम निचे दिए गए है..
अपटुडेट, क्रेग्स डिफैंस, प्रेसिडेंट आदि .

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान शिमला द्वारा विकसित किस्मे 

कुफरी चन्द्र मुखी 
 80-90 दिन में तैयार, 200-250 कुंतल उपज

कुफरी अलंकार 

70 दिन में तैयार हो जाती है यह किस्म पछेती अंगमारी रोग के लिए कुछ हद तक प्रतिरोधी है यह प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल उपज देती है .

कुफरी बहार 3792 E

90-110 दिन में लम्बे दिन वाली दशा में 100-135 दिन में तैयार 

कुफरी नवताल G 2524 

 75-85 दिन में तैयार, 200-250  कुंतल/हे उपज 

कुफरी ज्योति 

80 -120 दिन तैयार 150-250 क्विंटल/हे उपज 

कुफरी शीत मान 

100-130 दिन में तैयार 250 क्विंटल/हे उपज 

कुफरी बादशाह

100-120 दिन में तैयार 250-275 क्विंटल/हे उपज 

कुफरी सिंदूरी 

120 से 140 दिन में तैयार 300-400 क्विंटल/हे उपज 

कुफरी देवा

120-125 दिन में तैयार 300-400 क्विंटल/हे उपज 

कुफरी लालिमा

यह शीघ्र तैयार होने वाली किस्म है जो 90-100 दिन में तैयार हो जाती है इसके कंद गोल आँखे कुछ गहरी और छिलका गुलाबी रंग का होता है यह अगेती झुलसा के लिए मध्यम अवरोधी है .

कुफरी लवकर

 100-120 दिन में तैयार 300-400 क्विंटल/हे उपज 

कुफरी स्वर्ण

110 में दिन में तैयार  उपज 300 क्विंटल/हे उपज 

Potato

Potato

आलू की संकर किस्में (Hybrid varieties of potatoes)

कुफरी जवाहर JH 222

90-110 दिन में तैयार  खेतो में अगेता झुलसा और फोम रोग कि यह प्रति रोधी किस्म है यह 250-300 क्विंटल उपज

E 4,486

 135 दिन में तैयार 250-300 क्विंटल उपज, हरियांणा, उत्तर प्रदेश, बिहार पश्चिम बंगाल गुजरात और मध्य प्रदेश में उगाने के लिए उपयोगी

JF 5106 

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रो में उगाने के लिए उपयोगी .75 दिनों की फ़सल, उपज 23-28 टन /हे मिल जाती है 

कुफरी संतुलज J 5857 I

संकर किस्म सिन्धु गंगा मैदानों और पठारी क्षेत्रो में उगाने के लिए, 75 दिनों की फ़सल उपज 23-28 टन/हे उपज 

कुफरी अशोक P 376 J

75 दिनों मेकी फ़सल उपज 23-28 टन / हे मिल जाती है 

JEX -166 C

अवधि 90 दिन में तैयार होने वाली किस्म है 30 टन /हे उपज

आलू की नवीनतम किस्मे    

कुफरी चिप्सोना -1, कुफरी चिप्सोना -2, कुफरी गिरिराज, कुफरी आनंद 

बीज का चुनाव (Seed selection)

आलू के बीज का आकार और उसकी उपज से लाभ का आपस मे गहरा सम्बंध है। बडे माप के बीजों से उपज तो अधिक होती है परन्तु बीज की कीमत अधिक होने से पर्याप्त लाभ नही होता। बहुत छोटे माप का बीज सस्ताक होगा परन्तु  रोगाणुयुक्ता आलू पैदा होने का खतरा बढ जाता है। प्राय: देखा गया है कि रोगयुक्तह फसल में छोटै माप के बीजो का अनुपात अधिक होता है। इसलिए अच्छेक लाभ के लिए 3 से.मी. से 3.5 से.मी.आकार या 30-40 ग्राम भार के आलू को ही बीज के रूप में बोना चाहिए। 

बुवाई का समय एवं बीज की मात्रा (Time of sowing and quantity of seeds)

उत्तर भारत में, जहॉ पाला पडना आम बात है, आलू को बढने के लिए कम समय मिलता है। अगेती बुआई से बढवार के लिए लम्बा समय तो मिल जाता है परन्तुप उपज अधिक नही होती क्योंकि ऐसी अगेती फसल में बढवार व कन्दब का बनना प्रतिकूल तापमान मे होता है साथ ही बीजों के अपूर्ण अंकुरण व सडन का खतरा भी बना रहता है। अत: उत्तर भारत मे आलू की बुवाई इस प्रकार करें कि आलू दिसम्बर के अंत तक पूरा बन जाऐ। उत्तर-पश्चिमी भागों मे आलू की बुवाई का उपयुक्त समय अक्तू्बर माह का पहला पखवाडा है। पूर्वी भारत में आलू अक्तूबर के मध्य‍ से जनवरी तक बोया जाती है।  इसके लिए 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है।

बुवाई की विधि (Method of sowing)

 पौधों में कम फासला रखने से रोशनी,पानी और पोषक तत्वों के लिए उनमें होड बढ जाती है फलस्वपरूप छोटे माप के आलू पैदा होते हैं। अधिक फासला रखने से प्रति हैक्टे,यर में पौधो की संख्या  कम हो जाती है जिससे आलू का मान तो बढ जाता है परन्तु उपज घट जाती है। इसलिए कतारों और पौधो की दूरी में ऐसा संतुलन बनाना होता है कि न उपज कम हो और न आलू की माप कम हो। उचित माप के बीज के लिए पंक्तियों मे 50 से.मी. का अन्तलर व पौधों में 20 से 25 से.मी. की दूरी रखनी चाहिए.

बीज उपचार (Seed treatment)

  • ओगरा, दीमक, फंफूद और जमीन, जनित बीमारी से बचाव के लिए बीज उपचारित करने का तरीका.   

  • 5 लीटर देसी गाय का मट्ठा लेकर 15 ग्राम बराबर हींग लेकर अच्छी तरह से बारीक़ पीसकर घोल बनाकर उसमे बीज को उपचारित करे घंटे सुखाने पर बुवाई करे .

  • 5 देसी गाय के गोमूत्र में बीज को उपचारित 2-3 घंटे सूखने के बाद बुवाई करे. 

Potato Farming

Potato Farming

खाद (Fertilizers)

  • गोबर की सड़ी खाद 50-60 टन20 किलो ग्राम नीम की खली 20 किलो ग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह से मिलाकर प्रति एकड़ भूमि में समान मात्रा में छिड़काव कर जुताई कर खेत तैयार कर बुवाई करे ,

  • जब फसल 25 - 30 दिन की हो जाए तब उसमे 10ली. गौमूत्र में नीम का काड़ा मिलाकर अच्छी प्रकार से मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें और हर 15-20 दिन के अंतर से दूसरा व तीसरा छिड़काव करें.

  • रासायनिक खाद की दशा में खाद की मात्रा प्रति हेक्टेअर मिट्टी परीक्षण के आधार पर दे.

  • गोबर की सड़ी खाद : 50-60 टन

  • नाइट्रोजन : 100-120 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर

  • फॉसफोरस : 45-50 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर

  • गोबर तथा फ़ॉस्फ़रस खादों की मात्रा को खेत की तैयारी में रोपाई से पहले मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें.

  • नाइट्रोजन की खाद को 2 या 3 भागों में बांटकर रोपाई के क्रमशः 25 ,45 तथा 60 दिन बाद प्रयोग कर सकते हैं.

  • नाइट्रोजन की खाद दूसरी बार लगाने के बाद पौधों पर परत की मिट्टी चढाना लाभदायक रहता है. 

सिंचाई (Irrigation)

आलू की सफल खेती के लिए सिंचाई का महत्व पूर्ण योगदान है मैदानी क्षेत्रो में पानी कि उपलब्धता होने पर ही खेती कि जा सकती है परन्तु पहाड़ी क्षेत्रो में आलू कि खेती वर्षा पर निर्भर करती है इसकी खेती में पानी कि कमी किसी भी अवधी में होने से आलू का बढ़वार, विकास और कंद के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ऐसी जगह जहाँ पानी ठहरता हो वंहा इससे हानी होती है आलू कि पहली सिंचाई अंकुरण के उपरांत करनी चाहिए इसके बाद कि 10-12 दिन के अंतराल पर करे प्रत्येक बार हलकी सिंचाई करनी चाहिए इस बात का ध्यान सिंचाइयाँ रहे खूंड तिन चौथाई से अधिक न डूबने पाए कंद निर्माण के समय पानी कि कमी किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए इसकी खेती 500 लगभग मी.ली. पानी कि आवश्यकता होती है आलू कि खुदाई करने के 10 दिन पूर्ब सिंचाई बंद कर देनी चाहिए इससे आलू के कंदों का छिलका कठोर हो जाता है जिससे खुदाई करते समय छिलका नहीं छिलता और कंदों के भण्डारण क्षमता में बृद्धि हो जाती है .

खरपतवार (Weed)

आलू कि खेती में खर पतवारो कि समस्या मिटटी चढ़ाने से पूर्ब अधिक होती है यह समस्या निराई गुड़ाई और मिटटी चढ़ाने से काफी कम हो जाती है फिर भी किन्ही किन्ही स्थानों आर खरपतवार की बढ़वार इतनी अधिक हो जाती है कि वे आलू के पौधे निकलने से पहले ही उन्हें ढक लेते है जिसके कारण आलू के फसल को काफी क्षति होती है उन्हें निकाई गुड़ाई कर निकाल देना चाहिए .

कीट (Insects)

चैपा 

 यह गहरे हरे या काले रंग के होते है प्रौढ़ अवस्था में यह दो प्रकार के होते है पंखदार और पंख हिन् इसके अवयस्क और प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों और शाखाओं का रस चूसते है अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां निचे की ओर मुड जाती है और पीली पड़कर सूख जाती है इसकी पंखदार जाती विषाणु फ़ैलाने में सहायता करती है .

उपचार 

 देसी गाय का 5 लीटर मट्ठा लेकर उसमे 5 किलो नीम कि पत्ती या 2 किलोग्राम नीम कि खली या 2 किलोग्राम  नीम की पत्त्ती एक बड़े मटके में 40-50 दिन भरकर तक सडा कर - सड़ने के बाद उस मिश्रण में से 5 लीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह मिलाकर तर बतर कर प्रति एकड़ छिड़काव करे.

कुतरा 

इस कीट कि सुंडिया आलू के पौधों और शाखाओं और उगते हुए कंदों को काट देती है बाद कि अवस्था में इसकी सुंडी आलुओं में छेद कर देती है जिससे कंदों का बाजार भाव कम हो जाता है यह कीट रात में फसल को क्षति पहुंचाती है.

उपचार 

 10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे.

वाइट ग्रब

 इसे कुरमुला कि संज्ञा भी दी जाती है जो सफ़ेद या सलेटी रंग कि होती है इसका शरीर मुडा हुआ और सर भूरे रंग का होता है यह जमीन के अन्दर रहकर पौधों कि जड़ो को क्षति पहुंचता है इसके अतिरिक्त आलू में छिद्र कर देती है जिसके कारण आलू का बाजार भाव कम हो जाता है .

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ कि पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे .

एपिलेकना 

 यह छोटा , पीलापन लिए हुए भूरे रंग का कीट है इसक पीठ का भाग उठा हुआ होता है जिस पर काफी बिंदिया पाई जाती है अवयस्क और प्रौढ़ कीट दोनों ही क्षति पहुंचे है पौधों कि पत्तियों को कीट इसके बच्चे धीरे धीरे खुरच कर खा जाते है और पत्तियां सूख जाती है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2 किलो नीम की पत्ती 2 किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे. 

रोग (Disease)

अगेती अंगमारी

यह रोग आल्तेरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण लगता है उत्तरी भारत में इस रोग का आक्रमण शरद ऋतु के फसल पर नवम्बर में और बसंत कालीन फसल में फरवरी में होता है यह रोग कंद निर्माण से पहले ही लग सकता है निचे वाली पत्तियों पर सबसे पहले प्रकोप होता है जंहा से रोग बाद में ऊपर कि ओर बढ़ता है पत्तियों पर छोट छोटे गोल अंडाकार या कोणीय धब्बे बन जाते है जो भूरे रंग के होते है ये धब्बे सूखे एवं चटकने वाले होते है बाद में धब्बे के आकार में बृद्धि हो जाती है जो पूरी पत्ती को ढक लेती है रोगी पौधा मर जाता है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे 

पछेती अंगमारी 

यह रोग फाइटो पथोरा इन्फैस्तैन्स नामक फफूंदी के द्वारा होता है इस रोग में पत्तियों कि शिराओं , तानो डंठलो पर छोटे भूरे रंग के धब्बे उभर आते है जो बाद में काले पड़ जाते है और पौधे के भूरे भाग गल सड़ जाते है रोकथाम में देरी होने पर आलू के कंद भूरे बैगनी रंग में परवर्तित होने के उपरांत गलने शुरू हो जाते है .

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे 
500 ग्राम लहसुन और 500 ग्राम तीखी चटपटी हरी मिर्चलेकर बारीक़ पीसकर 200 लीटर पानी में घोलकर थोडा सा शैम्पू झाग के लिए मिलाकर तर बतर कर अच्छी तरह छिड़काव प्रति एकड़ करे.

काली रुसी ब्लैक स्कर्फ 

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण होता है इस रोग का आक्रमण मैदानी या पर्वतीय क्षेत्र में होता है रोगी कंदों प़र चाकलेटी रंग के उठे हुए धब्बो का निर्माण हो जाता है जो धोने से साफ नहीं होते है है इस फफूंदी का प्रकोप बुवाई के बाद आरम्भ होता है जिससे कंद मर जाते है और पौधे दूर दूर दिखाई पड़ते है.

उपचार 

10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे. 

खुदाई 

खेत में खुदाई के समय कटे और सड़े आलू के कंदों को अलग कर देना चाहिए, खुदाई छंटाई और बोरियों में भरते समय और बाजार भेजने के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि आलू काछिलका न उतरे साथ ही उन्हें किसी प्रकार का क्षति नहीं होनी चाहिए तो बाजार भाव अच्छा रहता है. 

उत्पादन (Production)

आलू कि उपज उसकी किस्म भूमि कि उर्बरा शक्ति और फसल कि देख भाल पर निर्भर करती है मैदानी क्षेत्रो में एक हेक्टेयर अगेती,मध्य मौसमी किस्मो कि 200-250 क्विंटल और पछेती किस्मो कि 300-400 कुंतल तक उपज मिलती है पर्वतीय घाटियों में 150 - 200 कुंतल और ऊँचे पहाड़ो पर 200 क्विंटल तक उपज मिल जाती है. 

भण्डारण (Storage)

आलू शीघ्र ख़राब होने वाली फसल है. अत: इसके लिए अच्छे भण्डारण कि सुबिधा का होना नितांत आवश्यक है पर्वतीय क्षेत्रो में कम तापमान होने के कारण वंहा भण्डारण कि कोई बिशेष समस्या नहीं होती है भण्डारण कि बिशेष समस्या मैदानी भागो में होती है मैदानी क्षेत्रो में आलू को ख़राब होने से बचाने के लिए शीत भंडार गृहों में रखने कि आवश्यकता होती है इन शीत भंडार गृहों में तापमान 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस और आपेक्षिक आद्रता 90-95% होती है .

English Summary: If you are going to cultivate potatoes, then this information can be beneficial for you ....

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