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कपास की फसल में रस चूसने वाले कीड़ों का विवरण एवं प्रबंधन

कपास एक प्रमुख नकदी फसल है। यह खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली फसल है। हरियाणा में कपास की औसत पैदावार 4-5 क्विटंल प्रति एकड़ है परन्तु कई प्रगतिशील किसान उन्नत कृषि क्रियाएं अपनाकर 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ तक पैदावार लेने में सफल हुए हैं।

कपास एक प्रमुख नकदी फसल है। यह खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली फसल है। हरियाणा में कपास की औसत पैदावार 4-5 क्विटंल प्रति एकड़ है परन्तु कई प्रगतिशील किसान उन्नत कृषि क्रियाएं अपनाकर 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ तक पैदावार लेने में सफल हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों से कपास की उत्पादकता घटी है, जिसमें कीटों की अहम भूमिका रही है। कीटों के प्रकोप के कारण पैदावार में 60-70 प्रतिशत तक कमी आ जाती है तथा इसके साथ ही उपज की गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। कपास को हानि पहुँचाने वाले कीटों में रस चूसने वालें कीट भी शामिल हैं। इन कीटों में सफेद मक्खी, हरा तेला, चेपा, मीली बग प्रमुख हैं जिनके प्रकोप के कारण 20-30 प्रतिशत पैदावार कम हो जाती है।  इन कीटों का विवरण एवं प्रबंधन इस प्रकार है:-

सफेद मक्खी :

पिछले कुछ वर्षों से कपास में सफेद मक्खी का प्रकोप काफी बढ़ रहा है। यह एक बहुभक्षी कीट है जो कपास की प्रांरभिक अवस्था से लेकर चुनाई व कटाई तक फसल में रहता है। कपास के अलावा खरीफ मौसम में यह 100 से भी अधिक पौधों पर आक्रमण करती है। इस कीट के शिशु और प्रौढ़ दोनो ही पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसते हैं। प्रौढ़ 1-1.5 मि.मी. लम्बे, सफेद पंखों व पीले शरीर वाले होते हैं। जबकि शिशु हल्के पीले, चपटे होते हैं। ये फसल को दो तरह से नुकसान पहुँचाते हैं। एक तो रस चूसने की वजह से, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है। दूसरा पत्तियों पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ने की वजह से, जिस पर काली फफूंद उग जाती है। जो कि पौधे के भोजन बनाने की प्रक्रिया में बाधा ड़ालती है। यह कीट कपास में मरोड़िया रोग फैलाने में भी सहायक है। इसका प्रकोप अगस्त - सितम्बर मास में ज्यादा होता है। जिनसे पौधे की बढ़वार रुक जाती है।

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चेपा/अल:

चेपा के शिशु और प्रौढ़ दोनो पत्तियों की निचली सतह व कोपलों से लगातार रस चूसते रहते हैं। जिसके कारण पत्ते मुड़ने लगते हैं। ये कीट छोटे आकार के गोल, हल्के पीले रंग के होते हैं और एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ भी छोड़ते हैं जिससे पौधों पर काली फफूंद उग जाती है। ग्रसित पत्ते तेल में डुबोए हुए से लगते हैं। इस कीट का प्रकोप सितम्बर से अक्टूबर माह में बढ़ जाता है। इस कीट के आक्रमण के कारण पौधा कमजोर हो जाता है, पत्ते मुड़ जाते हैं और झड़ जाते हैं।

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हरा तेला:

इन कीटों के शिशु व प्रौढ़ दोनो ही कपास को नुकसान पहुंचाते हैं। ये हरे रंग के होते हैं जो कि पत्तियों की निचली सतह पर रहते हैं और टेढ़े चलते दिखाई देते हैं। इनके आक्रमण से पत्ते किनारों से पीले पड़ जाते हैं तथा नीचे की ओर मुड़ने लगते हैं, बाद में कप नुमा हो जाते हैं। पत्तियां पीली व लाल होकर सूख जाती है और जमीन पर गिर जाती हैं। पौधों की बढ़वार रुक जाती है व कलियां, फूल गिरने लगते हैं। जिससे पैदावार कम हो जाती है। हरा तेला जुलाई से अगस्त माह में सर्वाधिक हानि पहुँचाता है।

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चुरड़ा :

ये कीट छोटे पतले शरीर वाले भूरे रंग के होते हैं जो पत्तों की निचली सतह पर नाड़ियों के साथ चलते दिखाई देते हैं। प्रौढ़ प्रायः गहरे भूरे रंग के होते हैं। शिशु तथा प्रौढ़ पत्तों की निचली सतह को खुरच कर रस चूसते हैं। चुरड़ा ग्रसित पत्तियों की निचली सतह को अगर धूप की ओर किया जाए तो वह चाँदी की तरह चमकती है। अगर लम्बे समय तक मौसम खुश्क रहे तो इस कीट का प्रकोप काफी बढ़ जाता है जिससे पत्ते सूख कर गिर जाते हैं।

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मीली बग:

यह एक बहुभक्षी कीड़ा है जो पौधों के विभिन्न भागों में समूह में एकत्र होकर रस चूसते है। तथा पौधे के जिस भी भाग पर यह अपनी कालोनी बना लेते हैं, उसे सूखा देते हैं। यह कीट लगभग 3-4 मि.मि. लंबा व सफेद रंग का होता है। इसका शरीर पंख रहित होता है। इस कीट से प्रभावित पौधों के पत्ते व फल गिर जाते हैं। यह कीट एक प्रकार का मधुस्त्राव छोड़ता है। जिस पर काली फफूंद लग जाती है। मीली बग ग्रसित पोधों पर प्रायः काली/भूरी चींटियाँ काफी संख्या में चलती नजर आती है।

रस चूसक कीटों का एकीकृत प्रबंधन:-

1. अगेती व पछेती बिजाई में कीड़ों का प्रकोप अधिक रहता है। इसलिए कपास की बिजाई मध्य अप्रैल से मई तक कर लें।

2. पिछली फसल की जड़ों एवं डंठलों को एकत्रित कर नष्ट करें।

3. कपास के खेत के आसपास या मेड़ों पर उगे हुए खरपतवार को नष्ट कर दें, क्योंकि इन पर सफेद मक्खी व अन्य कीटों को आश्रय मिलता है।

4. खाद का संतुलित प्रयोग करें। नत्रजन वाली खाद अधिक न ड़ालें।

5. कीटनाशकों की कम या अधिक मात्रा नही ड़ालें बल्कि सिफारिश की गई मात्रा ही डालें।

6. सिंथेटिक पाइरेथ्राइड़ समूह वाले कीटनाशकों का उपयोग सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए ना करें।

7. पीले पाश प्रयोग सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए करें।

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8. रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कीटों के आर्थिक कगार पर पहुंचने के बाद ही करें।

9. मई के अंत, जून व जुलाई तक चुरड़ा, हरा तेला के लिए 250-350 मि.ली. ड़ाइमेथोएट (रोगेर) 30 ई.सी. या 300-400 मि.ली. आक्सीड़ीमेटान मिथाइल (मैटासिस्टाकस) 25 ई.सी. या 40 मि.ली. ईमीड़ाक्लोपरिड़ (कोन्फीड़ोर) 200 एस. एल. को 120-150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

10. यदि अगस्त सितम्बर माह में सफेद मक्खी का आक्रमण हो जाए तो, सफेद मक्खी के आर्थिक कगार पर पहुँचने पर 300 मि.ली. डाइमेथोएट 30 ई.सी. या मैटासिस्टाक्स 25 ई.सी. व एक लीटर नीम आधारित कीटनाशक का बारी बारी से 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

11. मीली बग के लिए 3 मि ली. प्रोफेनोफास 50 ई.सी. या 5 ग्राम थायोड़िकार्ब 75 ड़ब्लयू. पी. या 4 मि.ली. क्विनलफास 25 ई.सी. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

रूमी रावल एवं कृष्णा रोलानियाँकीट विज्ञान विभाग

चैधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार

English Summary: Details and management of insect pests in cotton crop Published on: 24 May 2018, 12:36 IST

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