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मिलेट्स के उचित प्रबंधन के लिए रखें इन बातों का ध्यान, यहां जानें पूरी जानकारी

Millets: मिलेट्स को सुपर फूड कहा जाता है. क्योंकि इसमें पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं यह ज्यादातर ग्लूटेन फ्री होने के साथ-साथ विटामिन से भी भरपूर है. ऐसे में आइए मिलेट्स से जुड़ी सभी जानकारी के बारे में विस्तार से जानते हैं...

लोकेश निरवाल
मिलेट्स की खेती, सांकेतिक तस्वीर
मिलेट्स की खेती, सांकेतिक तस्वीर

श्री अन्न यानी मिलेट्स को हमारे यहां सदियों से खाने में शामिल किया जाता रहा है. समय के साथ लोगों ने गेहूं व चावल का सेवन शुरू किया और देखते ही देखते श्री अन्न हमारी थाली से गायब हो गया हैं. यह कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी बड़ी आसानी से उगता हैं. फिर भी लोग इस महत्व नहीं देते हैं. वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष घोषित किया गया है जिससे इसमें होने वाले सेहत से जुड़े फायदे को सभी तक पहुंचाया जा सके और लोगों को इसे अपनी भोजन प्रणाली में शामिल करने हेतु प्रेरित किया जा सके. अन्य फसलों की तुलना में इसमें कम रसायनिक उर्वरक एवं कम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है. जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्यान्न सुरक्षा के लिए बढ़ते हुए खतरे में मिलेट्स की खेती अच्छा विकल्प है.

धान, गेहूं की तुलना में ज्वार, बाजरा, रागी, सावा, कोदो, कुटकी, रामदाना, चेना, काकुन एवं कुट्टू आदि फसलें जलवायु के प्रति कम संवेदनशील होती हैं. मिलेट्स को सुपर फूड कहा जाता है. क्योंकि इसमें पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं यह ज्यादातर ग्लूटेन फ्री होने के साथ-साथ विटामिन, एंजाइम और इनसोल्युबल फाइबर जैसे पोषक तत्व से भरपूर होते हैं, इसके साथ ही इनमें बीटा कैरोटीन, नियासिन, विटामिन बी6, फोलिक एसिड, पोटेशियम, मैग्निशियम, जस्ता जैसे खनिज लवण भी काफी मात्रा में पाए जाते हैं. इनमें विटामिन बी3 होता है जो शरीर के मेटाबॉलिज्म को बैलेंस रखता है. ये फसलें अधिकांश उपजाऊ होती हैं और कई क्षेत्रों में जल निर्देशित और जलवायु-स्थायी हैं. मिलेट्स की अच्छी उपजाऊ प्रबंधन से उनमें पोषक तत्वों का स्तर बढ़ सकता है. यह जल और खाद के उपयोग पर निर्भर करता है, जो अच्छी उपजाऊ प्रबंधन प्रक्रिया के लिए आवश्यक हैं.

मिलेट्स के फायदे

  • मिलेट्स ग्लूटेन फ्री होने के साथ-साथ सुपाच्य होते हैं.

  • इनमे प्रोटीन, मिनरल्स, विटामिन, फाइबर, कैल्शियम एवं आयरन के साथ-साथ अन्य माइक्रोन्यूट्रिएंट भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं.

  • मिलेट्स के सेवन से शुगर, एसिडिटी, पेट की बीमारियों में राहत मिलती है.

  • मिलेट्स शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालते हैं.

  • इनके सेवन से ब्लड प्रेशर नियंत्रित होता है, एवं हृदय रोग की समस्या से भी बचा जा सकता है.

  • शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

  • मिलेट्स में नियासिन (विटामिन ठ3) पर्याप्त मात्रा में पाए जाने के कारण शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद करता है.

  • मिलेट्स में रेशा अधिक पाया जाता है. यह मधुमेह के रोगियों के लिए लाभकारी है. यह रक्त में शर्करा को धीरे-धीरे ट्रॉवित करता है तथा रक्त में ग्लूकोज को तेजी से बढ़ने से रोकता है.

मिलेट्स के उचित उपजाऊ प्रबंधन करने के लिए निम्नलिखित कदम अपनाए जा सकते हैं

  1. सही बीज का चयनः प्रारंभिक चरण में, उचित बीज का चयन करें जो आपके क्षेत्र में अनुकूल हो और अच्छी उपज देता हो. बीज की गुणवत्ता, प्रतिस्थापन क्षमता, रोग प्रतिरोधी और उपज की मान्यता की जांच करें.

  2. बुआई के समय का ध्यानः बुआई के समय का सही चयन करें, जो कि स्थानीय मौसम, मौसम की पूर्वानुमान और खेती की विशेषताओं के अनुसार हो. सही समय पर बुआई से उपज की गुणवत्ता और मात्रा बढ़ सकती है.

  3. सही सिंचाई प्रणालीः श्री अन्न (मिलेट्स) फसलों के लिए सही सिंचाई प्रणाली का उपयोग करें. यह सिंचाई की जरूरत के अनुसार पानी की बचत करता है और उपज की गुणवत्ता को बनाए रखता है.

  4. खाद और पोषणः खेती में उपज की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए सही खाद और पोषण प्रदान करें. उचित प्रकार के खाद और पोषण से पौधों का सही विकास होता है और उपज में वृद्धि होती है.

  5. रोग और कीट प्रबंधनः उपज को किसी भी रोग या कीट से संक्रमित होने से बचाने के लिए उचित रोग और कीट प्रबंधन तकनीकों का उपयोग करें. प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करें जब संभव हो.

  6. समय पर फसल की देखभालः समय पर फसल की देखभाल करें, जैसे कि कीटों के हमले, बीमारियों और विविधताओं के खिलाफ संरक्षण के लिए नियमित रूप से निगरानी करें.

  7. फसल का संरक्षणः प्राकृतिक आपदाओं से फसल का संरक्षण करें, जैसे कि बाढ़, बारिश, और जल-लगाव.

  8. बीज चयनः उचित बीज चयन भी महत्वपूर्ण है. श्री अन्न (मिलेट्स) के बीज चयन करते समय, कुछ महत्वपूर्ण तत्वों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होता है. यहाँ कुछ मुख्य सिद्धांत हैं जो आपको बीज चयन में मदद कर सकते हैंः स्थानिक अनुकूलता अपने क्षेत्र में उचित प्रकार की श्री अन्न की फसल की चयन करें, जो आपके स्थान के जलवायु, मिट्टी और प्रकृति के अनुकूल हो.

फसल विशेषताएँः अलग-अलग श्री अन्न की फसलों की विशेषताओं को समझें. आपके क्षेत्र में कौन सी फसल सबसे अधिक प्रसिद्ध है और उसकी विशेषताओं को ध्यान में रखें. उपज की आवश्यकताएँ आपके बाजार में ज्यादा मांग के अनुसार फसल का चयन करें. अनुभव और शिक्षाः बीज निर्माता की प्रतिष्ठा, उत्पादकता और गुणवत्ता के संदर्भ में अनुभव और ग्राहक समीक्षा का मूल्यांकन करें. गुणवत्ता के प्रमाण पत्रः बीज निर्माता के पास उत्पादन, गुणवत्ता और प्रमाण पत्रों की जानकारी होनी चाहिए.

बीज की कीमतः बीज की कीमत भी एक महत्वपूर्ण कारक है. इसमें उपज की मूल्यांकन करें और अपने बजट के अनुसार चयन करें.  संरक्षण बीजः अगर आप एक ज्यादा संरक्षण वाले बीज चुन रहे हैं, तो उनकी संरक्षण क्षमता और उत्पादन के संबंध में विवेचना करें.

पारंपरिक खेती प्रथाओं का उपयोगः पारंपरिक खेती प्रथाएं भी पोषक तत्वों के प्रबंधन में मदद कर सकती हैं. पारंपरिक खेती प्रथाएं किसानों को प्राचीन संविधानों, विधियों और अनुभवों का संचार करती हैं, जो उन्हें संवेदनशील और पर्यावरण के साथ अनुकूल खेती करने के लिए मदद करती हैं. यहाँ कुछ महत्वपूर्ण पारंपरिक खेती प्रथाएं हैं जिन्हें आप अपनी खेती में शामिल कर सकते हैंः

जल संचयन और प्रबंधनः पारंपरिक खेती में जल संचयन और प्रबंधन एक महत्वपूर्ण प्रथा है. यह सिंचाई प्रणालियों, बांधों, नहरों और कुएं के माध्यम से पानी का संचयन और उपयोग करने का विधान करता है.

जल संवर्धनः पारंपरिक खेती में जल संवर्धन की प्रथा को ध्यान में रखा जाता है. इसमें वर्षा पानी को संचित करने के लिए बुंदेल और कूप जैसे संरचनाओं का उपयोग किया जाता है.

कृषि कार्यक्षमताः पारंपरिक खेती प्रथाएं कृषि कार्यक्षमता को बढ़ाती हैं, जैसे कि उचित खेती की तकनीकें, उपजा की अच्छी देखभाल, और सही समय पर सही उपाय करना.

बियान और काटनी के समयः पारंपरिक खेती में बियान और काटनी के समय को ध्यान में रखा जाता है, जो विशेष वातावरणीय तथ्यों के आधार पर निर्भर करता है.

प्राकृतिक खाद और बरतावः पारंपरिक खेती में प्राकृतिक खाद और बरताव का प्रयोग किया जाता है, जैसे कि गोबर का खाद, कंपोस्ट, और खेती में समायोजन का उपयोग.

जैविक कीटनाशकः पारंपरिक खेती में जैविक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है, जो कीटों को नियंत्रित करने के लिए प्राकृतिक तरीके से होते हैं.

रोपण तंत्रः रोपण तंत्र की सही प्रथा पारंपरिक खेती में बढ़ावा देती है, जो सही स्थान पर और सही दूरी पर पौधों को रोपने में मदद करती है.

परंपरागत बीजों का प्रयोगः पारंपरिक खेती में परंपरागत बीजों का प्रयोग किया जाता है, जो स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल होते हैं.

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उचित प्राकृतिक खाद और कीटनाशकों का उपयोगः सहायक अन्न की उचित पोषक तत्वों की मात्रा को बनाए रखने के लिए उचित प्राकृतिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करें. श्री अन्न (मिलेट्स) फसलों के लिए उचित प्राकृतिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करना एक स्वास्थ्यपूर्ण और पर्यावरण के साथ मिलान किया जा सकता है.

जीवाणुओं और खाद्य स्रोतों का प्रयोगः कम्पोस्ट, गोबर खाद, खाद्य स्रोतों से बनाई गई जीवाणुओं युक्त खाद और अन्य प्राकृतिक खाद श्री अन्न की फसलों के लिए उत्तम होते हैं. ये खाद फसलों को पोषक तत्वों से भरपूर बनाते हैं और मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं.

नेमतोड काटनेवाली पादपीः कुछ प्राकृतिक नेमतोड काटनेवाली पादपी (नेमाटोड को नष्ट करने वाली जीवाणुओं) का उपयोग किया जा सकता है जो कीटों को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं, जैसे कि बैक्टीरियल नेमाटोड और फंगल नेमाटोड.

जैविक कीटनाशकः प्राकृतिक जैविक कीटनाशकों का उपयोग करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है. ये खेती में कीटों को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं और पर्यावरण को हानि पहुंचाने से बचाते हैं.

परंपरागत बीजों का प्रयोगः परंपरागत बीजों का प्रयोग करना भी एक उत्तम विकल्प हो सकता है, क्योंकि ये बीज स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं और कीटों के साथ साथ प्रतिरोधी भी होते हैं.

बुनियादी जल प्रबंधनः सहायक अन्न के उत्पादन के लिए उचित जल प्रबंधन की जरूरत है. यह सुनिश्चित करेगा कि उपज को आवश्यक सीमा तक आवश्यक जल प्रदान किया जाए. श्री अन्न फसलों के लिए बुनियादी जल प्रबंधन करने के लिए आप निम्नलिखित कदम अपना सकते हैं.

जल संचयन संरचनाएं: जल संचयन के लिए उपयुक्त संरचनाएं बनाएं, जैसे कि तालाब, नहर, और बांध. यह संरचनाएँ वर्षा पानी को संचित करती हैं और जल संचयन में मदद करती हैं. बूंदेल और ट्रेंचेसः खेतों में बूंदेल और ट्रेंचेस बनाने के माध्यम से जल संचयन करें. यह जल को बुनियादी स्तर पर रखता है और उपज को अच्छी तरह से सिंचित करता है.

सिंचाई की तकनीके: उपयुक्त सिंचाई की तकनीकों का उपयोग करें, जैसे कि स्ट्रीमलाइन सिंचाई, ड्रिप सिंचाई, या स्प्रिंकलर सिंचाई. ये तकनीकें जल की बचत करने में मदद करती हैं और प्रभावी सिंचाई प्रदान करती हैं. समय पर सिंचाईः उपज की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई का समयित उपयोग करें. नियमित सिंचाई से उपज का अच्छा विकास होता है और उपजाऊता बढ़ती है.

मिट्टी का प्रबंधन मिट्टी के सही प्रबंधन करें ताकि वह जल को अच्छे से रिटेन और पानी को संचित करने में मदद करे. मिट्टी की क्षमता जल को संचित करने और फसल के लिए उपलब्ध करवाने में महत्वपूर्ण होती है. जल का उपयोग की दिशा में संवेदनशीलता जल का उपयोग करते समय उसकी उपयोगिता और संवेदनशीलता का ध्यान रखें. जल को संचित करने और प्रयोग करने के लिए उपयुक्त तंत्रों का उपयोग करें.

उपयुक्त रोपण तंत्रः सहायक अन्न की उपज को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त रोपण तंत्र का उपयोग करें. यह सुनिश्चित करेगा कि पौधों को पर्याप्त स्थान और पोषण मिलता है. श्री अन्न (मिलेट्स) फसलों के लिए उपयुक्त रोपण तंत्र का चयन करने के लिए निम्नलिखित तरीके अनुसार विचार किया जा सकता हैः

बीज की गहराई और दूरीः अगर आप बुआई कर रहे हैं, तो बीज की गहराई और बीच की दूरी का ध्यान रखें. बीज की गहराई फसल के लिए महत्वपूर्ण होती है, और बीच की दूरी को सही करने से पौधों को प्रत्यारोपण के लिए पर्याप्त जगह मिलती है. सिंचाई प्रणाली के साथ समन्वय सिंचाई प्रणाली के साथ समन्वय में भी ध्यान दें. उदाहरण के लिए, ड्रिप आधारित सिंचाई प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं तो, बुआई के समय सिंचाई की रेखा को ध्यान में रखें ताकि पानी सीधे और बराबर ढंग से पौधों तक पहुंच सके.

पौधों की गणना और रखरखाव सही दूरी और रूपरेखा को ध्यान में रखकर पौधों को उचित तरीके से गणना और रखरखाव करें. यह उन्हें स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक उपज की स्थिति में रखने में मदद करेगा.

प्रकृतिक वातावरण का ध्यानः जल्दी की बुआई के दौरान, प्राकृतिक वातावरण का ध्यान रखें. मौसम की पूर्वानुमान के आधार पर और सम्भावित मौसम की परिणामी विपरीतताओं को ध्यान में रखकर बुआई का समय निर्धारित करें.

बुआई का समयः श्री अन्न (मिलेट्स) फसलों के लिए अनुशंसित बुआई का समय का ध्यान रखें. इन उपायों का पालन करने से, सहायक अन्न की उपज में पोषक तत्वों का स्तर बना रहेगा और उत्तम उत्पादकता और उपज मिलेगी.

लेखक

श्री अन्न (मिलेट्स) फसलों में पोषक तत्व प्रबंधन
रीमा कुमारी1’ पंकज कुमार2 और वी शाजीदा बानू1
1पादप जैव प्रौद्योगिकी विभाग, कृषि जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, 813210 बिहार (भारत)
2आण्विक जीवविज्ञान और जेनेटिक इंजीनियरिंग विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, 813210 बिहार (भारत)

English Summary: Superfood Shree Anna Important tips for proper management of millets Published on: 07 May 2024, 04:04 PM IST

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