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काली हल्दी की खेती कर कमाएं शानदार मुनाफ़ा, जानिए आधुनिक तकनीक

कंचन मौर्य
कंचन मौर्य
black Turmeric

काली हल्दी एक लम्बा जड़दार सदाबहार पौधा है, जिसकी उंचाई लगभग 1.0 से 1.5 सेंटीमीटर होती है. इस पौधे की जड़ नीली-काली होती है. इसका वानस्पतिक नाम कुरकुमा कैसिया है. काली हल्दी की फसल लगभग 9 महीने में पककर तैयार होती है. इसके प्रकंद में कई तरह के गुण जैसे एंटी-बैक्टिरियल और एंटी-फंगल गुण मौजूद होते हैं. यह दिमाग और हृदय के लिए एक टॉनिक का काम करती है. इसकी गांठें कई बीमारियों को ठीक कर सकती हैं. बता दें कि इसका उपयोग बवासीर, श्वास रोग, अस्थमा, ट्यूमर और एलर्जी आदि में किया जाता है. अगर किसान काली हल्दी की खेती आधुनिक तकनीक से करें तो अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं. आज हम इस लेख में आधुनिक तकनीक से काली हल्दी की खेती करना बता रहे हैं, इसलिए इस लेख को अंत तक पढ़ते रहें.

उपयुक्त जलवायु

काली हल्दी की खेती उष्ण और समषीतोष्ण जलवायु में की जाती है, लेकिन यह खुली धूप में भी अच्छी उगता है. इसके साथ ही खेती की परिस्थितियों के अनुसार अच्छा उगता है. यह पौधा लगभग 41 से 45 डिग्री सेंटीग्रेड तक तापमान सहन कर सकता है.

उपयुक्त मिट्टी

काली हल्दी रेतीली-चिकनी और अम्लीय मिट्टी में अच्छी उगती हैं. इसके अलावा बलुई मिट्टी भी उपयुक्त मानी जाती है. बता दें कि चिकनी काली मुरूम मिश्रित मिट्टी में कंद बढ़ते नहीं हैं.

भूमि की तैयारी

सबसे पहली जुताई गहरा हल चलाकर करनी चाहिए. इसके बाद बारिश के पहले या जून के पहले सप्ताह में 2 से 3 बार जुताई करके मिट्टी भुरभुरी बना लें. ध्यान रखें की खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए. इसके बाद खेत में 10 से 15 टन प्रति हेक्येटर की दर से गोबर की खाद मिलाएं.

प्रजनन सामग्री

सबसे खास बात यह है कि इसकी गांठें ही इसकी प्रजनक सामग्री हैं. बुवाई से पहले पकी हुई गाठों को एकत्र किया जाता है फिर लंबाई में काटा जाता है. इसके बाद हर भाग में एक अंकुरण कली होती है जो रोपण के लिए उपयोगी है.

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बुवाई का तरीका

काली हल्दी की बुवाई के लिए गांठ को सीधे ही बो दिया जाता है. आपको बता दें कि एक हेक्टेयर जमीन में लगभग 2.2 टन गांठों की आवश्यक होती है.

उपचार

बुवाई से पहले हल्दी की गांठों को बाविस्टीन के 2 प्रतिशत घोल में लगभग 20 मिनट तक डुबोकर रखना चाहिए.

प्रत्यारोपण

मानसून आने से पहले गांठ को जमीन में दबाकर उगा दें. ध्यान दें कि पौधे को 30 X 30 सेंटीमीटर के अंतर में लगाना है, क्योंकि गांठे लगभग 15 से 20 दिनों के अंदर अंकुरित हो जाती हैं. इसके अलावा खेत में जुताई के समय लगभग 10 से 15 कार्बनिक खाद मिलाएं.

रोपण की विधियां

पौधों के आसपास पादप-रोपण के लगभग 60 दिन बाद कुछ मिट्टी चढ़ाई जाती है. इसके साथ ही पौधे की शुरुआती वृद्धि के बीच-बीच में हाथ से खरपतवार हटाना ज़रूरी है. बता दें कि आप इस प्रक्रिया को 60, 90 और 120 दिन के बाद कर सकते हैं.

सिंचाई प्रबंधन

यह फसल आमतौर पर खरीफ सीजन में वर्षायुक्त हालात में उगाई जाती है. यदि वर्षा न हो तो सिंचाई आवश्यकतानुसार की जानी चाहिए.

रोग और कीट

वैसे तो अभी तक काली हल्दी की फसल पर कीटों का प्रकोप नहीं देखा गया है, लेकिन कभी-कभी फसल के पत्तों पर धब्बे पड़ जाते हैं. इसकी रोकथाम के लिए पत्तों पर बॉरडाक्स का मिश्रण मासिक अंतराल पर छिड़क दें.

फसल कटाई

काली हल्दी की फसल कटाई का काम जनवरी के मध्य में किया जाता है. ध्यान रहे कि फसल से जड़ें निकालते समय गांठों को ठीक से निकाला जाना चाहिए, क्योंकि अगर वह खराब होते हैं तो कंदों को नुकसान पहुंचता है.

कटाई के बाद का प्रबंधन

सबसे पहले गांठे निकालने के बाद उनका छिलका उतार लें.

फिर छाया और खुली हवा में सूखा लें.

इसके बाद सूखी गांठों को उपयुक्त नमी रहित कन्टेनरों में रख दें.

पैदावार और लाभ

उपरोक्त तकनीक से काली हल्दी की खेती की जाए, तो एक एकड़ में ताजी गांठों की लगभग 50 टन पैदावार प्राप्त की जा सकती है, जबकि सूखी गांठों की लगभग 10 टन पैदावार मिल सकती है. इस हिसाब से अगर कच्ची हल्दी का दाम अगर 30 रुपए प्रति किलो हो तो 10 लाख की कमाई बड़े आराम से की जा सकती है.

English Summary: Modern technique of cultivation of black turmeric

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