1. खेती-बाड़ी

तोरई की उन्नत खेती से बढ़ेगी आमदनी, किसान मार्च में करें बुवाई

कंचन मौर्य
कंचन मौर्य
Turai ki Kheti

Luffa farming

कद्दूवर्गीय सब्जियों में तोरई (तोरी) महत्वपूर्ण सब्जी है. यह एक बेल वाली कद्दवर्गीय सब्जी है, जिसको बड़े खेतों के अलावा छोटी गृह वाटिका में भी उगाया जा सकता है. किसान इसकी खेती ग्रीष्म (जायद) और वर्षा (खरीफ), दोनों ऋतुओं में करते हैं. इसको स्पॉन्ज गार्ड, लूफा सिलेन्ड्रिका और लूफा इजिप्टिका भी कहा जाता है. इसकी खेती देशभर के सभी राज्यों होती है. चिकनी तोरई के कोमल मुलायम फलों की सब्जी बनाई जाती है, तो वहीं इसके सूखे बीजों से तेल भी निकाला जाता है. इसको कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा और विटामिन ए का अच्छा स्रोत माना जाता है. गर्मियों के दिनों में बाजार में इसकी मांग बहुत होती है, इसलिए किसानों के लिए इसकी खेती करना बहुत लाभदायक है. अगर किसान अपनी आय दोगुनी करना चाहते हैं, तो मार्च में इसकी बुवाई जरूर करें.

खेत की तैयारी

तोरई फसल की अच्छी उपज के लिए लगभग 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद खेत में मिला दें. इसके अलावा नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश भी आवश्यकता अनुसार प्रति हेक्टेयर की दर से डाल दें.  

उन्नत किस्में

किसानों को अपने क्षेत्र के अनुसार इसकी उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए. वैसे तोरई की पूसा चिकनी, पूसा स्नेहा, पूसा सुप्रिया, काशी दिव्या, कल्याणपुर चिकनी, फुले प्रजतका आदि को उन्नत किस्मों में शामिल किया गया है.

बुवाई का समय

किसान ग्रीष्मकालीन तोरई की बुवाई मार्च में कर सकते हैं, साथ ही इसकी वर्षाकालीन फसल को जून से जुलाई में बो सकते हैं.

बीज की मात्रा

किसान ध्यान दें कि तोरई की बुवाई के लिए लगभग 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 3-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है.

बुवाई की विधि

तोरई की बुवाई के लिए नाली विधि ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है. अगर किसान इस विधि से बुवाई कर रहे हैं, तो खेत की तैयारी के बाद सबसे पहले लगभग 2.5-3.0 मी. की दूरी पर 45 सेंटीमीटर चौड़ी और 30-40 सेंटीमीटर गहरी नालियां बनाकर तैयार कर लें. इसके बाद नालियों की मेड़ों पर लगभग 50-60 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज की बुवाई करें. ध्यान दें कि  आपको एक जगह पर कम से कम 2 बीज लगाएं, क्योंकि बीज अंकुरण के बाद एक पौधा निकाल देता है.

सिंचाई का प्रबंधन

ग्रीष्मकालीन फसल की अच्छी उपज सिंचाई पर निर्भर रहती है. किसान ध्यान दें कि गर्मी के दिनों में इसकी फसल को लगभग 5-6 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई की जरूरत पड़ती है. अगर वर्षाकालीन फसल है, तो सिंचाई की जरूरत नहीं होगी. अगर बारिश नहीं हुई है, तो खेत में नमी के लिए सिंचाई कर सकते हैं.  

पलवार का उपयोग

तोरई की बुवाई के बाद खेत में पलवार का उपयोग करना चाहिए. इससे मिट्टी का तापमान और नमी संरक्षित होती है, जिससे बीजों का जमाव भी अच्छा होता है. खास बात है कि इससे खेत में खरपतवार नहीं उग पाते हैं, जिसकी फसल की उपज पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है.

फसल के फलों की तुड़ाई भंडारण

तोरई फसल के फलों की तुड़ाई मुलायम अवस्था में कर देना चाहिए. अगर इसकी तुड़ाई में देरी होती है, तो फलों में कड़े रेशे बन जाते हैं. बता दें कि  फलों की तुड़ाई 6-7 दिनों के अन्तराल पर करनी चाहिए. इस तरह पूरी फसल में फलों की तुड़ाई लगभग 8 बार होती है. ध्यान दें कि फलों को ताजा बनाए रखने के लिए ठण्डे छायादार स्थान का चुनाव करें. इसके अलावा बीच-बीच में उन पर पानी भी छिड़कते रहें.

पैदावार

इसकी अच्छी उपज उन्नत किस्म और फसल की देखभाल पर निर्भर होती है, लेकिन अगर वैज्ञानिक तकनीक से खेती की जाए, तो प्रति हेक्टेयर से लगभग 200-400 क्विंटल उपज मिल सकती है.

English Summary: knowledge of advanced farming of luffa for farmers

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