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हरी खाद को खाली खेत में लगाकर बढ़ाए जमीन की उर्वरा शक्ति

मध्यप्रदेश समेत देशभर में रासायनिक खादों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है. इसीलिए लगातार खेतों में रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग हो रहा है जिसके कारण खेतों में जिंक सल्फेट और सल्फर की कमी भी खेतों में नजर आने लगी है. इसके लिए कृषि वैज्ञानिक काफी चिंतित है और वह इसकी कमी को पूरा करने के लिए ढैंचा की फसल को लगाने का कार्य कर रहे है. कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि मिट्टी में सल्फर, जिंक सल्फेट की कमी को पूरा करने के लिए किसान ढैंचा को बोकर हरी खाद बनाने का कार्य करें. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा करने से खेत में जीवांश की मात्रा में बढ़ोतरी होगी. जिन किसानों को धान और सोयाबीन की रोपाई करनी है वह अपने खेतों में ढैंचा की बुवाई कर सकते है. इसीलिए जमीन की उर्वरा क्षमता को बढ़ाने के लिए खाली खेतों में ढैंचा समेत कई तरह की तिलहनी फसले फायदेमंद होती है. दरअसल हरी खाद वह होती है जो कि खेती मिट्टी में पोषक तत्वों को बढ़ाने और उसमें जैविक पदार्थों की पूर्ति को करने के लिए की जाती है.

जमीन को होता फायदा

ढैंचा और सनई की खेती करने से जमीन को काफी ज्यादा फायदा होता है. इन सभी फसलों की जड़ों में ऐसी कई तरह की गांठे होती है जिनमें कई तरह के बैक्टीरिया होते है. यह वातावरण से नाइट्रोजन को खींचकर जमीन के अंदर बैठ जाते है. इन फसलों के पौधों को बाद में मिट्टी में मिलाकर दिया जाता है. इसके सहारे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है.

ऐसे लगाए ढैंचा

यह एक प्रकार की दलहनी फसल होती है. यह हर प्रकार के जलवायु और मिट्टी में पैदा होती है. यह 60 सेमी तक आसानी से जल भराव को भी सहन कर लेती है. ऐसे में ढैंचा के तने से जड़ निकालकर मिट्टी में पकड़ मजबूत बना लेती है. यह इसको तेज हवा चलने पर भी गिरने नहीं देती है. अंकुरित होने के बाद यह सूखे को सहन करने की पूरी क्षमता रखती है. यह फसल क्षारीय और मृदा लवणीयों में भी अच्छी तरह से तैयार हो जाती है. ऊपर में ढैंचा से 45 दिन में 20 से 25 टन तक हरी खाद और 85-100 किलो तक नाइट्रोजन मिल जाता है. धान और सोयाबीन की बुवाई पहले ढैंचा को पलटने से खरपतवार पूरी तरह से नष्ट हो जाते है.

बीज को छिड़कते है

इसके लिए सबसे पहले बीज को जुताई करके छिड़क दिया जाता है. ढैंचा के हरी खाद को प्रति हेक्टेयर 60 किलो बीज की काफी जरूरत होती है. इसमें मिश्रित फसल के अंदर 30 से 40 किलों बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. यह वास्तव में किसानों के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद होता है.



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