1. खेती-बाड़ी

अरहर की खेती: किसान इस आसान तरीके से करें फसल की बुवाई, मिलेगी अच्छी उपज

कंचन मौर्य
कंचन मौर्य
pigeonpea cultivation

किसान को बाजार में दलहनी फसलों का मूल्य काफी अच्छा मिलता है, इसलिए उनके लिए दलहनी फसलों की खेती महत्वपूर्ण होती है. अरहर भी खरीफ़ की मुख्य फसल है. हमारे देश में अरहर की खेती अकेली और दूसरी फसलों के साथ की जाती है. किसान अरहर के साथ ज्वार, बाजरा, उर्द और कपास की बुवाई कर सकते हैं. इसकी खेती में कम सिंचाई की आवश्यकता होती है. दलहनी फसल होने की वजह से यह मिटटी की उर्वरा शक्ति को बढ़ती है. खास बात है कि इसकी सूखी लकड़ियों को टोकरी, छप्पर, मकान की छत और ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है.

उपयुक्त जलवायु और मिट्टी  

अरहर नम और शुष्क जलवायु का पौधा है. इसके पौधे में फूल, फली और दाने बनते समय शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है. ध्यान दें कि अरहर की खेती ज़्यादा बारिश वाली जगह पर नहीं करनी चाहिए. इसके अलावा अरहर की खेती हर प्रकार की मिट्टी में हो सकती है. उत्तर भारत में दोमट मिट्टी और रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है.

उन्नत किस्में

  • बांझपन रोग प्रतिरोधी किस्में

  • शीघ्र पकने वाली किस्में

  • मध्यम समय में पकने वाली किस्में

  • देर से पकने वाली किस्में

  • हाइब्रिड किस्में

  • उकटा प्रतिरोधी किस्में

खेत की तैयारी

खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए. इसके बाद 2 से 3 जुताई देसी हल से करके खेत में लगाएं.

Arhar ki Kheti

बुवाई का समय और विधि

ज़ल्दी पकने वाली किस्मों की बुवाई जून के पहले पखवाड़े में पलेवा करके करना चाहिए. इसके अलावा  मध्यम और देर से पकने वाली किस्मों की बुवाई जून-जुलाई के पहले पखवाड़े में करना चाहिए.

बुवाई की दूरी

ज़ल्दी पकने वाली किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी लगभग 45 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर की होनी चाहिए. मध्यम और देर से पकने वाली किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी लगभग 60 से 75 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर उपयुक्त रहती है.

सिंचाई और जल निकासी

अरहर की खेती में बुवाई करने के लगभग 30 दिन बाद पुष्पावस्था, 70 दिन बाद फली बनते समय औऱ 110 दिन बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए. ध्यान दें कि अरहर की अच्छी उपज के लिए खेत में उचित जल निकासी का होना ज़रूरी है, इसलिए जहां जल निकासी की समस्या हो, वहां मेड़ों पर बुवाई करना ठीक रहता है. इससे अधिक जल भराव की स्थिति में भी अरहर की जड़ों के लिए पर्याप्त वायु संचार होता रहता है.

फसल की कटाई–मड़ाई 

अरहर के पौधों पर लगी लगभग 80 प्रतिशत फलियां पककर भूरे रंग की हो जाएं, तो किसानों को फसल की कटाई कर देनी चाहिए. इसके 7 से 10 दिन बाद जब पौधे पूरी तरह सूख जाएं, तो लकड़ी से पीटकर और जमीन में पटककर फलियों को अरहर के पेड़ से अलग कर लें. इसके बाद डंडे और बैलों की सहायता से अरहर के दाने निकाल लें. अब दानों को 7 से 10 दिन धूप में सुखाएं, जब इनमें लगभग 8 से 10 प्रतिशत नमी रह जाए, तो इनको भंडारित कर लेना चाहिए.

पैदावार

अरहर की खेती से किसानों को अच्छा मुनाफ़ा हो सकता है. यह एक ऐसी फसल है, जिसको दूसरी फसलों के साथ भी उगा सकते हैं. ऐसे में किसानों को तकनीकी खेती करनी चाहिए, जिससे उनको असिंचित अवस्था में लगभग 15 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सिंचित अवस्था में लगभग 25 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त हो सके.

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English Summary: farmers will get more benefit from improved sowing of toordal

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