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कृषि में एआई अपनाकर हो सकता है बदलते पैटर्न के खतरों से बचाव

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मानवीय आविष्कार के चमत्कारों में से एक है जो अब हमे कठोर प्रतिस्पर्धा भी दे रहा है. बारिश के दिनों का अनुमान लगाना हो अथवा यह जानना हो कब धूप खिलेगी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जल्द ही सही स्थिति का अनुमान लगाकर सारी दुविधाओं को दूर कर देने में सक्षम है. यह परिशुद्ध कृषि (पीए) के बुनियादी पहलुओं में से एक है जिसे सरकार भी प्रोत्साहन दे रही है ताकि कृषि की उत्पादकता बढाई जा सके और अंततः किसानों की आय में इजाफा हो. 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित बुवाई सम्बंधी सुझाव से आय में 30 प्रतिशत तक का मुनाफा हो सकता है, माइक्रोसॉफ्ट ने आईसीआरआईएसएटी के साथ मिलकर एक एआई बीजारोपण ऐप तैयार किया है, जो माइक्रोसॉफ्ट कोर्टाना इंटेलिजेंस सूइट द्वारा संचालित है और इसमे मशीन लर्निंग व पॉवर बीआई भी शामिल है. यह ऐप हिस्सा लेने वाले किसानों को उपयुक्त तारीख पर बीजारोपण सम्बंधी एडवाइजरी भेजता है, इसके लिए किसानों को अपने खेत में कोई सेंसर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है और न ही उन्हें कोई अतिरिक्त खर्च देना पडता है; इसके लिए उन्हें सिर्फ एक ऐसे फोन की जरूरत होती है जिसमे टेक्स्ट मैसेज आ सके. एआई के प्रदर्शन ने नीति आयोग को सात राज्यों के 10 जिलों में एआई के इस्तेमाल से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर परिशुद्ध कृषि के लिए प्रोत्साहित किया. ये सात राज्य हैं: असम, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश.

नमी पर्याप्तता सूचकांक (एमएआई) ला सकता है बडा बदलाव

एआई मशीनरी ने 30 वर्षों से भी अधिक समय-1986 से 2015 के बीच के फसल बुवाई काल के आंकडे एकत्र कर ऐतिहासिक क्लाइमेट डाटा का मूल्यांकन किया और नमी पर्याप्तता सूचकांक (एमएआई) निर्धारित किया जिससे यह पता लगाया जा सके कि बीजारोपण के लिए सबसे उपयुक्त समय क्या रहेगा. एमएआई एक  मानकीकृत मापन है जिसका इस्तेमाल बारिश की तीव्रता और भूमि की नमी का सही अनुमान लगाने में किया जा सकता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि फसलोँ में सिंचाई की कितनी जरूरत होगी. नियमित की बारिश का रेकॉर्ड और इसकी रिपोर्ट से रीयल-टाइम एमएआई की गणना में मदद मिलती है जबकि भविष्य का एमएआई मौसमी पूर्वानुमान मॉडल के जरिए तय किया जाता है जिसके आधार पर किसानो को बीजारोपण के लिए सबसे उपयुक्त सप्ताह के बारे में जानकारी देने में मदद मिलती है.

अंतरराष्ट्रीय क्रॉप रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईएसएटी), एक गैर लाभकारी, गैर-राजनैतिक संस्थान है, जिसने दस बीजारोपण सम्बंधी एडवाइजरी जारी करने की पहल की है और इन सुझावों को वे तब तक किसानों तक पहुंचाते हैं जब तक कि फसलों की कटाई पूरी न हो जाए. इस एडवाइजरी में बेहद अनिवार्य सूचनाएं शामिल होती हैं जैसे कि बुवाई की उपयुक्त तारीख, भूमि जांच-आधारित खाद का इस्तेमाल, फार्म यार्ड खाद का इस्तेमाल, बीजों का ट्रीटमेंट, बीजारोपण की उपयुक्त गहराई और अन्य कई जानकारियां. ऐप के साथ अनुबद्धता के बाद एक गांव विशेष आधारित एडवाइजरी डैशबोर्ड महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराता है जैसे कि भूमि की सेहत, अनुशंसित खाद और सात दिन का मौसमी पूर्वानुमान.

यह परम्परागत तरीकों से हटकर पूरी तरह से एक नया प्रयोग है, अन्यथा सदियों से किसान कॉटन जैसी फसलों की बुवाई के सही समय का अनुमान लगाने के लिए बेहद पुराने तरीके इस्तेमाल करते रहे हैं. अधिकतर मामलों में, मॉनसून सीजन का लाभ उठाने के लिए किसान जून माह के शुरुआती दिनों को बुवाई के लिए चुनते थे, जो आमतौर पर जून से अगस्त तक चलता था. यद्यपि, पिछले दशक में मौसमी पैटर्न में काफी बदलाव देखने को मिला है जिससे मॉनसून को लेकर सही-सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, ऐसे में फसलों को नुकसान होता है और किसानो की आमदनी बेहद कम हो जाती है.

कीटों के हमले सम्बंधी अनुमान से होती है बेहतर प्लानिंग

फसलों में कीटों का अटैक कब हो सकता है इस सम्बंध में पूर्व सूचना देने में भी एआई और मशीन लर्निंग का कोई जवाब नहीं है, जिससे किसानों को पहले ही यह पता लग जाता है कि उनकी फसलों के लिए क्या प्लानिंग करनी है. आम कीटों के हमले जैसे कि जस्स कीट, थ्रिप्स कीट, सफेद मक्खी और एफिड्स फसलों को बेहद नुकसान पहुंचा सकते हैं और इसका असर उपज पर पड़ता है. किसानों को बचाव सम्बंधी कदम उठाने में सक्षम बनाने के लिए कीटों के अटैक सम्बंधी दिशानिर्देश कारगर हो सकते हैं. किसान पहले से ही यह सूचना पा सकेंगे कि उनकी फसलों पर किस तरह के कीटों के हमले की आशंका है, इससे वे पहले ही बचाव सम्बंधी योजना बना सकेंगे और आवश्यक कदम उठा कर अपनी फसलों को होने वाले नुकसान को नियंत्रित कर सकेंगे. यह सब मिलकर निश्चित तौर से किसानो की आय को दोगुना करने में सहयोगी साबित होगा. कीटों के हमले का अनुमान मौसमी स्थिति और फसलों की आयु के चरण के हिसाब से लगाया जाता है, जो कि बीजारोपण सम्बंधी एडवाइजरी के साथ इस्तेमाल किया जाए तो काफी लाभप्रद हो सकता है.

मौसमी पैटर्न में बदलाव जिसमे तापमान में बढोत्तरी, बारिश के पैटर्न और स्तर में तेज बदलाव, और ग्राउंड वॉटर की सघनता किसानों को प्रभावित कर सकती है; खासतौर से उन लोगोँ के लिए जो बिना सिंचाई वाली जमीन को जोतते हैं और फसलों की सिंचाई के लिए मूलत: बारिश के पानी पर निर्भर रहते हैं. क्लाउड टेकनॉलजी और एआई के जरिए बीजारोपण के साथ-साथ कीटों पर नियंत्रण सम्बंधी एडवाइजरी और कमोडिटी प्राइसिंग का निर्धारण आदि कुछ ऐसे कदम हैं जो किसानों की आय बढाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे.

लेखक : श्री राजेश अग्रवाल, मैनेजिंग डायरेक्टर, इंसेक्टिसाइड्स (इंडिया) लिमिटेड



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