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हेंडीक्राफ्ट ट्रेनिंग्स से यह गांव हो रहा है आत्मनिर्भर, जानिए कैसे

हमारे पर्यावरण को बहुत से कारणों से नुकसान हो रहा है, लेकिन आज के समय में इसे सबसे अधिक खतरा प्लास्टिक से है. हां वही प्लास्टिक जिसका उपयोग दिन की शुरूआत से लेकर रात में बिस्तर जाने तक हम लगातार करते रहते हैं. आज हर चीज़ प्लास्टिक की बनने लगी है, जिससे एक तरफ जहां कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही है तो वहीं पर्यावरण भी खराब होता जा रहा है. लेकिन अगर हम ज़रा सा प्रयास करे तो पाएंगें कि प्लास्टिक के अन्य विक्लप हमारे चारों तरफ मौजूद है. अब पॉली बैग्स का ही उदाहरण ले लीजीए, जिसका विकल्प हाथ से बने कपड़ों के बैग्स हैं. इन बैगों को बनाकर ना सिर्फ अच्छी आजीविका कमाई जा सकती है, बल्कि पर्यावरण को भी बचाया जा सकता है. आइए हम आपको जयपुर के एक ऐसे ही गांव के बारे में बताते हैं, जो प्लास्टिक छोड़कर पुराने कपड़ों की मदद से बैग बनाना सीख रहा है.

राजस्थान की राजधानी जयपुर के बस्सी तहसील में एक हिम्मतपुरा नाम का गांव है. हैरानी की बात तो यह है कि शहर से ज्यादा दूर ना होने के बाद भी इस गांव में जहां एक और साक्षऱता दर कम है, तो वहीं रोजगार के साधन भी सीमित हैं. लेकिन आजकल यह गांव एक एनजीओ की मदद से पुराने कपड़ों को रीसायकल करके बैग्स बनाना सीख रहा है, जिससे वहां वहां रोजगार के नए अवसर खुल रहें हैं. ग्रामीणों  को पुराने कपड़ों से बैग्स सीखाने वाली आल इंडिया वेलफेयर सोसाइटी नाम की एनजीओ इस बारे में कहती है कि गांवों में छोटे-छोटे रोजगार की संभावनाएं मौजूद रहती है, बस जरूरत है उसे समझने की. एनजीओ ने बताया कि फिलहाल इस समय गांव के कुछ घर प्लासटिक बैग्स छोड़कर हेंडीक्राफ्ट की ट्रेनिंग्स ले रहे हैं, लेकिन इसका अच्छा प्रभाव पूरे गांव पर देखने को मिल रहा है और धीरे-धीरे इससे बाकि लोग भी जुड़ते जा रहें हैं.

एनजीओ ने कहा कि पुराने कपड़ों से बनाया गए बैग ज्यादा किफायती होने के साथ-साथ देखने में भी सुंदर लगते हैं. इतना ही नहीं लोग इसे लंबे समय तक इस्तेमाल में ला सकते हैं. बता दें कि आल इंडिया वेलफेयर सोसाइटी नाम की यह एनजीओ युवाओं द्वारा चलाई जा रही है, जो लगातार महिला साक्षरता, चाइल्ड एजुकेशन, सोशल डेवलपमेंट, ब्लड डोनेशन, एनवायरनमेंट सेफ्टी जैसे मुद्दों पर उल्लेखनीय काम करते हुए जयपुर में अपनी ख़ास पहचान बना चुकी है.



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