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'राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस' और अभिमन्यु का चक्रव्यूह!

यह लेख 'राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस' के संदर्भ में ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योग स्थापित करने की कठिनाइयों को उजागर करता है। लेखक ने सरकारी लालफीताशाही, विभागीय अड़चनें और भ्रष्टाचार के चलते उद्यमियों की समस्याओं को अभिमन्यु के चक्रव्यूह से जोड़ा है, और नीतियों की विफलता पर सवाल उठाया है।

डॉ राजाराम त्रिपाठी
dr rajaram tripathi
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ 'आईफा' के राष्ट्रीय संयोजक

तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी।
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे।।
                                                  -कबीर

30 अगस्त को देश ने 'लघु उद्योग दिवस' मनाने के लिए सन् 2000 से ही आरक्षित कर रखा है। यह जरूरी भी था। क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में, जहां खेती अब भी जीवन का मूल आधार है, लघु उद्योग प्राणवायु की तरह हैं। खासतौर पर कृषि और उससे जुड़े उत्पादों के प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग, परिवहन, विपणन और निर्यात से संबंधित उद्योगों की संभावना सबसे अधिक है। पर चीन तथा अमेरिका की आर्थिक मॉडल की बेअक्ल - नकल के चक्कर में एक ओर तो हम 'सेज' यानी स्पेशल इकोनामिक जोन (SEZ) और 'एज' यानी एग्रो एक्सपोर्ट जोन (AEZ) आदि भारी-भरकम औद्योगिक क्लस्टर स्थापित करने की मृग मरीचिका में भटकते रहे, दूसरी और अंबानी,अडानी, टाटा, बिरला जैसे मुट्ठी भर बड़े उद्योगपतियों के चारा-पानी की व्यवस्था करते रहे।

अब हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि लघु-उद्योग लगाने की बात तो छोड़िए 'लघुउद्योग-दिवस' मनाने की औपचारिकता भी लगभग भूल गए हैं। फिर भी कोई नवउद्यमी गलती से अगर अपने गांव कस्बे में कोई लघु उद्योग लगाना चाहता है तब शुरू होती है असली राम-कहानी।

2024 के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, इस घनघोर उपेक्षा के बावजूद देश के माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSME) क्षेत्र का भारत की जीडीपी में योगदान लगभग 30% है, जबकि कुल निर्यात में यह हिस्सेदारी 43% तक पहुँचती है। रोजगार सृजन में भी यह क्षेत्र अहम है। देश के कुल रोजगार का लगभग 110 मिलियन यहीं से आता है। चीन, वियतनाम जैसे देशों में यह योगदान भारत से कहीं अधिक है, जो बताता है कि हमारे सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी।

छत्तीसगढ़ ने अपनी औद्योगिक नीति 2024–29 में स्पष्ट किया है कि वह फूड प्रोसेसिंग, वुड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देगा। नीति में भूमि आवंटन, बिजली दरों में रियायत, ब्याज अनुदान, स्टार्टअप पैकेज जैसी कई सुविधाओं की बात है। दसकों पहले उद्योग लगाने के लिए कभी 'सिंगल विंडो' की भी बात हुई थी,, जो अब शायद 'सेवन-विंडो' में बदल गई है।  कागज़ पर लिखी नीतियों और ज़मीनी हकीकत के बीच जो खाई है, उसकी एक अनुभवजन्य बानगी पेश करना चाहूंगा। इस उदाहरण को "हांडी के चावल के  पकने की कहानी, हांडी के चावल के एक दाने की जुबानी " समझा जाय।

कबीर के शब्दों में कहें तो:-

"तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी।
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे।।"

   बस्तर में हमारे साथी किसान विगत वर्षों से जैविक खेती के साथ ही छाया में उगाई जाने वाली हल्दी, जिमीकन्द व औषधीय फसलों को छाया देने , तथा इस पेड़ की पत्तियों से हरी खाद बनाने एवं इसकी जड़ों से नाइट्रोजन वाली खाद प्राप्त करने के उद्देश्य से अपने खेतों पर आकेशिया की प्रजातियों के पौधे उगा रहे हैं। एक निश्चित समय के बाद इन पेड़ों को नहीं काटने पर धीरे धीरे ये स्वयं: ही नष्ट होने लग जाते हैं। ल्लेखनीय है कि इन किसानों ने यह भी  शपथ ली है कि एक भी पेड़ काटने पर उसके बदले हर किसान कम से कम दुगुना पेड़ लगाएगा। छत्तीसगढ़ बनने के बाद सरकार ने स्पष्ट रूप से यह आदेश भी जारी किया था कि  आकेशिया प्रजाति के पेड़ों की कटाई पर कोई रोक नहीं है और इसके परिवहन के लिए परमिट की भी आवश्यकता भी नहीं है। पर आदेश के लगभग 25 साल बाद वन विभाग, राजस्व विभाग अभी भी इसेअपने चंगुल से बाहर जाने देने को तैयार नहीं है,  इसका कारण भी सभी जानते ही हैं, इसलिए लिखने की जरूरत नहीं।       

      चूंकि बाजार में इसकी कच्ची लकड़ी का भाव नाममात्र का है, लेकिन अगर इसके ब्रिकेट्स बनें, इन्हें प्रसंस्कृत कर बेचें तो किसान को ठीक ठाक-भाव  मिल सकता है। केंद्र सरकार की नीति भी है कि 'थर्मल पावर यूनिटें' कम से कम पाँच प्रतिशत बायोमास जैसे लकड़ी या ब्रिकेट्स का उपयोग करें। प्रसंस्करण करने यह लकड़ी फर्नीचर के काम भी आ सकती है। उल्लेखनीय है कि भारत हर साल 35–40 हज़ार करोड़ रुपये की लकड़ी और टिंबर आयात करता है। यानी ऐसे उद्योग न सिर्फ़ आत्मनिर्भर भारत की रीढ़ बन सकते हैं, बल्कि बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भी बचा सकते हैं। शायद इसी वजह से छत्तीसगढ़ सरकार ने नई औद्योगिक नीति में लकड़ी आधारित उद्योगों को बस्तर में प्राथमिकता श्रेणी में रखा।

पर असली मज़ा तो यहीं से शुरू होता है। बस्तर के कुछ नवउद्यमी किसानों ने तय किया कि अपने आकेशिया प्लांटेशन फसल के प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन के लिए जगदलपुर के पास अपने खेतों पर एक छोटी सी इकाई डालेंगे। इससे इन्हें तथा इनके साथ जुड़े आकेशिया रोपण करने वाले अन्य किसानों को भी लाभ होगा, गांव के लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

   काम की शुरुआत हुई, सीए साहब से प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाई। क्योंकि सरकार अनुदान देने का दावा भी करती है। रिपोर्ट बनकर बैंक पहुँची, तो वहाँ से फरमान आया:

“ज़मीन कृषि भूमि है, पहले डायवर्ज़न कराइए।”
और बस, यहीं से यह रामकहानी शुरू हो गई।।

डायवर्ज़न के लिए राजस्व विभाग पहुँचे, तो उन्होंने कहा “ डायवर्सन तो हम  करेंगे, पर पहले जरूरी विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) तो लेकर लाओ।”

क्रम कुछ इस प्रकार था:

  • ग्राम पंचायत की सहमति,

  • बिजली विभाग की सहमति,

  • टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की सहमति,

  • राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग की सहमति,

  • वन विभाग की सहमति,

  • जिला उद्योग केंद्र में प्रोजेक्ट का पंजीयन,

  • इसके अलावा बैंक का एलओआई भी लगेगा(आगे अनुदान में इसकी महत्वपूर्णहै भूमिका है।)और दौड़ते दौड़ते 7-सात महीने बीत गए, और हम इन 7-सात गोलपोस्ट के बीच फुटबॉल की तरह इधर-उधर लुड़कते रहे। पर हमारा खाता अभी भी नहीं खुल पाया है।

सबसे पहले तो शुरुआत में हर विभाग कहता है कि आप पहले बाकी विभागों से अनापत्ति लेकर आइए।

जैसे कि, बिजली विभाग अगर कहे कि पहले आप 'जिला उद्योग केंद्र'  में प्रोजेक्ट का पंजीयन करा कर लाइए और जब आप 'जिला उद्योग केंद्र' में रजिस्ट्रेशन के लिए जाएं तो वो कहें कि पहले आप  हमें बिजली विभाग की अनापत्ति पत्र दिखाइए तो पंजीयन होगा। यानी पहले मुर्गी या पहले अंडा? ऐसे में बेचारा नवउद्यमी क्या करे? बाल नोचने के अलावा उसके पास क्या चारा है। 

ग्राम पंचायत की अनापत्ति: ग्राम पंचायतो में सरपंच चुनाव के बाद भी लगातार गुटबाजी और अंदरखाने लड़ाइयां चलते रहती हैं। अगर एक गुट मानता तो दूसरा अनिवार्य रूप से विरोध करता है। नतीजा: पंचायत की राजनीति में लग, कुटीर उद्योग तथा असल विकास कहीं गुम हो गया। भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण इतना सफल हुआ है कि मोहल्ले से लेकर पटवारी तक हर स्तर पर उसका 'जनतंत्रीकरण ' हो चुका है। बहरहाल ग्राम पंचायत ने इनके कई दसकों के सकारात्मक कार्यों को देखते हुए सबसे पहले अपनी अनापत्ति दे दी।

       बिजली विभाग यानी जोर का झटका,धीमा काम!: इनसे काम करवाने का मतलब है सरकारी परंपरागत तौर-तरीक़ों के दलदल में उतरना। यहां काम रोककर ही बाबू साहब व बड़े साहब लोग अपना महत्व जताते हैं। तीन महीने में तीन बार सर्वे कर चुके हैं। अब महीने दो महीने में ट्रांसफार्मर के लिए तथा लाइन के लिए टेंडर निकलेगा। फिर कहीं जाकर मुहूर्त देखकर काम शुरू होगा। यानी कि स्वर्ग से गंगा जी को धरती पर लाना सरल हो सकता है पर उद्योग चाहे जितना भी छोटा हो बिजली और ट्रांसफार्मर लगवाना, पर्याप्त सुविधा शुल्क देने के बावजूद, शायद उससे भी ज्यादा कठिन है।

  कोढ में खाज कि इस उद्योग के लिए वन-विभाग की भी NOC चाहिए। हांलांकि इसमें ना जंगल का कोई रोल है ना जंगल की लकड़ी का कोई रोल है और ना ही वन विभाग की कोई प्रत्यक्ष भूमिका है। प्रस्तावित योजना गांव, जिला, राज्य और राष्ट्रहित में थी, तथा पर्यावरण हित में थी। फिर भी महीनों तक किसी ने इस अछूत फ़ाइल की तरफ़ देखा तक नहीं।

    इस विभाग के युवा तेजतर्रार मंत्री केदार जी हमारे बस्तर के ही हैं और अपनी सुदीर्घ प्रशासनिक अनुभव तथा प्रशासनिक कार्य कुशलता के लिए जाने जाते हैं तथा मेरे छोटे भाई की तरह हैं, पर विभागीय घुटे हुए घाघ अफ़सर तो मगरमच्छ की तरह हैं और पानी में रहना है तो मगरमच्छों से भला कौन बैर मोल ले?

  सौ बात की एक बात यह है कि यह हमारी समझ से परे है कि किसान अपने खुद की जमीन पर अपने खेतों में, अपनी जेब के पैसे से खुद मेहनत करके आकेशिया, नीलगिरी, बांस या फिर कोई भी पेड़ लगाता है, पर जब यह फसल काटने योग्य हो जाती है तो उसको काटने तथा परिवहन के लिए हमें एसडीएम, तहसीलदार, पटवारी, फॉरेस्ट गार्ड, डिप्टी रेंजर, रेंजर डीएफओ आदि की अनुमति आखिर क्यों चाहिए? इन विभागों के पंजे से तथा इस अनावश्यक शिकंजे से खेती-किसानी और किसान को आज तक आजादी क्यों नहीं मिली?

दरअसल इसीलिए किसान पेड़ लगाने से कतराता है। हम भूल गए हैं कि धरती पर जब तक पेड़ हैं तभी तक ऑक्सीजन है। और पैसे डकारने के लिए बनाई गई यही नीति-रीति अगर आगे भी इसी तरह चलते रही तो एक दिन लोग ऑक्सीजन के लिए तड़प तड़प के मरेंगे, जैसे कोरोना के दरमियान लोग मरे थे।

  अब जरा और आगे बढ़िए। उद्योग लगाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग की NOC भी चाहिए। परियोजना स्थल हाईवे से 15 किमी दूर, आसपास गाँव तक नहीं फिर भी अनुमति तो लेनी ही पड़ेगी।” 

   अब राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग इतना भारी भरकम और अतिव्यस्त विभाग है कि इनके पास अनापत्ति-पत्र बनाने जैसे तुच्छ कार्य के लिए समय कहां होगा। यह विभाग तो आपको घूमाते घूमाते चक्करघिन्नी बना देगा

 अब आगे सबसे बड़ी कठिन हिमालयन समस्या है, 'टाउन एंड कंट्री प्लानिंग' की एनओसी हासिल करना। जहां इकाई लग रही है वहां न कोई टाउन है ना आने वाले बीसों साल तक किसी टाउन की प्लानिंग। स्पष्ट है कि लोकेशन शहर से 15 किलोमीटर दूर है, गांव तथा मोहल्ले भी दूर-दूर तक नहीं है। आसपास कोई रिहाइश या घर तक नहीं है।

लेकिन, जनाब चूंकि 'टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट' में 'कंट्री'  शब्द है, तो फिर देश में कहीं भी कुछ हो, इनकी सहमति तो अनिवार्य है। यह अलग बात की यहां छोटे-मोटे सुविधा शुल्क से काम चलने वाला नहीं इन्हें मोटी रकम डकारने की आदत होती है। यह विभाग' तो जैसे सिर्फ पैसा खाने, उगाहने के लिए बना है। इसके शरीर में जितने छेद हैं, यह हर छेद से पैसा ही पैसा खाता है। इसके अधिकारी तो छोड़िए अदने से अदने कर्मचारियों की भी ईमानदारी से जांच की जाए तो ऊपरी कमाई का अजीर्ण पाया जाना तय है।

जाहिर है यहां भी हमारे नवउद्यमी की दाल नहीं गली।

अंतिम काम स्वनामधन्य राजस्व-विभाग का ही था। राजस्व-विभाग मतलब हाथी के पांव में सबका पांव। इस विभाग का हेड जिले का सबसे पावरफुल अधिकारी यानी जिला कलेक्टर होते हैं। बरहाल कलेक्टर साहब से भले आप समय लेकर मिल सकते हैं ,  पर पटवारी साहब के दर्शन दुर्लभ होते हैं, और तहसीलदार साहब से मिलना तो साक्षात चक्र सुदर्शन धारी भगवान विष्णु की कृपा पाने से भी कठिन है। ये सब महाप्रभु काम करते हुए भले आपको कभी नहीं दिखते नहीं, पर इन सबके पास समय की भारी कमी है या यूँ कहिए कि कमी का बहाना भरपूर है।

हांलांकि ये सभी बेरियर्स पर वाजिब सुविधा शुल्क देने को भी तत्पर थे, पर यहाँ तो सिस्टम ही ऐसा है कि पैसा देने पर भी काम जल्दी नहीं होता। अलिखित नियम है, किसी भी छोटे-छोटे उद्योग को लगाने में आठ–दस महीने की चप्पल घिसाई तो तय है। इस दरम्यान कितने ही नवउद्यमी इनकी तरह निराश होकर उद्योग लगाने का विचार छोड़ देते होंगे। शायद सोचते होंगे “इससे अच्छा तो असंख्य चैनल तथा समाचार पत्रों में से किसी एक का पत्रकार बन जाओ, इन अधिकारियों की खबरें लो और पेट भरो।” खर्चा कुछ नहीं, बस एक अदद स्मार्टफ़ोन चाहिए। या फिर रियल एस्टेट में दलाली करो। जमीन किसी और की, पैसा किसी और का, कमीशन अपना।

   पर अगर छोटे शहर गांव का कोई नवउद्यमी अपने गांव में सचमुच में कोई 'लघु-उद्योग' लगाना चाहता है तो , ज़मीन का इंतज़ाम, पूंजी का इंतज़ाम, सात विभागों के तिलिस्म को तोड़ना,  यह सब एक साथ सफलता पूर्वक कर पाना *अभिमन्यु के चक्रव्यूह  से कम नहीं। और यहाँ कुछेक दरवाज़ों की चाबी तो सरकारी विभागों का हर ताला खोलने में अव्वल रहने वाले बेचारे गांधी जी के पास भी नहीं है।

सरकार राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय इन्वेस्टर मीट आयोजित करती है। देश-विदेश के उद्योगपतियों के लिए लाल कालीन बिछाया जाता है।मुख्यमंत्री और मंत्रीगण बड़े-बड़े उद्योगपतियों से मिलते हैं, उन्हें तमाम तरह की सुविधा देने का वादा करके, समझौते साइन करते हैं। पर शायद ही कभी यह सोचते होंगे कि गांव तहसील स्तर पर एक छोटा सा उद्योग लगाने को इच्छुक एक छोटे उद्यमी को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है।

अंततः इन किसानों ने तो 'लघु-उद्योगपति' बनने का विचार त्याग दिया और भारी मन से तय किया कि, अब अपनी कठोर मेहनत से उगाए गए पेड़ों को कलेजे पर पत्थर रखकर औने-पौने  बेचकर छुट्टी पाएंगें।

पर अपनी राज्य सरकार से, हमारे सहज सरल  मुख्यमंत्री माननीय विष्णुदेव साय जी से पूरी विनम्रता के साथ निवेदन है कि, अगर दसकों से जैविक खेती, प्रदेश तथा देश की खेती किसानी और किसानों के लिए तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित भाव से काम कर रहे किसान भी तमाम कोशिशों के बावजूद अपने ही राज्य में  बस्तर जैसे प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में भी एक छोटा सा उद्योग लगाने की औपचारिकताएँ पूरी करने में ही आठ महीने बिता दें, तो गांव का कोई नवउद्यमी अपने गाँव कस्बे में लघुउद्योग कैसे लगा पाएगा? और यदि 'लकड़ी/वुड प्रसंस्करण' की ऐसी इकाइयों को परमिशन ही नहीं दिया जाना है तो फिर इस नए उद्योग नीति में प्राथमिकता की श्रेणी में इसे रखा ही क्यों गया है?

क्या देश में सिर्फ़ अडानी -अंबानी, टाटा- बिड़ला ही उद्योग जैसे  बड़े औद्योगिक घराने तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियां ही उद्योग लगाएंगे। क्योंकि उनके पास वकीलों चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की फ़ौज है, बड़ी बैंकें उनके आगे-पीछे घूमती हैं, उन्हें रुपया दो रुपया फिट की दर से मुफ्त के भाव में ज़मीनें दे दी जाती है। इतना ही नहीं, इनके उद्योगों के लिए जमीन देने के लिए हमारे यही कलेक्टर साहब, एसडीएम साहब, तहसीलदार साहब, पटवारी साहब सब मिलकर कैम्प लगाते हैं, और दूसरी ओर‌ अपने ही गांव कस्बे में छोटा लघु उद्योग लगाने का प्रयास कर रहे ऐसे नवउद्यमी विभिन्न विभागों की चक्की में पिसते रहते हैं।

गाँधीजी के हिंद स्वराज में गाँव आधारित उद्योगों का जो सपना था, वह लालफ़ीताशाही और भ्रष्टाचार की इस व्यवस्था में कहीं खो गया है। सुविधा शुल्क देने पर भी समय पर काम का न होना, या अंततः काम नहीं होना सबसे ज्यादा निराश करता है। लघु-उद्योग दिवस पर यह सवाल सरकार से, व्यवस्था से तथा खुद से पूछना होगा कि क्या हम सचमुच छोटे उद्यमियों के लिए रास्ता आसान कर पाए हैं या नहीं, और ऐसा करना हम सचमुच चाहते भी हैं या नहीं?

English Summary: national small industries day msme rural entrepreneurship challenges bureaucracy red tapism India Published on: 29 August 2025, 05:25 PM IST

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