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बिहार में गूंजा बस्तर का नाम, साहित्यकार-कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजाराम त्रिपाठी का सम्मान

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त किसान एवं पर्यावरण चिंतक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने भागलपुर में मातृभाषा के महत्व पर जोर देते हुए टिकाऊ खेती, रसायनों के कम उपयोग और जड़ी-बूटी आधारित कृषि को बढ़ावा देने की बात कही. उन्होंने किसानों तक तकनीक मातृभाषा में पहुंचाने और प्राकृतिक ग्रीनहाउस मॉडल अपनाने का आह्वान किया.

KJ Staff
  • भागलपुर में साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने छत्तीसगढ़ के प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एवं साहित्यकार डॉ. राजाराम त्रिपाठी का विशेष सम्मान किया.

  • मातृभाषा को समाज, संस्कृति और कृषि ज्ञान की सबसे मजबूत आधारशिला बताते हुए अंगिका भाषा के सम्मान का आह्वान.

  • रासायनिक खेती को मिट्टी, जल, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताया.

  • बस्तर में विकसित “मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16” और कम लागत प्राकृतिक ग्रीनहाउस मॉडल की जानकारी साझा की.

  • किसानों और साहित्यकारों से प्रकृति आधारित खेती तथा किसान-केंद्रित साहित्य सृजन का आह्वान.

"भागलपुर की धरती रत्नगर्भा है और अंग क्षेत्र पूर्व का बौद्धिक द्वार है." यह विचार अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त किसान, पर्यावरण चिंतक एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने व्यक्त किए. वे एक स्थानीय होटल में युग चेतना फाउंडेशन, अंग-जन-गण, अंग-मदद फाउंडेशन और अंगिका सभा फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “मातृभाषा के महत्व” विषयक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.

कार्यक्रम के दौरान क्षेत्र के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों द्वारा डॉ. त्रिपाठी का विशेष सम्मान किया गया. बिहार में डॉ. राजाराम त्रिपाठी की पहचान एक सफल किसान के साथ-साथ एक सशक्त और लोकप्रिय साहित्यकार के रूप में विशेष रूप से स्थापित रही है, जिसके कारण बड़ी संख्या में साहित्यकारों और सांस्कृतिक हस्तियों की उपस्थिति कार्यक्रम में देखने को मिली.

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि समाज की आत्मा होती है. उन्होंने अंगिका भाषा को मान-सम्मान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास करने की अपील की तथा इस दिशा में हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया.

आधुनिक कृषि में बढ़ते रासायनिक उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि खेतों में डाली जा रही दवाएं मिट्टी, पानी और हवा को विषाक्त बना रही हैं, जिसका सीधा दुष्प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. पूर्वजों की कृषि परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “पहले पेड़ लगाओ, फिर खेती करो” की पद्धति आज की टिकाऊ खेती का वास्तविक समाधान है.

डॉ. त्रिपाठी ने कृषि वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि किसानों तक तकनीक और ज्ञान उनकी मातृभाषा में पहुंचाया जाए, तभी उसका वास्तविक लाभ संभव है. उन्होंने किसानों को बस्तर स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर का भ्रमण करने का आमंत्रण देते हुए वहां विकसित नवाचारों की जानकारी दी.

उन्होंने देश-विदेश में चर्चित विशेष काली मिर्च प्रजाति “मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16 (MDBP-16)” की विशेषताओं पर प्रकाश डाला. साथ ही 40 लाख रुपये प्रति एकड़ लागत वाले पारंपरिक पॉलीहाउस के विकल्प के रूप में मात्र 2 लाख रुपये में विकसित टिकाऊ एवं बहुउपयोगी प्राकृतिक ग्रीनहाउस मॉडल के लाभों से भी अवगत कराया.

साहित्यकारों से उन्होंने किसानों को केंद्र में रखकर रचनाएं करने का आह्वान करते हुए कहा कि आज किसान की स्थिति प्रेमचंद के ‘गोदान’ के होरी-धनिया से भी अधिक कठिन हो चुकी है. केले की खेती में बढ़ते रासायनिक उपयोग पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि उपवास में खाया जाने वाला केला भी अब स्वास्थ्य जोखिम का कारण बन सकता है.

उन्होंने कहा कि “मिट्टी बचेगी तो पर्यावरण बचेगा और किसान भी समृद्ध होगा” तथा खेती की शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने पर विशेष जोर दिया. उत्तरवाहिनी गंगा के कारण इस क्षेत्र के आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए उन्होंने जड़ी-बूटी आधारित खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई.

कार्यक्रम की अध्यक्षता युग फाउंडेशन के संरक्षक डॉ. शंभू दयाल खेतान ने की. विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. मनोज, डॉ. मीरा झा, अंग-जन-गण के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुधीर मंडल, फ्लिंट लाइन एविएशन अकादमी के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश मिश्रा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने किया. वरिष्ठ कवि राजकुमार ने काव्य प्रस्तुति दी तथा मंजूषा कलाकार मनोज पंडित ने डॉ. राजाराम त्रिपाठी को अंगवस्त्र एवं मंजूषा पेंटिंग भेंट कर सम्मानित किया.

English Summary: dr rajaram tripathi mother language importance bhagalpur angika sustainable farming natural greenhouse model Published on: 20 February 2026, 06:43 PM IST

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