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जलवायु संकट के बीच पूसा में ‘मल्टी-ओमिक्स’ पर मंथन, वैज्ञानिक खोजेंगे लचीली फसलों का रास्ता

बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और चरम मौसमी घटनाओं के बीच कृषि क्षेत्र गंभीर दबाव में है. इसी संदर्भ में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में 21-दिवसीय विंटर स्कूल की शुरुआत हुई है, जिसमें ‘एकीकृत बहु-ओमिक्स दृष्टिकोण’ के जरिए जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्मों के विकास पर चर्चा और प्रशिक्षण दिया जाएगा. देश के नौ राज्यों के वैज्ञानिक इसमें भाग ले रहे हैं.

फार्मर द जर्नलिस्ट

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव के बीच फसलों की सहनशीलता बढ़ाने पर वैज्ञानिक समुदाय का फोकस तेज हो रहा है. गौरतलब है कि इसी कड़ी में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा समस्तीपुर (RPCAU), के स्नातकोत्तर कृषि महाविद्यालय में “जलवायु-प्रतिरोधी कृषि के लिए एकीकृत बहु-ओमिक्स दृष्टिकोण” विषय पर 21-दिवसीय विंटर स्कूल कार्यक्रम की शुरुआत हुई है. कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पुण्यव्रत सुविमलेंदु पांडे ने किया.

देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और संकाय सदस्यों की भागीदारी के साथ यह आयोजन राष्ट्रीय स्वरूप ले चुका है. बिहार, उत्तर प्रदेश, मेघालय, मिजोरम समेत कुल नौ राज्यों के प्रतिभागी इसमें शामिल हो रहे हैं.

विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य जलवायु-स्मार्ट कृषि के लिए जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, प्रोटीओमिक्स और मेटाबोलोमिक्स जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के एकीकृत उपयोग पर क्षमता निर्माण करना है.

क्यों अहम है ‘मल्टी-ओमिक्स’ दृष्टिकोण?

उद्घाटन सत्र में कुलपति डॉ. पांडे ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़, लवणता और तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव जैसी परिस्थितियां खेती के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं. ऐसे में पारंपरिक प्रजनन विधियों के साथ उन्नत जैव-प्रौद्योगिकी उपकरणों का समन्वय जरूरी है.

उन्होंने कहा, “जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, प्रोटीओमिक्स और मेटाबोलोमिक्स के एकीकरण ने कृषि अनुसंधान में नई संभावनाएं खोली हैं. इन तकनीकों के माध्यम से तनाव-प्रतिक्रियाशील जीन, प्रोटीन और चयापचय मार्गों की पहचान कर जलवायु-प्रतिरोधी किस्मों का विकास संभव है.”

विशेषज्ञों के अनुसार, ‘मल्टी-ओमिक्स’ दृष्टिकोण फसल के जैविक तंत्र को समग्र रूप से समझने में मदद करता है. यानी डीएनए स्तर से लेकर कोशिका में बनने वाले प्रोटीन और मेटाबोलाइट्स तक. इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी फसल पर गर्मी, सूखा या जलभराव का प्रभाव किस स्तर पर और कैसे पड़ता है.

जलवायु संकट और कृषि अनुसंधान

निदेशक (अनुसंधान) डॉ. ए. के. सिंह ने कहा कि वर्तमान कृषि परिदृश्य में इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम समय की मांग हैं. जलवायु परिवर्तन अब सैद्धांतिक चिंता नहीं, बल्कि खेत-खलिहान की वास्तविकता है. ऐसे में जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्मों का विकास प्राथमिकता बन चुका है.

उन्होंने यह भी बताया कि विंटर स्कूल के दौरान प्रतिभागियों को देशभर से आमंत्रित विशेषज्ञों के व्याख्यान और व्यवहारिक प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा, जिससे वे अपने-अपने संस्थानों में उन्नत शोध को आगे बढ़ा सकेंगे.

अंतःविषय सहयोग पर जोर

स्नातकोत्तर कृषि महाविद्यालय के डीन डॉ. मयंक राय ने कार्यक्रम की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि इसमें सैद्धांतिक सत्रों के साथ प्रयोगशाला आधारित प्रशिक्षण और समूह चर्चा भी शामिल हैं.

बेसिक साइंस कॉलेज के डीन डॉ. अमरेश चंद्र ने कृषि अनुसंधान में अंतःविषय सहयोग की आवश्यकता रेखांकित की. उनके अनुसार, “जलवायु-प्रतिरोधी कृषि केवल एक विभाग का विषय नहीं है. इसमें जैव प्रौद्योगिकी, पौध प्रजनन, मृदा विज्ञान, कृषि अभियांत्रिकी और डेटा विज्ञान सभी की भूमिका है.”

आगे की राह

21 दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों को अत्याधुनिक शोध उपकरणों और विश्लेषण पद्धतियों से परिचित कराया जाएगा. समापन सत्र में प्रतिभागी अपने अनुभव और सीख साझा करेंगे.

कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन उपकुलसचिव डॉ. सतीश कुमार सिंह ने दिया. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न संकाय सदस्य, वैज्ञानिक और पदाधिकारी उपस्थित रहे.

जलवायु परिवर्तन के दौर में कृषि को टिकाऊ और लचीला बनाने की दिशा में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को विशेषज्ञ भविष्य की तैयारी के रूप में देख रहे हैं. सवाल अब यह है कि प्रयोगशालाओं में विकसित ज्ञान कितनी तेजी से किसानों के खेतों तक पहुँच पाता है.

लेखक: रामजी कुमार, एफटीजे, समस्तीपुर, बिहार,

English Summary: climate crisis multi omics winter school rpcau pusa climate resilient crops Published on: 11 February 2026, 02:09 PM IST

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