माफ़ी हुज़ूर !

कितना कुछ है करने को

पर ये "न" करने का सुरुर

माफ़ी हुज़ूर !

 

दुनिया खाए केले

मैं खाऊं खजूर

माफ़ी हुज़ूर !

 

कुछ नहीं

मिट्टी का खिलौना है

और कागज़ का गुरुर

माफ़ी हुज़ूर !

 

अब तू-तू और तुम की जगह नहीं

होनी चाहिए "मैं-मैं-मैं" ज़रुर

माफ़ी हुज़ूर !

 

गिरीश पांडे, कृषि जागरण

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