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मधुमेह रोगियों के लिए संजीवनी बूटी है यह फल...

हमारे देश में ककोड़ा हिमालय से ले कर कन्याकुमारी तक पाया जाता है. यह ज्यादातर गरम व नम जगहों पर बाड़ों में मिलता है. उत्तर प्रदेश में ककोड़ा की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. बिहार के पहाड़ी क्षेत्रों राजमहल, हजारीबाग व राजगीर और महाराष्ट्र के नम पहाड़ी इलाकों, दक्षिण राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, असम व पश्चिम बंगाल के जंगलों में यह अपने आप ही उग आता है. ककोड़ा की पौष्टिकता, उपयोगिता व बाहरी इलाकों में इस की बढ़ती मांग के कारण अब किसान इस की खेती को ज्यादा करने लगे हैं. ककोड़ा फल की सब्जी बेहद स्वादिष्ठ होती है. जुलाई से अक्तूबर तक इस का फल बाजार में उपलब्ध रहता है और इस की बाजारी कीमत 18-20 रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है. इस फल के बीज से तेल निकाला जाता है, जिस का उपयोग रंग व वार्निश उद्योग में किया जाता है.

ककोड़ा की जड़ यानी कंद का इस्तेमाल मस्सों का खून रोकने और पेशाब की बीमारियों में दवा के रूप में किया जाता है. इस के फल को मधुमेह के मरीजों के लिए बहुत असरदार पाया गया है. इस के फल करेले की तरह कड़वे नहीं होते.

पौधे तैयार करने की विधि

ककोड़ा के पौधों को बीज, कंद या तने की कटिंग से तैयार किया जा सकता है.

बीज द्वारा

पौधे तैयार करने के लिए सब से पहले बीजों को 24 घंटे तक पानी में डुबो कर रखा जाता?है. इस के बाद तैयार खेत के अंदर बो दिया जाता है. बीज से मिले पौधों में करीब 50-50 फीसदी नर व मादा पाए जाते हैं, जबकि ज्यादा उत्पादन के लिए नर व मादा पौधों का अनुपात 1:10 होना चाहिए. इस के लिए हर गड्ढे में 2-3 बीज बोए जाते?हैं और बाद में फूल आने पर नर व मादा पौधे सही अनुपात में रख लिए जाते हैं.

जड़कंद द्वारा

ककोड़ा के पौधे जड़कंद के द्वारा भी तैयार किए जा सकते हैं. कंद द्वारा तैयार पौधे काफी स्वस्थ होते हैं. सब से पहले ककोड़ा के कंद को तैयार खेत के अंदर बो दिया जाता है. रोपाई के 10-15 दिनों बाद पौधा जमीन के बाहर आ जाता है.

तने की कटिंग द्वारा

इस तरीके में ककोड़ा के पौधों को हार्मोन में भिगो कर व डुबो कर रखा जाता है. कटिंग हमेशा पौधे के ऊपरी भाग से होनी चाहिए. कटिंग करने के बाद पौधे को जुलाई व अगस्त महीने में खेत में रोपना चाहिए. 10-15 दिनों बाद ही कटिंग्स से नई पत्तियां निकलनी शुरू हो जाती हैं.

खेत की तैयारी व रोपाई

ककोड़ा सभी प्रकार की जमीनों में उगाया जा सकता?है, लेकिन जिस जमीन में पानी भरा रहता हो, उस में इसे नहीं लगाना चाहिए. इस की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सही रहती है. सब से पहले खेत की 3 या 4 बार जुताई की जाती है, ताकि मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी व बारीक हो जाए. अब खेत में अंदर 30 से 45 सेंटीमीटर गोलाई के 30 सेंटीमीटर गहरे गड्ढे तैयार करने चाहिए. गड्ढे में 2 किलोग्राम कंपोस्ट खाद, एनपीके (15:15:15 ग्राम) और 3 ग्राम फ्यूरोडान डालनी चाहिए. पौध रोपने से 1 दिन पहले गड्ढे की अच्छी तरह से सिंचाई कर देनी चाहिए. जैसे ही बारिश शुरू हो, हर गड्ढे में 2-2 पौधे लगा कर सिंचाई कर देनी चाहिए, ताकि पौधे मुरझाएं नहीं. यदि बारिश नहीं होती है, तो पत्ती निकलने तक हर रोज पौधे की सिंचाई करते रहना चाहिए. इसी तरह बीज और कंद द्वारा पौधे तैयार किए जा सकते हैं.

जहां पर सिंचाई की सुविधा है, उन इलाकों में कंद द्वारा पौधे फरवरी या मार्च में भी लगाए जा सकते हैं. इस समय तैयार फसल में अप्रैल के आखिर से सितंबर तक फूल आते रहते हैं जल्दी ही फलों का उत्पादन शुरू हो जाता है.

नाइट्रोजन उर्वरक का छिट्टा

10 ग्राम यूरिया 4-5 पत्ती निकलने पर हर गड्ढे में डालना चाहिए. अब फिर से 30 दिनों के अंतर पर 15 ग्राम यूरिया हर गड्ढे में डालना चाहिए. ककोड़ा के फल फूल आने के 15 से 20 दिनों के अंदर तैयार हो जाते हैं. यदि फलों को सही समय पर नहीं तोड़ा जाता है, तो वे पीले हो कर पक जाते?हैं, जिस से वे सब्जी के लिए सही नहीं रहता. इस तरह तैयार फसल से 1 पौध से 42 से 60 फल तक मिल सकते?हैं. इस के फल का उत्पादन 75 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पाया गया है.

कीट व रोग

ककोड़ा खरीफ की फसल में उगाया जाता है, इसलिए इस दौरान कीटपतंगों का हमला भी ज्यादा पाया जाता है. इस फसल पर भी काफी कीट व बीमारियां अब तक देखी गई?हैं, जैसे एपीलपचना बीटल (एपीलाचना प्रजाति), फ्रूटफ्लाई (लासरओपटेरा प्रजाति, डेकस मेकुलेटस), ग्रीन पंपकिन बीटल (रेफीडोपाल्पा प्रजाति), रूट नाट निमेटोड (मेलीओडोगाइन इनकोगनिटा), पाउडरी मिल्ड्यू (इरीस्फे सीकोरेसिरम), फल सड़न (पाइथियम एफारीडेरेमेंटम) वगैरह.

फसल को कीटों व बीमारियों से बचाने के लिए कार्बोफ्यूरान 3 ग्राम प्रति गड्ढा 30 दिनों के अंतराल पर इस्तेमाल में लाना चाहिए और कार्बोरिल 50 डब्ल्यूपी (2 सीसी प्रति लीटर) और मेलाथियान 50 ईसी (2 सीसी प्रति लीटर) को डाइथेन एम 45 (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) के साथ पौधों पर छिड़कने से बीमारी से छुटकारा मिल जाता है.

जहां तक हो सके बीमारी रहित बीज, कंद व कटिंग्स इस्तेमाल में लाने चाहिए. किसानों को चाहिए कि वे अपने जिले व प्रदेश में मौजूद कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि विज्ञान केंद्रों के माहिर वैज्ञानिकों से ककोड़ा उत्पादन की जानकारी हासिल कर के नई तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर अच्छा उत्पादन हासिल करें.



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