जानिए क्या है पादप संगरोध एवं इतिहास

सबसे पहले हम बात करते हैं संगरोध की, संगरोध शब्द कोई नया नहीं है। आज से कई सौ साल पहले मध्य कालीन युग के दौरान गिल्टी रोग या काली महामारी का आक्रमण एशिया से यूरोप में हुआ था। चूंकि ये बीमारी मानव के आवागमन से एशिया से यूरोप में फैल रही थी, तब सर्वप्रथम इटली ने इसके रोकथाम के लिए नियम बनाया था। 1377 ई॰ में रगुस्ता के बन्दरगाह पर एक नियम लागू किया गया इसके द्वारा प्लेग को रोकने के लिए आने जाने वाले यात्रियों को अलग कर दिया जाता था। यह कानून 40 वर्षो के लिए लागू किया गया था । इसी आधार पर अन्य देशों ने भी काली महामारी से निजात पाने के लिए कानून बनाए। आज संगरोध शब्द का प्रयोग प्रायः सामान्य रूप से पादप स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के लिए किया जाता है।

क्या है पादप संगरोध?

 पादप नाशकजीवों एवं रोगों के उन क्षेत्रों में जहां वह नहीं पाये जाते हैं, अपवर्जन, प्रसार या फैलाव एवं निरोध या निवारण अथवा स्थापित होने में विलम्ब के उद्देश्य से कृषि विकास सामग्री के संचलन या आयात एवं निर्यात पर विधिक या कानूनी प्रतिबंध को एक पादक संगरोध या संपर्करोध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। संगरोध या संपर्करोध अर्थात ‘‘क्र्वरन्टीन’’ शब्द प्राचीन रोमन भाषा के शब्द “क्वारंटम” से बना है जिसका अर्थ 40 होता है।

 

पादप संगरोध नियमन या संपर्क रोध विनियम

संक्षिप्त इतिहास

      सर्वप्रथम वर्ष 1660 में फ्रांस के रोएन नामक स्थान पर बारबेरी झाड़ियों के विरुद्ध संगरोध विनियम या कानून उनके विस्तार को रोकने के लिए बनाया गया था, क्योंकि उस समय भी यह विश्वास किया जाता था कि इन झाड़ियों का संबंध गेहूँ के कृष्ण किट्ट या काला तना किट्ट (पक्सीनिया ग्रेमिनिस ट्रिटिसाई) से है। वर्ष 1873 में जर्मनी में पादप एवं पादप उत्पादों के आयात को अमेरिका से रोकने के लिए एक निषेधरोक पारित किया गया था जिससे कि कोलेराडो आलू भृंग के प्रवेश को रोका जा सके। वर्ष 1877 में इस भृंग के प्रवेश एवं प्रसार या फैलाव को रोकने के लिए ग्रेटब्रिटेन-आयरलैंड संयुक्त राज्य विनाशकारी नाशकजीव अधिनियम’ पारित किया गया था। वर्ष 1891 में अमेरिका में प्रथम पादप संगरोध उपाय अंगूर के कीट फिलाक्सेरा वाइटीफोली के प्रसार को रोकने के लिए कैलीफोर्निया राज्य के सैनपैड्रो समुद्र बन्दरगाह पर एक निरीक्षण केन्द्र स्थापित करके किया गया था। बाद में अमेरिका के सभी राज्यों ने इस कीट के प्रसार या फैलाव को रोकने के लिए संगरोध नियम बनाकर लागू कर दिये, परन्तु इससे कोई अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई थी। अंत में वर्ष 1912 में अमरीकी काँग्रेस ने संघीय पादप संगरोध अधिनियम पारित करके पूरे देश में लागू कर दिया, जिसके अन्तर्गत पौधों या पौधों से संबन्धित किसी भी सामग्री के बाहर से मंगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इससे पहले वर्ष 1903 में डेनमार्क में संगरोध नियम और वर्ष 1909 में आस्ट्रेलिया में संघीय पादक संगरोध सेवा को स्थापित कर दिया गया था। भारत में भी वर्ष 1914 में विनाशी कीट एवं नाशकजीव या नाशकरोग अधिनियम पारित किया गया था।

  विश्व स्तर पर प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण अधिवेशन को वर्ष 1881 में चिन्हित किया गया था, जिसका उद्देश्य अत्यन्त विनाशी नाशकजीवों के प्रसार या फैलाव को रोकना था। इस अधिवेशन को फ़िलाक्सेरा अधिवेशन के नाम से पुकारा गया था तथा इसको वर्ष 1889, 1929 एवं 1951 में संशोधित किया गया था। यद्दपि संपूर्ण विश्व के देशों की सरकारें तथा पादक रोगविज्ञानी एवं कीटविज्ञानी पादप रोगों और कीटों से फसलों के पौधों की सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को महसूस कर रहे थे, परन्तु सर्वप्रथम वर्ष 1914 में ‘अंतर्राष्ट्रीय कृषि संस्थान की देख-रेख में अन्तर्राष्ट्रीय पादप रक्षण सहमति बनी थी। इस सहमति के फलस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय कृषि संस्थान के पचास सदस्य देशों द्वारा वर्ष 1919 में ‘अंतर्राष्ट्रीय पादप रक्षण सहमति’ को ग्रहण कर लिया गया था और तदनुसार, एक पादप आरोग्यता या स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र देने पर सहमत हुये थे, जिससे कि अंतर्राष्ट्रीय जहाजरानी के पौधे एवे उनसे संबंधित सामग्री रोग मुक्त हो सके। परन्तु वर्ष 1932 तक यह अंतर्राष्ट्रीय सहमति प्रभावकारी सिद्ध नहीं हो पायी थी तथा इसी बीच वर्ष 1889 के बाद रोम में वर्ष 192 में ‘प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पादप रक्षण कान्फ्रेंस’ की बैठक भी हुई थी, क्योंकि इसी बीच प्रथम विश्व युद्ध एवं द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से संपूर्ण विश्व त्रस्त हो चुका था। जब वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन (अब 188 सदस्य देश) हुआ तो इसके सदस्य देशों ने भी संयुक्त प्रयासों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण की समस्याओं को हल करने की इच्छा व्यक्त की और इसके फलस्वरूप अक्टूबर 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत खाद्य एवं कृषि संगठन का गठन हुआ। जिसके तत्वाधान में वर्ष 1951 में रोम में द्वितीय ‘ अंतर्राष्ट्रीय पादप रक्षण अधिवेशन’ अथवा रोम अधिवेश का आयोजन किया गया था। भारत सरकार भी इसकी वर्ष 1952 में हस्ताक्षरी हुई। इस अधिवेशन में संयुक्त राष्ट्र संघ के लगभग सभी सदस्य देशों ने भाग लिया था तथा अंतर्राष्ट्रीय  सीमाओं के पार, विधान या कानून एवं संगठनों द्वारा, रोगों एवं नाशकजीवों के प्रवेश एवं प्रसार या फैलाव को रोकने के लिए विभिन्न देशों के संगरोध विनियमों में सिद्धांत एवं क्रियाविधियों को निश्चित किया गया था और बाद मे समस्त सदस्य देशों ने इस प्रलेख पर हस्ताक्षर किये थे। इस अधिवेशन में एक मॉडल पादप आरोग्यता प्रमाण-पत्र या रोम प्रमाण-पत्र भी प्रदान किया गया जो सभी सदस्यों द्वारा अपनाया गया। सभी हस्ताक्षर करने वाली सरकारों को विभिन्न कार्यों की कार्यान्वित करने के लिए निम्न व्यवस्था या प्रबंध करने के लिए कहा गया था।

  1. एक आधिकारिक या शासकीय (राजकीय) वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण सेवा को स्थापित करना जो मुख्य रूप से संगरोध विषयों के अतिरिक्त, पादप आरोग्यता या स्वास्थ्य प्रमाणीकरण तथा देश के भीतर पादप आरोग्यता स्थिति की निगरानी (संनिरीक्षण) करने और प्रमुख महत्व के हानिकारक जीवों को नियंत्रित करने के लिए कार्याधिकृत हों।
  2. प्रौद्योगिकी स्थानांतरण निश्चित करने वाला तंत्र तथा
  3. एक अनुसंधान संगठन स्थापित करना।

रोम सम्मेलन में उपरोक्त व्यवस्थाओं के आधार पर निम्न प्रस्तावों को पारित किया गया था:

  1. एक आधिकारिक या शासकीय पादप रक्षण संगठन का गठन किया जायेगा जिसके अन्तर्गत निम्न कार्य किये जायेंगे:

क) खेती किये गये क्षेत्रों में फसलों के पौधों, फलों एवं पादप उत्पादों का ढुलाई के समय और शीत संग्रहागारों में निरीक्षण करना तथा उनमें फैलने वाले रोगों एवं कीटों की सूचना देना और उनके नियंत्रण उपायों की विधियों को बताना।

ख) पादप एवं पादप उत्पादों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा भेजे हुए माल तथा जहां तक संभव हो सके अन्य सामग्री की निगरानी भी करना, जो किसी रोग या कीटों के वाहक हों और भंडारण एवं आवागमन के सभी साधनों, जो अन्तर्राष्ट्रीय पादप एवं पादप उत्पादों के व्यापार में प्रयोग किये जाते हों, का निरीक्षण एवं देखभाल करना, जिससे कि पौधों के रोग या रोगजनक अथवा उनका संचारण करने वाले कीट अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को पार करके अन्य दूसरे देश में न पहुँच सकें।

ग) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में पादप एवं पादप उत्पादों के भेजे हुए माल, उनके पात्रों (बोरे, टोकरे, पेटियाँ या पैकिंग सामग्री) भंडारण स्थान तथा इस कार्य में लगे हुए सभी आवागमन के साधनों का संक्रमणहरण अथवा विसंक्रमण या रोगाणुनाशन अथवा पीड़क-हरण या विग्रसन करना।

घ) भेजे हुए पादप एवं पादप उत्पादों के माल का उत्पत्ति-स्थान एवं उसका पादप आरोग्यता प्रमाण-पत्र जारी करना।

ड.) विभिन्न फसलों के पौधों के रोगों एवं कीटों से संबंधित जानकारी तथा उनसे रक्षण संबंधी ज्ञान को देश में वितरित करना।

च) पादप रक्षण के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी स्थानांतरण निश्चित करने वाला तंत्र तथा एक अनुसंधान एवं जांच संगठन स्थापित करना।

  1. वनस्पति या पादप रक्षण संगठन का पूर्ण विवरण एवं उसका उद्देश्य तथा उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन का पूर्ण विवरण संयुक्त राष्ट्र कृषि एवं खाद्य संगठन के महानिदेशक को भेजना।
  2. देश में पादक रोगों एवं कीटों के प्रवेश को रोकने के लिए यह भी सहमति व्यक्त की गयी कि सरकार को पादप एवं पादप उत्पादों के आयात के नियंत्रण का पूर्ण अधिकार होगा तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सरकारें -

क) किसी पादप या पादप उत्पाद के आयात पर कोई विरोध अथवा मांग की व्यवस्था कर सकती है,

ख) किसी विशेष पादप या पादप उत्पाद किसी पौधे या पौधों से संबंधित किसी माल के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा सकती है

ग) पादप या पादप उत्पादो के माल का निरीक्षण कर सकती है अथवा उसे रोक सकती है,

घ) किसी पादप या पादप उत्पादों को उपचारित कर सकती हैं या उसे नष्ट कर सकती है, अथवा उसके देश में आगमन को अस्वीकार कर सकती है या फिर ऐसे माल के उपचारित करने अथवा उसे नष्ट करने की मांग कर सकती है।

 संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने विभिन्न देशों के लिए उपरोकत विनियमो के लाभदायक सारांशों को ‘पादप संगरोध विनियमों का सार संग्रह’ में प्रकाशित किया है तथा इसके परिशिष्टों एवं नये विनियमों को समय-समय पर खाद्य एवं कृषि संगठन वनस्पति-संरक्षण विज्ञप्ति में भी प्रकाशित किया जाता है। भारत सरकार ने इसी संगठन की एक क्षेत्रीय शाखा-दक्षिण-पूर्व एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र के पादप रक्षण समिति द्वारा आयोजित पादप रक्षण सहमति पर भी हस्ताक्षर किये हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के संरक्षण में एक अन्तर्राष्ट्रीय वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण संगठन की स्थापना की गयी है जो उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए और उपरोक्त पारित प्रस्तावों को प्रभावी एवं लागू करने के प्रयास करता है तथा विश्व के किसी भी भाग में उत्पन्न पादक रोगों की समस्याओं पर दृष्टि रखता है। यह संगठन अपनी क्षेत्रीय शाखाओं की सहायता से पादप रक्षण विज्ञप्तियों द्वारा नये-नये या उग्र पादप रोगों के विषय में समय-समय पर सूचना प्रदान करता है और उनके प्रबंध के लिए उपयुक्त सुझाव देता है। इस संगठन के अन्तर्गत जीव-भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर निम्न दस क्षेत्रीय वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण संगठन स्थापित किये गये हैं:

  1. यूरोपीय एवं भूमध्यसागरीय पादप रक्षण संगठन।
  2. अंतरा-अफ्रीकी पादप आरोग्यता परिषद।
  3. दक्षिण-पूर्व एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र के लिए पादप रक्षण समिति।
  4. निकट पूर्वी भूमध्यसागरीय पादप रक्षण आयोग।
  5. कैरीबियन पादप रक्षण आयोग।
  6. उत्तरी अमरीकी पादप रक्षण संगठन।
  7. आर्गेनिज्मों इन्टरनेशनल रीजरल डे-सैनिडैड एग्रोपेकुआरिया।
  8. कामिटे इण्टर अमेरिकानों डे प्रोटेक्शन एग्रिकोला।
  9. आर्गेनिज्मों बाबेलिवैरियानो डे-सैनिडैड सग्रोपेकुआरिया तथा
  10. एशियाई क्षेत्र समूह इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, थाइलैंड एवं सिंगापुर।

      उपरोक्त क्षेत्रीय संगठन अपने क्षेत्र में विधान या कानून तथा विनियमों के समन्वय या सहयोग, संगरोध उद्देश्यों पर सहमति, निरीक्षण कार्य-विधियों इत्यादि से संबंधित होते हैं। भारत भी उपरोक्त क्षेत्रीय संगठनों में से ‘दक्षिण-पूर्व एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र के लिए पादप रक्षण समिति’ का सदस्य है और इसके सभी नियमों को मानने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत में पादप संगरोध

      भारत में पादप पदार्थों के साथ बाह्य पादप नाशकजीवों एवं रोगों के प्रवेश के रोकने की क्रियाएँ 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही शुरू हो गयी थीं। उस समय देश में मेक्सिको कपास गोलक घुन - एन्थोनोमस ग्रैण्डिस  के प्रवेश को रोकने के लिए आयात की गयी सभी कपास की गाँठों का धूमन करना आवश्यक होता था। पादप संगरोध के महत्व को समझते हुए 3 फरवरी, 1914 को भारत के गवर्नर जनरल द्वारा सलाहकार परिषद की संस्तुति पर एक विनाशी कीट एवं नाशकजीव अधिनियम पारित किया गया था। इस अधिनियम में वर्ष 1933 से 1956 तक आठ बार संशोधन किये गये और वर्ष 1967 तक इसे ठीक किया गया, परन्तु इसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया है। इस अधिनियम के अन्तर्गत समय-समय पर विभिन्न अधिसूचनाएँ जारी की गयी हैं, जिनके द्वारा भारत में विदेशों से तथा देश के भीतर एक राज्य से दूसरे राज्य में विभिन्न पादप एवं पादप पदार्थों तथा अन्य कृषि सामग्री के आयात को प्रतिबंधित या नियंत्रित किया जाता है। 24 जून, 1985 की अधिसूचना के अनुसार बीजों, फलों अथवा पौधों के रूप में कोई भी माल भारत में उपयोग के लिए अथवा बुवाई या रोपण के लिए भारत सरकार के वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण सलाहकार द्वारा जारी किये गये एक वैध परमिट या मान्य अनुमति पत्र के बिना आयात नहीं किया जा सकता है। यह अधिनियम विभिन्न पादप रोगजनकों, कीटों एवं अन्य नाशकजीवों के लिए लागू होता है और पादप रक्षण सलाहकार को यह अधिकार प्रदान करता है कि संभावित हानिकारक विदेशी रोगजनकों एवं अन्य नाशकजीवों के भारत में प्रवेश करने के विरुद्ध उपयुक्त उपायों को अपनाया जाये।

    प्रारम्भ में विनाशी कीट एवं नाशकजीव या नाशकरोग अधिनियम 1914 के अन्तर्गत नियमों एवं विनियमों को कार्यान्वित करने का अधिकार सीमा शुल्क विभाग को सौंपा गया था। परन्तु मई 1946 में इस उत्तरदायित्व को खाद्य एवं कृषि मन्त्रालय के अन्तर्गत स्थापित किये गये वनस्पति संरक्षण संगरोध एवं भंडारण निदेशालय में भारत सरकार के वनस्पति संरक्षण या पादप रक्षण सलाहकार की संपूर्ण तकनीकी देखभाल में सौंप दिया गया। विनाशी कीट एवं नाशकजीव या नाशकरोग अधिनियम के अन्तर्गत पादप संगरोध में निश्चित किये गये सिद्धान्तों एवं क्रियाविधियों को पूरा करने के लिए वनस्पति संरक्षण संगरोध एवं भंडारण निदेशालय, जिसके मुख्यालय शास्त्री भवन, नई दिल्ली तथा फरीदाबाद (हरियाणा) में स्थित हैं, द्वारा पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर 35 पादप संगरोध केन्द्रों को स्थापित किया गया है। इनमें से दो राष्ट्रीय पादप संगरोध केन्द्र जैसे रंगपुरी, नई दिल्ली तथा तुगलकाबाद, नई दिल्ली में स्थित हैं तथा छः क्षेत्रीय पादप संगरोध केन्द्र जैसे हाजी बन्दर मार्ग, सेवरी, मुम्बई, सहारा हवाई पत्तन, मुम्बई, राजा सांसी हवाई पत्तन, अमृतसर, अट्टारी बार्डर या सीमा अमृतसर, चेन्नई, कोलकाता इत्यादि और पादप संगरोध केन्द्रों को 12 मुख्य बन्दरगाहों जैसे: मुम्बई, चेन्नई, कोचीन, मद्रास, कोलकाता, विशाखपट्टनम, कांडला, भावनगर, नागपटनम, तूतीकोरीन, धनकुषी, कैन्कुष इत्यादि तथा 11 हवाई अड्डों जैसे अमृतसर, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, इन्दिरा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा एवं सफदरजंग, हवाई अड्डा दिल्ली, त्रिवेन्द्रम, तिरुचिरापल्ली, पटना इत्यादि एवं पड़ौसी देशों के साथ 9 थल सीमाओं जैसे अटारी वागा (अमृतसर), अटारी रेलवे स्टेशन (अमृतसर), बोनगांव, सुखियापोखरी, कालिम्र्पोग, गेडे रोड, वाराणसी, गुवाहटी इत्यादि पर स्थापित किये गये हैं। इसके अतिरिक्त हैदराबाद, काकिनाड़ा (आन्द्र प्रदेश), रक्सोल जोबनी (बिहार), मंगलौर (कर्नाटक), अगरतला (त्रिपुरा), बनवासा (उत्तराखण्ड), सोनौली, रूपदियाह (बहराइच, उ.प्र.), पानीटंकी (दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल) इत्यादि स्थानों पर भी पादप संगरोध केन्द्र स्थापित किये गये हैं।

    भारत में कोई भी पादप या पादप सामग्री जैसे आयात उपरोक्त निर्धारित संगरोध केन्द्रों द्वारा ही किया जा सकता है। प्रत्येक संगरोध केन्द्र पर एक पादप रोगविज्ञानी, एक कीटविज्ञानी तथा अन्य उनके सहायक योग्य कर्मचारी रखे गये हैं। इन केन्द्रों पर पादप सामग्री का निरीक्षण, धूमन, अवरोध एवं उपचार के लिए प्रयोगशालाओं को स्थापित किया गया है। यहां पर दूसरे देशों से आयात की गयी पादप सामग्री के साथ-साथ पैकिंग सामग्री जैसे: बोरे, टोकरी, लकड़ी की पेटियां, लपेटने वाले कागज एवं अन्य दूसरी पैकिंग सामग्री का बहुत सावधानी से सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है। इसके अतिरिक्त पादप सामग्री के साथ चिपकी मृदा एवं अन्य अक्रिय पदार्थ का भी सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है। यदि पादप सामग्री के स्वस्थ होने में संदेह होता है, तब उसे पृथक् करके विशेष काँच गृहों में रोग लक्षण प्रकट होने के लिए रखा जाता है। आवश्यकता पड़ने पर विशेष निरीक्षण एवं निवेशन अध्ययन भी किये जाते हैं जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पादप सामग्री सभी प्रकार के पादप रोगजनकों एवं कीटों से मुक्त है। इस कार्यवाही का प्रमुख उद्देश्य यह है कि देश के भीतर केवल स्वस्थ पादप सामग्री या पादपों का आयात हो और विदेशी रोगजनकों, कीटों या खरपतवार इत्यादि के प्रवेश को रोका जा सके।

डॉ॰ चन्दन कुमार सिंह एवं डॉ॰ नीलम मौर्या

शोध सहायक,

वनस्पति संगरोध केन्द्र/ अजनाला रोड़ निकट वायु सेना केन्द्र, एस.जी.आर.डी. अंतराष्ट्रीयविमानपत्तन/ अमृतसर, पंजाब

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