1. औषधीय फसलें

कड़वा “नीम” कितना लाभकारी

 

आदि काल से ही हमारे जीवन में नीम का बहुत महत्व रहा है। नीम के वृक्ष में अनेक औषधीय गुण पाये जाते हैं| पशुओं व मानव के शरीर पर घाव हो जाने पर या कीड़ों, चिचड़ी आदि का प्रकोप होने पर नीम के पत्तों के पानी से नहलाने की प्रक्रिया आदिकाल से ही चली आ रही है|

इसी तरह नीम फसलों में भी अनेक दुश्मन कीटों को मारने व दूर भगाने में कारगर है| वर्तमान में जब हम जैविक खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं तो नीम का महत्व और भी बढ़ जाता है| नीम का प्रयोग कर हम कीटनाशकों के लगातार एवं अनियंत्रित प्रयोग से होने वाले दुष्परिणामों से भी आसानी से छुटकारा पा सकते हैं, साथ ही साथ कम लागत में कीटों को स्थाई रुप से नियंत्रित कर सकते हैं| हमारे खेतों या गांवों में नीम के पेड़ बहुतायात से पाये जाते हैं लेकिन अपने आसपास मौजूद इस अद्भुत खजाने को लोग भूल गये हैं| नीम के पेड़ में फूल(बगर) जनवरी-फरवरी में आते हैं तथा मई-जून में फल लगने शुरू हो जाते हैं| नीम के फल (निम्बोली) जुलाई से अगस्त माह में पककर तैयार होते हैं|निम्बोली का गूदा चिपचिपा एवं हल्का मीठा होता है| पकी हुई निम्बोली में लगभग 24 प्रतिशत छिलका, 47 प्रतिशत गूदा, 19 प्रतिशत कठोर कवच एवं 10 प्रतिशत गिरी होती है|

हालांकि नीम की निम्बोली को लोग कचरे में फेंक देते हैं| इसी का फायदा आज बड़ी-बड़ी कम्पनियां उठा रही हैं| ये कम्पनियां निम्बोली से विभिन्न उत्पाद जैसे कि नीम का तेल, नीम कीटनाशी, नीम खाद,नीम चूर्ण आदि बना कर महंगे दामों में बेच रही हैं जबकि ये सभी उत्पाद बहुत ही सस्ते में किसान स्वयं अपने घर पर तैयार कर सकते हैं|

निम्बोली के लाभ: निम्बोली में प्रमुख रूप से उपयोगी रसायन अजाडिरेक्टिन होता है| आज विश्व में जितनी भी कम्पनियां हैं वो इसी रसायन के आधार पर ही नीम आधारित कीटनाशक बनाकर बाजारों में बेच रही हैं| अजाडिरेक्टिन में बहुत सारे गुण पाये जाते हैं जैसे कि :

कीट इस की गंध से दूर भागते हैं। जिस फसल पर इसका छिड़काव किया होता है उसे खाना तो दूर,शत्रु कीट उसके नजदीक भी नहीं आते हैं| मादा तितलियां ऐसी फसल पर अपने अण्डे नहीं देती हैं

- फसल पर इसके छिड़काव से फसल में उपस्थित सूण्डी फसलों को खाना बंद कर देती हैं| एक तरह से उन के मुंह पर ताला लग जाता है|

- यदि भूल से सूण्डी फसल को खा भी लेती है तो प्रथम अवस्था की सूण्डी तो मर जाती है| इसके आगे की अवस्थाओं की सूण्डियों से जब तितली निकलती है तो वह कटी-फटी या अंगहीन होती है। ऐसी तितली अण्डे देने के काबिल नहीं रहती। यदि वह अण्डे दे भी देती है तो उससे लारवा नहीं निकलते। यदि लारवा निकलते भी हैं तो वे बहुत ही कमजोर होते हैं| ऐसे लारवा को दूसरी किसी भी कीटनाशी की हल्की-सी मात्रा से ही आसानी से मारा जा सकता है|

- मित्र कीटों पर इस रसायन एवं छिड़काव का विपरीत असर नहीं पड़ता है अर्थात् वे अपना कार्य सुचारू रूप से जारी रखते हैं|

- सूण्डियों के साथ-साथ यह रसायन अन्य कीट, विशेष रूप से सफेद मक्खी को भी प्रभावी रूप से नियंत्रित करता है|

- सफेद मक्खी नरमा में पत्ती मरोड़क वायरस फैलाती है| अत: इसके नियंत्रण से इस वायरस बीमारी को रोकने में भी मदद मिलती है|

- यह रसायन स्वयं भी वायरस बीमारी को रोकने में सक्षम है|

निम्बोली इकट्ठा करना: निम्बोली जब पककर पीली होने लगे तभी उन्हें तोड़कर इकट्ठा करना अच्छा रहता है लेकिन वृक्ष से सीधे निम्बोली तोड़ना बहुत महंगा पड़ता है| अत: आर्थिक दृष्टि से जमीन पर गिरी हुई निम्बोली एकत्र करना ही लाभप्रद है| निम्बोली एकत्रित करने के लिए पहले वृक्ष के नीचे की जगह को झाडू से साफ कर देना चाहिए ताकि निम्बोली गन्दी ना हों| हर रोज सुबह या दो दिन बाद वृक्ष के नीचे पड़ी निम्बोलियों को ध्यान से एकत्रित करें| निम्बोलियों का संग्रहण इस तरह से करें कि इनमें हानिकारक फफूंद एवं जीवाणु नहीं पनपें क्योंकि ये फफूंद एवं जीवाणु निम्बोली की एवं तेल की गुणवत्ता को खराब कर देते हैं|

छिलका हटाना: हालांकि पूरे फल को सुखाकर काम में लेना अधिक लाभप्रद है लेकिन गुदायुक्त फल को सुखाना मुश्किल है| अत: जैसे ही निम्बोली इकट्ठी करें साथ ही साथ इन्हें बड़े टब या बर्तन में डालकर रगड़कर धों लें ताकि बीज अलग हो जाएं एवं छिलका अलग हो जाए| छिलके का सदुपयोग हम कम्पोस्ट या गोबर की खाद में डालकर कर सकते हैं|

बीज को सुखाना: गूदे से अलग किये हुए बीजों को साफ हवादार एवं छाया वाले स्थान पर सुखाना चाहिए| बीजों में हानिकारक फफूंद एवं जीवाणु नहीं पनपे इसके लिए जब तक बीज अच्छी तरह सूख नहीं जाएं उन्हें समय–समय पर हाथ से हिलाते रहना चाहिए|

बीजों का भंडारण: पूर्ण रूप से सूखे हुए बीजों को खुले छायादार स्थान पर कपड़े या बोरी के थैलों में डालकर रखना चाहिए ताकि उन्हें अच्छी तरह से हवा मिल सके| प्लास्टिक के थैलों में रखने से बीज की गुणवत्ता में कमी आ जाती है|

नीम के उत्पाद: निम्बोली से हम नीम पाउडर, नीम तेल एवं नीम की खली आदि तैयार कर सकते हैं|

नीम पाउडर तैयार करने की विधि :

पूर्ण रूप से सूखी हुई निम्बोली को हाथ की चक्की या ओखली में डालकर मूसल की सहायता से बारीक या दलदली कूट लें। बहुत ज्यादा महीन कूटने की आवश्यकता नहीं है| अब यह बारीक पाउडर छिड़काव के लिए तैयार है|

- अनुसंधान से पता चला है कि नीम का 5 प्रतिशत चूर्ण शत्रु कीटों को मारने के लिए कारगर साबित होता है| अत: 5 किलो निम्बोली का चूर्ण लेकर उसे 10 लिटर पानी में मिलाकर लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह हिलायें एवं रात भर (12 घण्टे) या 24 घण्टे के लिए छोड़ दें|

- इस मिश्रण को गर्म न करें, ऐसा करने से इसमें से उपयोगी रसायन गर्म होकर उड़ जाते हैं|

- दूसरे दिन या 24 घण्टे बाद एक बार फिर इसे अच्छी तरह हिलायें एवं बारीक कपड़े से अच्छी तरह छान लें।

- अब इस छने हुए पानी में और पानी मिलाकर कुल 100 लिटर पानी तैयार करें।

- अब यह नीम के 5 प्रतिशत अर्क का घोल छिड़काव के लिए तैयार है जो कि बाजार में मिलने वाली नीम युक्त दवाओं से प्रभावशाली है|

- छिड़काव करते समय इस घोल में थोड़ा सा गुड़ एवं एक मिली तरल साबुन या एक ग्राम सिर्फ प्रति लिटर पानी के हिसाब से मिलायें इससे घोल को पूरी पत्ती पर फैलने तथा चिपकने में मदद मिलती है|

- नीम आधारित कीटनाशक ही ऐसे कीटनाशक हैं जिन्हें हम अन्य कीटनाशी दवाओं के साथ मिलाकर भी प्रयोग कर सकते हैं| बाकी अन्य किसी भी दो कीटनाशकों को आपस में नहीं मिलाना चाहिए|

- कपड़े से छानने के बाद बचे निम्बोली के अवशेष को सीधे ही या छाया में सुखाकर बागों एवं खेतों में डालने से दीमक का प्रकोप खत्म हो जाता है| साथ ही भूमि में ऑर्गेनिक पदार्थों की मात्रा भी बढ़ती है|

नीम का तेल: पूर्ण रूप से पकी एवं सूखी हुई निम्बोलियों का तेल भी निकाला जा सकता है| कोल्हू की सहायता से हम बाजार से तेल निकलवा सकते हैं| तेल को भी सीधे हम कीटनाशी के रूप में प्रयोग कर सकते हैं| 3 लिटर तेल से 4 बीघा फसल पर छिड़काव किया जा सकता है| तेल पानी में घुलता नहीं है, अत: इसमें भी 1-2 मिली तरल साबुन या 1 से 2 ग्राम सिर्फ प्रतिलिटर पानी के हिसाब से मिलाकर अच्छे से हिलायें एवं फिर छिड़काव करें|

नीम की खली: तेल निकालने के बाद बची नीम की खली भी बहुत उपयोगी होती है| इस खली को 2 क्विंटल प्रति बीघा के हिसाब से खेत में मिलाने से दीमक से तो छुटकारा मिलता ही है, साथ ही मृदा में पनपने वाले अनेक शत्रु कीटों से भी छुटकारा मिलता है एवं भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है|

इस प्रकार हम नीम उत्पादों का उपयोग जैविक तरीके से करके न केवल शत्रु कीटों से छुटकारा पा सकते हैं बल्कि पर्यावरण प्रदूषण व कीटनाशियों के अंधाधुंध प्रयोग एवं कीटों में बढ़ रही प्रतिरोधकता को भी कम कर सकते हैं|

रमेश कुमार साँप

(कृषि अनुसंधान अधिकारी, राज. सरकार)

English Summary: Neem Article

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