1. खेती-बाड़ी

गाजर की फसल में लगने वाले रोग और कीटों का प्रबंधन कैसे करें?

हेमन्त वर्मा
हेमन्त वर्मा
Bacterial Soft Rot of Carrot

Bacterial Soft Rot of Carrot

गाजर (carrot) एक कंदवर्गीय (Tube crop) रबी फसल है. इसका उपयोग सब्जी, सलाद और अचार के रूप में किया जाता है. इसके सेवन से खून साफ (Clear the blood) और बढ़ता है. गाजर में विटामिन A की अधिक मात्रा पाई जाती है जिससे आंखो की रोशनी बेहतर होती है. गाजर का जूस पीने या कच्ची गाजर खाने से कब्ज (Constipation) की परेशानी खत्म हो जाती है. गाजर में बिटा-केरोटिन नामक औषधीय तत्व होता है, जो कैंसर पर नियंत्रण करने में उपयोगी है. इसके सेवन से इम्यूनिटी सिस्टम (Immunity system) भी मजबूत होता है. गाजर की फसल में कई प्रकार के कीट और रोग का आक्रमण दिखाई देता है जिससे उपज में भारी कमी हो जाती है. चलिए जानते हैं गाजर की फसल में होने वाले रोगों और रोकथाम के बारे में.

आर्द्रगलन रोग (Damping off Disease)

इस रोग के कारण बीज के अंकुरित होते ही पौधे संक्रमित हो जाते है. तने का निचला भाग जो जमीन की सतह से लगा रहता है, गल जाता है और पौधे वहीं से टूटकर गिर जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए बीज को बोने से पहले कार्बेन्डाजीम (Carbendazim) फफूंदनाशी 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. फसल में प्रकोप हो जाने पर करें कार्बेण्डजीम 12% + मैंकोजेब 63% WP की 400 ग्राम या कार्बेण्डजीम 50% WP की 200 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर जड़ के पास (Drenching) डालें.

सर्कोस्पोरा पत्ता ब्लाइट (Cercospora leaf blight)

इस रोग के लक्षण पत्तियों, और फूल वाले भागों पर दिखाई पड़ते हैं. रोगी पत्तियां मुड़ जाती हैं. पत्ती की सतह बने दागों का आकार अर्धगोलाकार, भूरा या काला हो जाता है. ये दाग (Spot) चारों तरफ से घेर लेते हैं, फलस्वरूप पत्तियां झुलस जाती है. फूल वाले भाग बीज बनने से पहले ही सिकुड़ जाते हैं.

रोग को आने से पहले ही रोकने के लिए बीज बोते समय थायरम (Thiram) कवकनाशी (2.5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज) से उपचारित करें. खड़ी फसल मे रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही मैकोजब 75 WP (mancozeb) 600 ग्राम या कॉपर ओक्सीक्लोराइड 50 WP 500 ग्राम या क्लोरोथलोनिल (Chlorothalonil) 75% WP की 400 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव कर दें.

स्क्लेरोटीनिया विगलन (sclerotinia rot of carrot)

इस बीमारी में पौधों के पत्तों, तनों और डंठलों पर सूखे धब्बे हो जाते हैं. रोगी पत्तियां पीली हो कर झड़ जाती हैं. कभी कभी पूरा पौधा ही सूख कर बरबाद हो जाता है. फलों पर रोग का लक्षण पहले सूखे दाग के रूप में दिखता है, फिर कवक गूदे में तेजी से बढ़ती है और फल को सड़ा देती है.

इस रोग की रोकथाम के लिए थायरम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचरित करके ही बोए. रोग के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यूपी की 200 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें. आवश्यकता पड़ने पर 15-20 दिनों के भीतर दोबारा छिड़काव करें.

जीवाणु मृदुगलन (Bacterial Soft Rot of Carrot)

इस रोग का प्रकोप विशेष रूप से गूदेदार जड़ों पर होता है, जिसके कारण जड़े सड़ने लगती है, ऐसी मिट्टी में जिनमें जल निकास की उचित व्यवस्था नहीं होती है वहां इस रोग के होने की संभावना ज्यादा रहती है. इस रोग की उचित रोकथाम के लिए खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए और रोग के लक्षण दिखने पर नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों (Nitrogenous fertilizers) का बुरकाव (टॉप ड्रेसिंग) न करें.

रोग नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90% + टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10% W/W @ 24 ग्राम/ एकड़ या कसुगामाइसिन 3% SL @ 300 मिली/ एकड़ या कसुगामाइसिन 5% + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 45% WP @ 250 ग्राम/ एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें|

चूर्णिल आसिता या छाछ्या रोग (Powdery mildew disease of Carrot)

इस रोग से पौधों पर सफेद चूर्ण या पाउडर जमा हो जाता है. इससे पौधे पीले होकर कमजोर हो जाते हैं, और जल्दी पक (early maturity) जाते हैं, जिससे उपज में कमी आती है. अजवाइन के पौधों में यह रोग कवक के माध्यम से फैलता है. इस रोग के लगने पर शुरुआत में पौधों की पत्तियों पर सफेद रंग के धब्बे (white spot) दिखाई देने लगते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक (Soluble sulphur) की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए. इस रोग के नियन्त्रण हेतु 25 किलोग्राम सल्फर डस्ट का प्रति हेक्टर की दर से भुरकाव करें. जरुरत पड़ने पर 15 दिनों बाद दोबारा दवा का प्रयोग कर सकते है.

सूत्रकृमि (Nematode in Carrot)

सूत्रकृमि सूक्ष्म कृमि के समान जीव है, जो पतले धागे की तरह होते हैं, जिन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है. इन का शरीर लंबा व बेलनाकार होता है. सूत्रकृमि पौधे की जड़ों को गाँठो मेँ परिवर्तित कर देते है जिससे पौधा जल और पोषक तत्व लेने की अपनी क्षमता खो देता है.

सूत्रकृमि से बचने का एक उपाय फसल चक्र है. इसमें ऐसी फसलों का चयन किया जा सकता है जिसमें सूत्रकृमि की समस्या ना होती हो. ये फसलें है- पालक, चुकंदर, ग्वार, मटर, मक्का, गेहूं आदि है. सूत्रकृमि के जैविक नियंत्रण के लिए 2 किलो वर्टिसिलियम क्लैमाइडोस्पोरियम या 2 किलो पैसिलोमयीसिस लिलसिनस या 2 किलो ट्राइकोडर्मा हरजिएनम को 100 किलो अच्छी सड़ी गोबर के साथ मिलाकर प्रति एकड़ की दर से अन्तिम जुताई के समय भूमि में मिला दें. 

गाजर की वीविल कीट (Carrot weevil)

यह कीट सुरंग बनाकर गाजर को नुकसान पहुंचाती है. इस कीट की रोकथाम के लिए इनिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मिली प्रति 3 लीटर या डाइमेथेएट 30 ई.सी. 2 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

जंग मक्खी (Rust fly of Carrot)

इस कीट के शिशु पौधों की जड़ों में सुरंग बनाकर रहते हैं और जिससे पौधे मर जाता है. इस कीट की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 20 EC 2.47 लीटर की मात्रा सिंचाई के पानी से साथ ड्रॉप (बूंद-बूंद) में दें. जिससे पूरे खेत में कीटनाशक जमीन में जाकर कीट को प्रभावित करेगा. जैविक फफूंदनाशी बुवेरिया बेसियाना एक किलो या मेटारिजियम एनिसोपली एक किलो मात्रा को एक एकड़ खेत में 100 किलो गोबर की खाद में मिलाकर खेत में बीखेर दे.

जड़ों में दरारें पड़ना (Cracking of roots)

गाजर की खेती में ज्यादा सिंचाई के बाद अधिक मात्रा में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का इस्तेमाल करने से जड़ों में दरारें पड़ती हैं, इसलिए नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

English Summary: Management diseases and pests in carrot crop hh

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