1. खेती-बाड़ी

अमरुद को बनायें आमदनी का जरिया

स्वाति राव
स्वाति राव

Guava Farming

अमरुद एक ऐसा फल है जो  बाजार में कम दामों में आसानी से मिल जाता है. यह सर्दी के मौसम का फल है जिसे अमरुद एवं  जामफल के नाम से भी जाना जाता है. इस फल को भारतीय  नमक- मिर्ची लगा कर खाने का लुत्फ़ उठाते हैं. अमरूद अपनी कठोर प्रकृति और व्यापक अनुकूलन क्षमता के कारण भारत के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय भागों में उगाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण फल है. इसे गरीबो का सेब भी कहा जाता है.

अन्य फलों की तुलना में अमरुद की खेती की विशेषता है कि  हर प्रकार की भूमि एवं   जलवायु  में यह सफलतापूर्वक पनपते है. कम समय में फल की उत्पत्ति होती है. यह अपने आकर्षक रंग और स्वाद की वजह से लोकप्रिय है. बाजार में अन्य फलों के मुताबिक इसका भाव कम रहता है. अमरुद का उपयोग कई उत्पादों जैसे - जैली, आईसक्रीम, टॉफी और चीज बनाने में भी किया जाता है .भारत में, अमरूद लगभग सभी राज्यों में उत्पादित किया जाता है .  मुख्य रूप से महाराष्ट्र, बिहार, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में इसका उत्पादन होता है. इस लेख में पढ़िए अमरुद की खेती के द्वारा आप कैसे कर सकते हैं लाखों की कमाई-

मिट्टी-

अमरूद के पेड़ बहुत कठोर होते हैं और सभी प्रकार की मिट्टी में पनप सकते हैं .  इसकी खेती के लिए  भुरभुरी और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी जरुरी होती है.  मिट्टी का  पीएच 6.5 से 8.5 के मध्य होना जरूरी है . किसान भाई अपनी फसल की अच्छी उपज पाने के लिए मिट्टी की जांच करवाकर मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर फसल की बोवनी करेंगे तो अधिक उत्तम होगा.

जलवायु -

अमरूद उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में उगाया जाता है.  इसकी खेती के लिए सामान्य तापमान 23-28 डिग्री के बीच होना चाहिए. इसकी खेती अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में नही होती है. गुणवत्ता युक्त फलोत्पादन के लिए शुष्क मौसम आवश्यक होता है.

अमरुद की किस्में -

ललित-

ललित अमरूद की किस्म है.  इसका औसत वजन  120 ग्राम होता है.  इसके फल का गूदा नर्म और गुलाबी रंग का होता है.  फल मध्यम आकार और आकर्षक केशरनुमा पीले रंग के होते है .

इलाहाबाद सफेदा-

इस किस्म के फल के पेड़  की ऊँचाई मध्यम वर्ग की होती है. इसकी शाखाओं का आकार लंबा और घना होता है. इसका फल गोलाकार होता है. जिसका औसतन  वजन 180 ग्राम होता है. इसके फल की बात करें तो इसका छिलका पीले रंग का होता है.  इस अमरुद का गूदा मुलायम होता है.

लखनऊ -49-

इसको सरदार फल भी कहते है . इस किस्म में पेड़  की ऊँचाई तो मध्यम होती है लेकिन यह चौड़ाई में फैलने वाला वृक्ष है जिसमें अधिक शाखायें होती है. इसका फल गोलाकार होता है.

चित्तीदार-

इस किस्म में फल की सतह पर लाल रंग के धव्वे पाये जाते है. यह आकार में छोटा होता है एवं   इसके बीज छोटे और मुलायम  होते है.

खाद एवं उर्वरक-

अमरुद के अच्छे उत्पादन के लिए इसमें  खाद एवं   उर्वरक की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए. अमरुद में दी जाने वाली खाद में नाइट्रोजन और पोटाश की मात्रा अधिक होना चाहिए एवं  जस्ता की कम मात्रा की जरुरत होती है.अमरुद की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक की मात्रा पौध की उम्र के अनुसार दी जाती है.  उर्वरक क्षमता के अनुसार 7-10 वर्ष तक भी पेड़ों को 30-40 किलोग्राम गोबर खाद, 1000-1250 ग्राम यूरिया और 1500-2000 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 1200-1500 ग्राम पोटाश दे सकते हैं.

सिंचाई-

फलों के मौसम के दौरान , पेड़ों की नियमित रूप से सिंचाई की जाती है.  पानी की अधिकता फलों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है.  ड्रिप सिंचाई और निषेचन नवीनतम तकनीकें हैं, जो पानी और उर्वरकों के उपयोग को कम करती हैं.  

अमरुद के पौधों में रोग एवं रोकथाम-

विल्ट (Wilt) -  यह  अमरूद के पौधे की एक गंभीर बीमारी हैं जिसमें  पत्ते पीले पड़ने लगते हैं और इसी संक्रमण के कारण से पेड़ भी सूखने लगता हैं.

रोकथाम -  सुनिश्चित करें की खेत अच्छी तरह से सूखा हो,  पानी भराव की स्तिथि में मोटर पम्प से पानी निकाल ले,  संक्रमित पौधों को निकाल कर नष्ट कर दे और 23 ग्राम कार्बेन्डाजिम 30 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड प्रति 10 लीटर पानी में छिड़काव करें.

डाइबैक या एन्थ्रेक्नोज - काला  या भूरा रंग टहनियों के साथ फलों पर भी दिखाई देता हैं,  एक बार इससे संक्रमित होने पर 2 से 3 दिन में फल सड़ जाता हैं.  

रोकथाम इस बीमारी से बचाने के लिए 1% संक्रमण वाले फल को भी तोड़ कर नष्ट कर दे,  जलभराव से बचे,  300 ग्राम कैप्टन का 100 लीटर पानी में स्प्रे करे.  15 दिनों तक लगातार रोज संक्रमित जगहों पर छिड़काव करे.   40 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का भी छिड़काव कर सकते हैं.

एफिड (Aphid)- अमरूद के बागान का सामान्य कीट हैं जो पौधों का रस चूसकर उन्हें  सूखा देता हैं,  आमतौर पर यह नई पत्तियों को संक्रमित करता हैं.

रोकथाम -  ताजे पत्तों को 20 मि.ली. मिथाइल डेमेटन या 20 मि.ली.डाइमेथोएट 20 मि.ली. प्रति 10 लीटर के हिसाब से छिड़काव करें .

अमरुद से संबंधित लेटेस्ट शोध

अमरुद के बारे में विशेष शोध यह है कि, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) में अमरूद की एक अनूठी किस्म काले अमरुद विकसित की गई है. शोधकर्ताओं के मुताबिक,  इसके एंटी-एजिंग फैक्टर और रोग प्रतिरोधक क्षमता सामान्य फलों से ज्यादा होने की वजह से यह लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है.  अंदर लाल गूदे के साथ काले अमरूद की इस विशेष किस्म के  एंटीऑक्सिडेंट, खनिज लवण और विटामिन से भरपूर होने का दावा किया जा रहा है.  इस वजह से ये फल कई बीमारियों का मुकाबला करने में सहायक हो सकते हैं.

करीब तीन साल पहले लगाया काला अमरूद, अब फल आने हुए शुरू

काले अमरूद को बिहार कृषि विश्वविद्यालय में तीन साल से ज्यादा समय तक की गई वैज्ञानिक शोध के बाद विकसित किया गया है.  इसके आकार, सुगंध में कुछ सुधार के बाद जल्द ही इसे व्यवसायिक खेती के लिए लॉन्च किए जाने की संभावना है. देश में हालांकि अभी इस प्रकार के अमरूद का व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं हो रहा है. काले अमरूद के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है. संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में हरे अमरूद की तुलना में इसका व्यवसायिक मूल्य ज्यादा होगा, जिससे किसानों को कम मेहनत में अधिक फायदा मिल सकेगा. एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होने कि वजह से ये फल कई बीमारियों का मुकाबला करने में सहायक हो सकते हैं। 

अमरूद की खेती कर  500  से  5000  पौधे प्रति हेक्टेयर पर  30  से  50  टन का उत्पादन कर सकते है. अमरूद की खेती से लाभ का अनुमान अमरूद के प्रकार पर निर्भर करता है,  क्योंकि हर किस्म के अमरूद की कीमत मार्केट में अलग- अलग होती है लेकिन ये तो तय है कि किसान भाई किसी भी अच्छे किस्म की अमरूद के फलों से साल भर में लाखों कमा सकते है. खेती बाड़ी से सम्बंधित जानकारियां जानने के लिए जरुर पढ़ें कृषि जागरण हिंदी पोर्टल.

English Summary: Make guava a means of earning millions

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