1. खेती-बाड़ी

लीची की खेती करने का तरीका और लाभ

स्वाति राव
स्वाति राव
litchi

Litchi Farming

आम अगर फलों का राजा है, तो बिहार में बड़ी संख्या में उत्पादित होने वाली लीची अपने स्वाद, सुगंध और पौष्टिक गुडों के कारण सभी के लिए फायदेमंद है. इसे फलों की रानी भी कहा जाता है. तपती गर्मी के मौसम में पेड़ में लगे लीची के लाल-लाल गुच्छे देखकर क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग सभी की जुबान पर  इसकी मिठास घुल सी जाती है.

किसान भाइयों जैसा कि आप सभी जानते होंगे बिहार में लगभग कुछ ही जिलों में लीची की खेती होती है वो प्रमुखता से की जाती है. इसलिए हम आपके लिए लेकर आए हैं लीची की सफल बागवानी पर विशेष जानकारियों भरा हमारा यह लेख.

लीची आकर्षक लाल रंग के साथ अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता, सुखद सुगंध वाले रसदार गूदे के लिए प्रसिद्ध है. लीची विटामिन-सी और कैल्शियम का समृद्ध स्रोत है. वहीं इसमें एंथोसायनिन भरपूर मात्रा में पाया जाता है. इसके फल में 60% भाग-रस, 8% -चीर, 19% -बीज, एंव 13% - त्वचा शामिल हैं. लीची सबसे महत्वपूर्ण उपोष्णकटिबंधीय, सदाबहार सुस्वाद फल वृक्ष है. दुनिया में लीची का सबसे बड़ा उत्पादक देश चीन और दूसरे स्थान पर भारत आता है.

लीची पर नई शोध - (New research on litchi)

मुजफ्फरपुर के ढोली स्थित मात्स्यिकी महाविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लीची की गुठली से तैयार होने वाले मछली दाने पर नयी शोध की है. बता दें कि लीची की गुठली के साथ गेहूं, मक्का, सोयाबीन, सरसों की खाल्ली और राइस ब्रान को बारीक दरदरा पीसकर दाना तैयार किया गया है. जिसमें लीची की गुठली का 20 फीसद भाग और बाकि का 80 फीसद अवशेष है. महाविद्यालय की देखरेख में एक एकड़ तालाब में मछलियों पर दाने का प्रभाव देखा गया है. इस लीची से बने दाने से मछलियों को प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम आदि तत्व प्रचुर मात्रा में मिलते हैं. ऐसे में आइये जानते हैं लीची की खेती की संपूर्ण जानकारी जो देगी आपको अधिक लाभ- 

लीची की खेती के लिए जलवायु- (Climate for litchi cultivation)

लीची की खेती के लिए जिस प्रकार की जलवायु की आवश्यकता की जरुरत होती है. उसके लिए बिहार बेहद अनुकूल है. नदी की तटवर्तीय इलाका होने के कारण भागलपुर, मुंगेर, मुतफ्फरपुर आदि जिलों में इसकी खेती सर्वाधिक होती है. किसान भाईयों व्यवसायिक स्तर पर लीची उत्पादन से मुनाफा कमाने के लिए लिए जरुरी है कि आप लीची की सफल बागवानी करें. यह फलदार वृक्ष अपनी सर्वोत्तम वृद्धि के लिए पाला और अधिकतम तापमान सहन नहीं करता है और उपज 30-32 डिग्री सेल्सियस में होती है. शुष्क गर्म हवाएं फलों की फसल को नुकसान पहुंचाती हैं, जबकि गीला वसंत, शुष्क गर्मी और हल्की सर्दी इसके विकास के लिए सबसे अनुकूल होती है.

लीची की खेती के लिए मिट्टी- (Soil for litchi cultivation)

काफी गहरी, अच्छी जल निकासी वाली, कार्बनिक पदार्थों से भरपूर दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है. रेतीली दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी दोनों प्रकार की मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है. इसकी अच्छी उपज के लिए मिट्टी का पीएच 5-5.7 होना चाहिए. फसल की अच्छी उपज के लिए मृदा आधार कार्ड के जरिये समय- समय पर मिट्टी की जांच करानी चाहिए..  लीची की अच्छी खेती के लिए मिट्टी में उच्च चूने की आवश्यकता होती है....

सिंचाई- (Irrigation)

फल देने वाले लीची के पेड़ों के लिए लगभग 45-60 दिनों के अंतराल पर लगभग 2-3 सिंचाई करें. पानी के बेहतर उपयोग के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई जा सकती है

लीची की किस्में- (Litchi Varieties)

मई के प्रथम पक्ष में पकने वाली देशी अर्ली बेदाना एवं मई के दूसरे पक्ष में पकने वाली शाही, रोजसेंटेड एवम पूर्वी हैं. मिट्टी के प्रकार एवं अपनी सुविधा अनुसार आप इनमें से किसी भी किस्म का चुनाव कर बाग लगाने की शुरुआत कर सकते हैं. आइए इन प्रजातियों को करीब से जानते हैं-

1. देसी- इस प्रजाति की लीची सबसे पहले तैयार हो जाती है. मई के तीसरे सप्ताह में पकने वाले फल मध्यम आकार यानी 19-20 ग्राम का होता है. नियमित फलन वाली इस किस्म में बीज बड़े आकार का होता है.

2. शाही-यह मुजफ्फरपुर की प्रमुख किस्म है. मध्यम आकार के इस फल का वजन 20 ग्राम होता है. एवं इसके गूदे की मात्रा लगभग 65% होता है.

3. अर्ली बेदाना- इस उन्नत किस्म का फल मध्यम आकार का होता है. इसके बीज छोटे आकार के होते हैं एंव गूदे की मात्रा 70 प्रतिशत से भी कम होती है.

4. वॉम्वे- मई के मध्य में पकने वाली इस किस्म के फल एंव बीज मध्यम आकार के होते हैं. इसमें गूदे की मात्रा 60-65 प्रतिशत होती है.

5. बेदाना- यह मध्य समय में पकने वाली फसल है. इसका वजन 26.5 ग्राम होता है. एवं गूदा की मात्रा 82.5 प्रतिशत होता है.

खाद एवं उर्वरक- (Manure and Fertilizer)

पौध की आयु जब एक वर्ष की हो तो इसमें 24-50 सेंमी की दूरी पर थैला बनाकर कम्पोस्ट-10 किलोग्राम, यूरिया-50 ग्राम, सिंगल सुपर फॉस्फेट-250 ग्राम, पोटाश-250 ग्राम का मिश्रण डालना चाहिए. और जब पौध की आयु 10-12 वर्ष हो जाए, तो कम्पोस्ट-50 किलोग्राम, यूरिया-500 ग्राम,  सिंगल सुपर फॉस्फेट- एक किलो ग्राम, पोटाश-एक किलो ग्राम एंव चूना 2-3 किलोग्राम का मिश्रण डालना चाहिए. ध्यान रहे उर्वरक का प्रयोग जून माह में फल टूटने के बाद करना चाहिए.

तुड़ाई और भंडारण - (Harvesting and Storage )

फल पकने के समय गुलाबी रंग का हो जाता है. फल को हमेंशा गुच्छों में तोड़ाना चाहिए. लेकिन  इसके फलों को हम लम्बे समय तक स्टोर नहीं कर सकते. इसलिए नजदीकी बाज़ार में बेचने के लिए इसकी तुड़ाई पूरी तरह से फल के पकने के बाद करनी चाहिए और दूर के बाजारों में भेजने के लिए इसकी तुड़ाई फल के गुलाबी होने के समय करनी चाहिए. तुड़ाई के बाद फलों को इसके रंग और आकार के अनुसार ग्रेडिंग करनी चहिए. लीची को उसके ही हरे पत्तों को बिछाकर कई टोकरियों में इनकी पैकिंग करनी चाहिए.. लीची के फलों को 1.6-1.7 डिग्री सेल्सियस तापमान और 85-90% नमी में भंडारित करना चाहिए. इस प्रकार फलों को इस तरह 8-12 सप्ताह के लिए इसका भंडारण कर सकते हैं.

निष्कर्ष- (Conclusion)

किसान भाईयों लीची फल एक प्रकार की गर्मियों का फल है, जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है एंव हमारी अच्छी कमाई का एक सफल स्त्रोत है. इसलिए मेरा मानना है कि इसकी खेती से आप अपनी कमाई दोगुनी कर सकते हैं. मै आशा करती हूं कि आपको मेरा ये लेख पसंद आया होगा.

English Summary: benefits of litchi cultivation with complete information

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