किसान की प्रगति का रास्ता

पिछले 20 साल में देश में 5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं, नीति आयोग के अनुसार पिछले 5 साल में किसानों की वार्षिक आय में सालाना सिर्फ 0.44% की बढ़ोतरी हुई है। 17 राज्यों में एक किसान परिवार की औसत वार्षिक आय सिर्फ 20,000 रुपए है। चुनावों से पहले हर राजनीतिक पार्टी किसानों की स्थिति सुधारने के बड़े-बड़े वादे करती हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद 5 साल तक किसान को फिर भूला दिया जाता है। सरकारें किसानों के विषय में सिर्फ कुछ सार्थक करते हुए दिखने की कोशिश करती हैं लेकिन असल में कुछ सार्थक करती नहीं हैं।

अक्सर पत्रकारों द्वारा हम से यह पूछ जाता है कि एक किसान नेता होने के नाते आपके अनुसार वो क्या कदम होने चाहिए जो सरकार किसानों की हालत सुधारने के लिए उठाये? मेरे अनुसार अगर सरकार किसानों के विषय पर गम्भीर है तो सरकार को 3 कदम उठाने चाहिए।

पहला कदम है किसानों की पूर्ण कर्ज़ मुक्ति। कर्ज़ मुक्ति की मांग पर कुछ सरकारी बुद्धिजीवी व शहरवासी कहते हैं कि जब किसान ने कर्ज़ लिया है तो वो लौटा क्यों नहीं रहा है? लेकिन यह सवाल करने से पहले सरकारी बुद्धिजीवियों को अपनी सरकारों से यह सवाल करना चाहिए कि क्या सरकारों ने अपने वादों व अपने द्वारा बनाये हुए आयोगों की सिफारिशों को पूरा किया है? 2005-06 में स्वामीनाथन आयोग ने किसानों को लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की सिफारिश की लेकिन उस रिपोर्ट को 12 साल बीत चुके हैं व कांग्रेस और बीजेपी दोनों की सरकारें सत्ता में रह चुकी हैं लेकिन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को अब तक लागू नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले किसानों से यह वादा किया था कि उनकी सरकार बनते ही वे किसानों को लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थित मूल्य देंगे। लेकिन पहले 4 साल में बीजेपी सरकार ने इस मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं लिया। अब 2018 में इस मुद्दे पर बात भी की तो A2+FL लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बात कह रहे हैं जबकि किसानों की मांग है C2 लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए।

अब अगर सरकारों ने अपने वादों के अनुसार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया होता तो किसानों के ऊपर कोई कर्ज़ नहीं बनता, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। 2016-17 की कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एंड प्राइस के अनुसार अगर स्वामीनाथन रिपोर्ट व मोदी जी के वादे के अनुसार किसानों को समर्थन मूल्य मिलता तो गेहूं पर किसानों को 119 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलते। 2016-17 में भारत में गेहूं की पैदावार 94.56 मिलियन टन यानि 94.56 करोड़ क्विंटल थी। अब हर क्विंटल पर किसान को 119 रुपए अधिक मिलते तो 1 साल में सिर्फ गेहूं की फसल पर किसानों को कुल 11252 करोड़ रुपए अधिक मिलते। इसी तरह कपास की फसल पर किसान को 1720 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलने चाहिए थे, बाजरे पर 537 रुपए प्रति क्विंटल अधिक, धान पर 597 रुपए प्रति क्विंटल अधिक, चने पर 653 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलने चाहिए थे लेकिन सरकारों ने किसानों को अपने वादों के अनुसार उचित दाम नहीं दिए। इस तरह अगर यूपीए व एनडीए अपने वादे ईमानदारी से पूरा करती तो किसानों को 12 साल में लगभग 6 लाख करोड़ रुपए ज्यादा मिलते। इस समय एग्रो इंडस्ट्री के अलावा किसानों पर लगभग 6.35 लाख करोड़ का कर्ज है तो अगर सरकारें वादाखिलाफी नहीं करती तो किसानों के ऊपर इस समय कोई कर्ज़ नहीं होता।

दूसरा कदम जो सरकार को उठाना चाहिए वह है C2 लागत मूल्य पर 50% जोड़कर किसानों को MSP दिया जाए। C2 लागत मूल्य में बीज, कीटनाशक का खर्चा, मजदूरी, जमीन का किराया, लागत पर ब्याज आदि सब शामिल हैं। स्वमीनाथन आयोग ने भी C2 लागत मूल्य पर 50% जोड़कर MSP देने की सिफारिश की थी। लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी जी ने स्वमीनाथन आयोग के अनुसार ही C2 लागत मूल्य पर 50% जोड़कर MSP देने का वादा किया था लेकिन इसके बाद सरकार ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो स्वमीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू नहीं कर सकते। अभी कुछ दिन पहले सरकार ने A2+FL लागत मूल्य में 50% जोड़कर किसानों को MSP दिया है। अगर C2 के आधार पर बढ़ोतरी की जाती तो धान पर लगभग 700 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ने चाहिए थे।

तीसरा व अंतिम कदम जो सरकार को उठाना चाहिए वह है सभी फसलों की MSP पर पूर्ण खरीद की गारंटी का कानून। इस समय देश में सिर्फ 6%किसान MSP पर अपनी फसल बेच पाते हैं। सरकार मुख्य तौर पर सिर्फ गेहूं व धान की खरीद MSP पर करती है। सरकार को एक कानून बनाना चाहिए जिसके तहत किसान की फसल को किसी व्यापारी द्वारा MSP से कम पर खरीदने को गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाए, यह कानून पूरे देश में लागू होना चाहिए। अगर किसान MSP पर अपनी फसल बेच ही नहीं पा रहा है तो MSP बढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है। मध्यप्रदेश में मंडी-एक्ट 1972 के अनुसार अगर कोई व्यापारी किसी किसान की फसल को MSP से कम पर खरीदता है तो व्यापारी के खिलाफ मामला दर्ज कर के कारवाई की जाएगी लेकिन व्यापारियों व सरकार की सांठगांठ होने की वजह से यह कानून मध्यप्रदेश में भी जमीन पर लागू नहीं होता। सरकार को दूध व फल का भी MSP घोषित करना चाहिए क्योंकि कई जगहों के किसान फल की खेती व दूध की डेयरी पर मुख्य तौर पर निर्भर हैं।

अगर सरकार तत्काल यह तीन कदम उठाए तो देश के अन्नदाता किसान को बचाया जा सकता है अन्यथा किसान का बचना बहुत मुश्किल है।

 

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लेखक - अभिमन्यु कोहाड़ राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। राष्ट्रीय किसान महासंघ देश के 132 किसान संगठनों का महासंघ है।

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