स्वास्थ्यवर्धक गिलोय (टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया): जीवनदायिनी अमृत

प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रन्थों एवं आयुर्वेद में विभिन्न औषधीय पौधों का वर्णन किया गया है. इन औषधीय पौधों का प्रयोग विभिन्न बीमारियों के इलाज में होता रहा है. गिलोय आयुर्वेद में वर्णित एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है जिसको अमृता के नाम से जाना जाता है. इसमें अनेक औषधीय तत्व उपलब्ध हैं जिन्हें विभिन्न प्रकार के प्रयोजनों एवं बीमारियों के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है. वर्तमान अभिलेख में गिलोय एवं उसके विशेष औषधीय गुणों पर प्रकाश डाला गया है.

आयुर्वेद, उपचार की एक ऐसी पद्दति है जिसमें उपचार हेतु ऐसी औषधियों एवं जड़ी-बूटियों का उपयोग किया जाता है जो प्रकृति से आसानी से प्राप्त हो जाती हैं. ऐसी ही एक बेहतरीन औषधी है गिलोय (टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया). आयुर्वेद में गिलोय को अमृत कहा जाता है क्योकि यह न खुद मरती है न ही इसका सेवन करने वाले को कोई रोग होने देती है. गिलोय का सेवन किसी भी उम्र का व्यक्ति कर सकता है. यह भारत के सभी हिस्सों में एक हजार फीट की ऊँचाई तक पायी जाती है.

गिलोय ज्यादातर उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों जैसे भारत, म्यांमार, श्रीलंका आदि में बहुतायात से पाया जाता है. यह बहुवर्षीय बेल के रूप में देश के लगभग हर कोने में पायी जाती है. इसके पत्ते देखने में पान के पत्ते के समान होते है. इसमें विभिन्न प्रकार के तत्व जैसे बरबेरिन, ग्लुकोसाइड, गिलाइन, फॉस्फोरस आदि पाए जाते हैं. बहुवर्षीय एवं अमृतमयी गुणकारी होने के कारण इसे 'अमृता' नाम से भी पुकारा जाता है. आयुर्वेद में इस जीवन्तिका के नाम से वर्णित किया गया है. इसे ज्वर की महान औषधि माना गया है. इसकी लता जंगलों, खेतो की मेड़ों, चट्टानों आदि स्थानों पर मुख्यतः कुण्डलाकार चढ़ती पाई जाती है. बेल की शाखा की ऊपरी छाल अत्यंत पतली, भूरे रंग की होती है जिसे हटाने पर भीतर का हरित मांसल भाग दिखाई देने लगता है. गिलोय में गुच्छे में छोटे लाल बेर से कुछ छोटे फल भी लगते हैं.

वर्गीकरण (Classification

1. जगत – पादप

2. विभाग – मैगनोलियोफाईटा

3. वर्ग – मैगनोलियोपसिडा

4. गण – रैननकुलेलस

5. कुल – मैनीस्परमैसी

6. वंश – टीनोस्पोरा

7. जाति – कार्डिफोलिया

गिलोय का स्थानीय नाम (Regional Name)गिलोय को देश के विभिन्न भागों एवं भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे .

1. अंग्रेजी – टिनोसपोरा(Gulancha tinospora), हर्ट लीफ (Heart Leaf), मून सीड (Moon seed)

2. हिंदी – गिलोय

3. कन्नड – अमृतावली

4. मलयालम – अमृता

5. मराठी – गुलावेली चित्तामृतु, गुडूची

6. उड़ीसा – गुलुची

7. पंजाबी – गल्लो

8. उर्दू – अब-ए-हयात

9. पाली – गलोची

10. बंगाली – गुलंचा

11. तमिल – शिंडिलकोडि

12. तेलगू – टिप्पारिगो

पर्यावाची (Synonyms)

1. काण्डोभदवा – काण्डादुभ्दवोडस्याः ..

गिलोए तने के साथ प्रसारित हो सकती है.

2. अमृतवल्लरी – न ग्रीयते लताडस्याः..

गिलोए एक बार लगा देने पर कभी नहीं मरती.

3. छिन्नरूहा – छिन्ना सती पुनः रोहति ..

इसे काटने पर पुनः उग आती है.

4. कुण्डली – कुण्डलाकारेण वर्धते ..

किसी भी पेड़ के तने के सहारे कुण्डली रूप में तने पर चढ़ती है.

5. मधुपर्णी – मधुवद्रसयुक्तानि पर्णान्यिस्याः ..

पत्तियों को कुचलने पर मधु (शहद) के समान गाढ़ा रस निकलता है.

6. चन्द्रहासा – चन्द्रकाराणि शुभ्रबीजान्यस्याः ..

इसके बीज अर्द्धचन्द्राकार होते हैं.

7. अमृता – अमृतवद् गुणकारिणी च्..

यह अमृत के समान गुण वाली होती है.

8. जीवन्ती – जीवयतीति रसायनत्वात ..

यह जीवन देती है. क्योकि इसमें रसायनत्व गुण होता है.

गिलोय का ऐतिहासिक विवरण (Historical Background)

रामायण के युद्ध में भगवान राम के सहायक कुछ बन्दर मारे गए. रावण की मृत्यु के बाद देवता इन्द्र ने बन्दरों के मृत शरीर को फिर से जीवित करने के लिए उनके मृत शरीर पर अमृत छिड़का. इस दौरान इस अमृत की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिरीं जिससे गुडूची (गिलोय) उत्पन्न हुई  (भावमिश्र, 2010).

गिलोय का वानस्पतिक विवरण व पहचान (Botanical Description & Intro)

इस पादप परिवार के 70 वंश और 450 जातियाँ है. यह उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों में पायी जाती है.

तना (Stem) -  मांसल (Fleshy)

जड़ (Roots) - धागे समान संरचना जो शाखाओं से निकलती है.

छाल(Bark) - यह रंग में भूरी सफेद होती है. जब इसे छीला जाता है तो मॉसल तना दिखाई देता है.

पत्तियाँ(Leaves) - पान के पत्ते की तरह (Heart Shaped) व झिल्लीदार होती है.

फूल(Flowers) - नर पुष्प- छोटे पीले या  हरे रंग की होती है. मादा पुष्प- प्रायः एकल होता है.

फल(Fruits) - प्रायः सर्दियों में उगते है. मटर के आकार के मॉसल, चमकदार होते है. उबालने पर लाल रंग के हो जाते है.

बीज(Seeds) - वक्राकार, मटर के आकार के होते है.

गिलोय की औषध विज्ञान गतिविधि (Pharmacological Activity of Giloy)गिलोय विभिन्न औषधीय तत्वों का स्रोत है. इसके विभिन्न भागों में औषधीय तत्व (गौण चयापचयी) तत्व पाये जाते है.

1. मेटास्टेसीस पर निरोधात्मक प्रभाव – मेटास्टेसीस (स्थानान्तरण) को कम करने में गिलोय काफी प्रभावशाली है. कैंसर कोशिकाओं की क्षमता को कम करता है.

2. विकिरण चिकित्सा (Radiation Therapy) – विकिरण चिकित्सा से होने वाले दुष्प्रभावों को कम करता है.

3. नंपुकसकता के बचाव में काफी प्रभावकारी है.

4. एचआईवी/एड्स के मरीज में प्रतिरक्षा को बढ़ाने का काम करती है.

चिकित्सकीय महत्व

1. ज्वर में (Fever) – “श्रृतंशीतकषायं वा गुडूच्याः पेयमेवतु ..” (सुश्रुत उत्तारातन्त्र 39/370) गिलोय का काढ़ा ज्वर में कारगर होता है.

2. वातज्वर – “वातज्वरं जयत्याशु केवलो वाडमृतारसः ..” (अष्टांग संग्रह 1/70) वातज ज्वर गुडूची का रस अमृत समान होता है.

3. वातरक्त (Gout) – “गुडूचीरसदुग्धाभ्यां तैलं द्राक्षारसेन वा.

सिद्धं मधुककारमर्यरसैर्वा वातरक्तनुत्..”

गुडूची क्वाथ व दुग्ध से उत्पन्न रस वातरक्त को कम करता है.

4. अम्लपित्त (Hyperacidity) – गुडूची की पत्तियों का काढ़ा, नीम, पटोला को शहद के साथ सेवन करने से भयंकर अम्लपित्त को शान्त करता है.

5. प्रमेह (Diabetes) –मधुयुक्तं गुडूच्या वा रसमानलकस्य वा..” (अष्टांग ह्रदय चिकित्सा 12/6

गिलोय का रस शहद के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के प्रमेह के इलाज में कारगर है.

6. तृष्णा/प्यास (Thirst) – गुडूची का रस सभी प्रकार की तृष्णा को शान्त करता है.

गिलोय का महत्व व गुण (Importance of Giloy)

गिलोय एक औषधीय पौधा है. इसका उपयोग आयुर्वेद में कई बीमारियों के उपचार हेतु वर्णित है. पुरातनकाल में हिन्दू चिकित्सक, गोनोरिया एवं युरोपीयन इसे टॉनिक एवं मूत्र वर्द्धक के रूप में प्रयोग करते थे. विभिन्न रोगों जैसे की सामान्य कमजोरी, बुखार, गोनोरिया, मूत्र रोग, अपच, पेचिश, हेपेटाइटिस, त्वचा रोग, कैंसर एवं एनीमिया के इलाज में वर्तमान समय में इसका उपयोग किया जाता है. गिलोय के इस्तेमाल के निम्न लिखित फायदे हैं –

1. यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है क्योकि यह एंटी ओक्सिडेंट का प्रमुख स्रोत है.

2. गिलोय हमारे शरीर के विषाक्त तत्वों को बाहर निकालने में सहायक है एवं यह हमारे खून का शुद्धिकरण करता है.

3. गिलोय यकृत के रोग एवं मूत्र मार्ग में उत्पन्न हुए अवरोधों को ठीक करता है.

4. इसका सेवन बांझपन के उपचार में भी लाभकारी है.

5. यह दिल की बीमारी में भी उपयोगी समझा जाता है.

6. गिलोय में एंटीप्यरेटिक के गुण पाये जाते हैं, जिसकी वजह से ये डेगूं बुखार, स्वाईन फ्लू एवं मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों के लक्षणों को कम करने में भी सहायक है. यह रक्त प्लेटों की संख्या को बढ़ाने में बहुत कारगर है.

7. गिलोय पाचन शक्ति को दुरूस्त करने में भी लाभकारी है. यह आंत सम्बन्झी रोगों और कब्ज की बीमारियों का इलाज करने में बहुत फायदेमंद है.

8. गिलोय हाईपोग्लोकेमिक एजेंट के रूप में काम करता है जो कि मधुमेह (टाइप 2 ) के रोग को दूर रखने में भी सहायता करता है.

9. गिलोय में एंटीस्ट्रेस के गुण समाहित होते हैं अतः इसको अडाप्टेगेनिक जड़ी बूटी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है.

10. यह मानसिक तनाव एवं चिंता को भी कम करने में सहायक है.

11. यह यादाश्त को बढ़ाने मे भी कारगर है.

12. गिलोय साँस सम्बन्धी रोगो, कफ, सर्दी, दमा और टोंसिल जैसी बीमारियों के इलाज में सहायता करता है.

13. इसमें एंटीफ्लेमिनेटरी एवं एंटी आर्थराइटिस सम्बन्धी गुण होते है अतः गठिया के इलाज में सहायक है.

14. यह आँखों की रोशनी बढ़ाने में कारगर है.

15. इसमें एंटी एलर्जिक गुण होता है जिससे यह एलर्जी को खत्म करने, सोरायसिस जैसी बीमारी के इलाज में भी काम आता है.

16. गिलोय में एंटी एजिंग के गुण समाहित होते है जिसके कारण यह कील मुहासों, त्वचा पर झुरियों, डार्क स्पॉट्स, उम्र के साथ त्वाचा पर रेखाऐं आदि को रोकने में मददगार होता है.

17. गिलोय एक कामोद्दीपक दवा है अतः यह सेक्स इच्छाशक्ति को बढ़ाता है.

कृषि जागरण के लिए-

नीलेश कपूर,

आर.एस.सेंगर (कॉलेज ऑफ बायोटैक, स.ब.भ.प.कृ.एवं प्रौ. वि.वि., मेरठ)

एवं

अम्बर त्रिपाठी,

सौरभ सिंह (एम.ए.एम.सी.एच. मेडीकल कॉलेज, मेरठ)

Email – drneeleshbiotech@gmail.com

Comments