
World Earth Day: विश्व-पृथ्वी दिवस का दिन, 22 अप्रैल आया और चला गया धरती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को याद करने के लिए हम इस दिन पर्यावरण के बारे में ढेर सारी चर्चाएँ करते हैं, पौधारोपण का दिखावा करते हैं, और सोशल मीडिया पर डिजिटल पिचकारी से हरे-भरे विचारों की बौछार करते हैं. क्या यह सबकुछ बस एक दिन की औपचारिकता बनकर रह गया है? क्या अगले दिन सब कुछ वैसे का वैसा ही रहता है, या फिर उस दिन की जागरूकता का कोई वास्तविक असर भी होता है? यदि आप भी यही सब सोच रहे हैं, तो मैं आपको बता दूँ कि अब यह हमारी आदत बन चुकी है. बस कुछ हफ्तों बाद 5 जून को हम 'पर्यावरण-दिवस' पर भी हम एक बार फिर अपनी जिम्मेदारियों के एहसास का भरपूर दिखावा करेंगे और फिर अगले दिन की सूबह तक, हर बार की तरह, वह सब कुछ एक बार फिर से भूल जाएंगे.
जरा दिल्ली की सड़कों पर नज़र डालिए. दिल्ली का तापमान 46.3°C तक पहुंच गया है . सड़कों पर आग बरस रही है. बढ़ती गर्मी के रोजाना नए-नए कीर्तिमान गढ़ रहे यह आंकड़े हमें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि “पृथ्वी दिवस” की यह नौटंकी केवल एक वनडे-शो के जैसा है, न कि वास्तविक बदलाव की दिशा में कोई योजनाबद्ध ठोस कदम. क्या यह नहीं दिखाता कि हम अपने पर्यावरण को लेकर किस कदर लापरवाह हैं? अगर हम इसे सच्ची चिंता समझते, तो क्या दिल्ली की सड़कों पर इतनी गर्मी और प्रदूषण होता? क्या यह समस्या उन नेताओं और जिम्मेदार संस्थाओं के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए जो हर साल अपनी भाषणबाजी से पर्यावरण दिवस मनाते हैं , बड़े-बड़े दावे करते हैं और फिर अगले ही दिन सब कुछ भूल कर फिर से कुर्सी-कुर्सी खेलने लग जाते हैं?
आपने कभी गौर किया है कि ‘स्वच्छ आकाश’ और ‘स्वच्छ भारत’ जैसे अभियानों का क्या हुआ? सरकारी विभाग और संस्थान इन अभियानों में भाग लेकर अपने दफ्तर के दस्तावेजों में इनकी सफलता दर्ज कर देते हैं, बिल वाउचर बनते हैं और हमारे आपके जेब से गला दबाकर वसूले गए हमारी गाढ़ी कमाई के पैसे इन नौटंकियों में फूर्र हो जाते हैं. सच तो यह है कि इन अभियानों का कोई वास्तविक असर नहीं होता. हम बस एक दिन के लिए हम झूठी उम्मीदों का दामन थामते हैं, अगली सुबह हम फिर से उन्हीं काम धंधों में जुट जाते हैं, जिन्होंने धरती तथा पर्यावरण को इस लाइलाज अवस्था में पहुंचा दिया है. ऐसे में क्या यह नहीं लगता कि हम खुद को और अपनी धरती को, दोनों को धोखा दे रहे हैं?
पश्चिमी विद्वान एल्डो लियोपोल्ड का एक उद्धरण है, "हम भूमि का दुरुपयोग करते हैं क्योंकि हम इसे अपनी संपत्ति मानते हैं. जब हम भूमि को एक समुदाय के रूप में देखते हैं, जिसमें हम सदस्य हैं, तभी हम इसे प्रेम और सम्मान के साथ उपयोग करना शुरू करते हैं." यह उद्धरण हमें यह याद दिलाता है कि जब तक हम अपनी भूमि और पर्यावरण को एक दूसरे से जुड़ी हुई इकाई के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक हमारे कृत्य केवल दिखावा बनकर रहेंगे.
लेकिन अगर इस संदर्भ में कोई सच्ची जागरूकता और काम किया जा रहा है, तो वह बस्तर जैसे आदिवासी समुदायों द्वारा किया जा रहा है. बस्तर के आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से रहते हैं, वे प्रकृति की महिमा समझते हैं और उसकी रक्षा के लिए सच्चे कर्म करते हैं. उनका जीवन एक उदाहरण है कि कैसे जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ा जा सकता है. फिर भी, हमारे महान नेता और जिम्मेदार अधिकारी इस प्रकार के उदाहरणों से सीखने के बजाय केवल कार्यक्रमों का आयोजन करके अपनी भूमिका पूरी कर लेते हैं.
अब बात करते हैं उस ख़ास दिन, यानी 22 अप्रैल की. क्या होता है? लोग कार्यक्रम करते हैं, समाज सेवा के नाम पर कुछ पौधे लगाए जाते हैं, सरकारी अधिकारियों के भाषण होते हैं और फिर अगले ही दिन सब कुछ सामान्य हो जाता है. इस दिन की कवायद को केवल एक कागज़ी कार्रवाई के रूप में देखा जाता है, जिसमें सरकारी विभाग अपने द्वारा किए गए कार्यों की लंबी लिस्ट तैयार करते हैं और मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापन दिखाए जाते हैं. लेकिन अगले दिन वही प्रदूषण, वही गर्मी, वही जलवायु परिवर्तन की समस्याएँ सामने आ जाती हैं.
यह कोई एकल उदाहरण नहीं है. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ — हर जगह इसी तरह के कार्यक्रम होते हैं, जहां दिखावा किया जाता है कि हम पर्यावरण के लिए चिंतित हैं. और सच तो यह है कि इन कार्यक्रमों के बाद ना तो प्रदूषण कम होता है, और ना ही तापमान में कोई फर्क पड़ता है. यह सिर्फ हमारी ख़ुद की आँखों में धूल झोंकने का काम करता है.
अब सवाल यह उठता है कि क्या इस सबका कोई हल है? क्या हमें सचमुच इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए? क्या हम उन आदिवासी समुदायों से कुछ सीख सकते हैं, जो हर दिन पर्यावरण की रक्षा करते हैं, अपनी परंपराओं को संजोते हैं और हर हाल में प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हैं?
"सत्यमेव जयते" — सत्य की ही विजय होती है, और सत्य यह है कि अगर हम इस दिखावे से बाहर नहीं निकलें और अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नहीं लें, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी. दरअसल हम 'पृथ्वी' के साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हैं, मानो हमारे पास रहने के लिए इसके अलावा ऐसे ही 8-10 ग्रह और भी खाली पड़े हैं. हकीकत तो यह है कि हम जिस धरती पर रहते हैं, वह हमारी माता है, और हम उसे ही नष्ट करने पर तुले हुए हैं. क्या हम सचमुच इस धरती के प्रति अपने धत् कृत्यों की कीमत चुका सकते हैं?
अंत में, यह समझने की आवश्यकता है कि जब तक हम धरती और उसके संसाधनों को केवल 'एक दिन के कार्यक्रम' के रूप में देखेंगे, तब तक हमें कोई वास्तविक परिणाम नहीं मिलेगा. जब तक हम अपने दैनिक जीवन में बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक हमारे पृथ्वी दिवस और पर्यावरण दिवस के कार्यक्रम बस एक ढोंग बनकर रहेंगे. इसलिए, हमें उस सत्य को स्वीकार करना होगा कि हमारी वर्तमान कार्यप्रणाली से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जब तक हम अपने दृष्टिकोण और कार्यों में बदलाव नहीं लाएंगे.
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