1. सम्पादकीय

आत्मनिर्भरता : विकल्प अथवा अवसर

KJ Staff
KJ Staff
Agriculture

Agriculture

भारत एक कृषि प्रधान देश है. यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी मुख्यतः कृषि आधारित आजीविका पर निर्भर है जो कि भारत की जनसंख्या का 60% है. इनमें से लगभग 82% छोटे एवं सीमांत किसान हैं. आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 20.19% योगदान कृषि का रहा है. सापेक्षिक दृष्टिकोण से यह हिस्सेदारी फिर भी कम है.

हालांकि कृषि सुधार हेतु अनेक योजनाएं लागू की जा रही है, परंतु जमीनी स्तर तक पहुंचने में प्रायः सिमट जाती हैं. इसका प्रमुख कारण जागरूकता का अभाव एवं पारंपरिक कृषि प्रणाली के प्रति उदासीनता है. संसाधनों के अभाव में भी हमारे पूर्वज कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर थे, क्योंकि वे प्राकृतिक पद्धति आधारित खेती करते थे.             

वर्तमान परिदृश्य में किसान के पास अथक परिश्रम करने की क्षमता है, परंतु उनके पारिश्रमिक का निर्धारण कृषि उत्पाद की बिक्री, व्यापारियों एवं खाद्य वितरण प्रणाली पर ही निर्भर है. यह निर्भरता ही कृषि की आय को सुनिश्चित नहीं होने देती है. चूंकि अधिकांश किसान सीमांत श्रेणी में आते हैं. कम भू-भाग होने की वजह से इनके कृषि उत्पादन भी सीमित ही होते हैं, इसलिए कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता एक अति आवश्यक पहलू बनकर उभर रहा है. 

कोविड-19 एक वैश्विक महामारी, ने भी कृषि क्षेत्र को अत्यंत प्रभावित किया है. संसाधनों के अतिरिक्त खर्च, बाजारों की बंदी, लॉकडाउन इत्यादि समस्याओं के वजह से लागत एवं आय दोनों ही असंतुलित रहे हैं. यद्यपि लोगों का रुझान अब प्राकृतिक संसाधनों की तरफ बढ़ रहा है. सीमांत किसान को यही रुझान समझने की जरूरत है. प्राकृतिक कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग किसान की आय वृद्धि का न सिर्फ विकल्प है, अपितु अवसर भी है.  

तालिका -2 भारतीय कृषि प्रणाली पर कोविड का प्रभाव

कृषि प्रणाली

वर्ग

लॉकडाउन के तत्काल प्रभाव

उत्पादन

(एन=225)*

उच्च वृद्धि(तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश)

·         पंजाब, हरियाणा और तमिलनाडु में श्रमिकों की कमी (100%)

·         उत्तर प्रदेश में रिवर्स माइग्रेशन.

·         कृषि कार्यों को करने में संक्रमण का डर.

·         मज़दूरों की कमी के चलते पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में डीएसआर प्रौद्योगिकी को अपनाने की रिपोर्ट.

कम वृद्धि (महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, पुदुचेरी)

·         इनपुट आपूर्ति में व्यवधान (100%)

·         महाराष्ट्र में रिवर्स माइग्रेशन

·         कृषि कार्यों को करने में संक्रमण का दूर

मार्केटिंग

(एन =225)*

नाशवान

·         रसद व्यवधान (100%)

·         भारी नुकसान और कम कीमत

·         उड़ीसा में बिक्री संकट

·         प्रतिबंधित आवजाही

·         सीमित बिक्री केंद्र

अर्ध नाशवान

·         रसद व्यवधान (100%)

·         जल्दीखराब होने वाले की तुलना में अपेक्षाकृत कम नुकसान

·         राज्य की नीति द्वारा समर्थित गेहूं की रिकॉर्ड खरीद ( 38.9 मिलियन टन)

·         प्रतिबंधित आवजाही

·         सीमित बिक्री केंद्र

खपत

(एन = 729)**

लाल ( एन 322)

·         45.7% की बाजारतक पहुंच नहीं थी

·         खाद्य कीमतों में 72.7% की कथित वृद्धि

·         81% ने अपने खरीदारी व्यवहार में बदलाव किया

·         38.6% ने आय संकुचन महसूस किया

·         78.8% ने अपनी खपत की टोकरी बदल दी

नारंगी (एन 276)

·         51.7% की बाजारतक पहुंच नहीं थी

·         79.4% खाद्य कीमतों में कथित वृद्धि

·         94.2% ने अपने खरीदारी व्यवहार को बदल दिया

·         40.1% ने आय के झटके का अनुभव किया

·         78.3% ने अपनी खपत को बदल दिया

हरा (एन =131)

·         33.7% की बाजार पहुंच नहीं थी

·         खाद्य कीमतों में 73.3% की कथित वृद्धि

·         90.8% ने अपना खरीदारी व्यवहार बदला

·         41.2% ने आय के झटके का अनुभव किया

·         77.9% ने अपनी खपत की टोकरी बदल दी

नोट: सर्वेक्षण परिणामों से संकलन करियप्पा एट अल. 2020ए

हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, ऑडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु और पुडुचरी में किसानों से टेलीफोन और व्यक्तिगत साक्षात्कार द्वारा कियागया एक डिपस्टिक सर्वेक्षण

एक अखिल भारतीय ऑनलाइन सर्वेक्षण Google फॉर्म (https://forms.gle/Z4FRqSekads7CRWLA) के माध्यम से तीन क्षेत्रों (पोस्ट-स्तरीकरण में COVID-19 घटनाओं की तीव्रता के अनुसार, लाल, नारंगी और हरे रंग के अनुसार किया गया। लाल COVID 19 घटनाओं की उच्च दर को इंगित करता है, मारगी COVID-19 घटनाओं की मध्यम दर को करता है और रा COVID-19 घटना की सदर या कोई घटना ही भारत सरकार के अनुसार वर्गीकरण का प्रतिनिधित्व करता है.

आत्मनिर्भरता एक विकल्प

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. पूर्ण रूप से आत्मनिर्भरता एक अत्यंत जटिल व विवादास्पद विषय है. परंतु जनसंख्या वृद्धि एवं बढ़ती बेरोजगारी के प्रतिस्पर्धात्मक दौर मे आत्मनिर्भरता ही एकमात्र विकल्प है. कृषि क्षेत्र में ही लागत मूल्य की आशातीत वृद्धि उदाहरण स्वरूप बीज मूल्य, उर्वरक, जुताई, सिंचाई एवं अन्य कृषि संबंधी कार्यों के निर्वहन में निरंतर आर्थिक बढ़ोतरी किसान की जेब ढीली करती जा रही है.

उत्पादित फसल का भी कोई निश्चित मूल्य निर्धारण न होने से अनियमित आय के चलते अधिकतर किसान आर्थिक तंगी का सामना करते रहते हैं. चूंकि कृषि उत्पादों का मूल्य, बाजार की मांग व खपत पर निर्भर होने से यह किसान के नियंत्रण से बाहर है. परन्तु लागत मूल्य के निर्धारण का विकल्प किसान के पास जरूर है. यही लागत मूल्य आत्मनिर्भर होकर कम किया जा सकता है. कुछ महत्वपूर्ण विकल्प इस प्रकार है.

आगामी वर्ष की बुवाई हेतु उन्नत किस्म के बीजों का संचय एवं भंडारण करना:- इस प्रकार अपनी ही फसल के उन्नत पौधों का चयन करके उनके बीजों का संचयन किया जा सकता है. फलस्वरूप बीज के क्रय में होने वाले धन व्यय को कम किया जा सकता है.

प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर होना:- इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं होता है. इसके स्थान पर जैविक उर्वरक के गोबर की खाद का प्रयोग किया जाता है. इसे शून्य बजट खेती भी कहते हैं.

यथासंभव कर्षण क्रियाएं स्वयं करना:- आधुनिकता के इस युग में छोटे मोटे कार्य के लिए भी लोग मशीनों पर ही निर्भर होते जा रहे हैं. कृषि के छोटे मोटे कार्य जैसे निराई गुड़ाई इत्यादि स्वयं करने से लागत मूल्य में कमी की जा सकती है.

वर्षा जल संचयन:- सिंचाई कृषि का एक अति आवश्यक अभिन्न आधार है. वर्षा जल के संचयन से हम सिंचाई में उपयोग होने वाले बिजली व डीजल के खर्च को कम कर सकते हैं.

स्वयं सहायता समूह बनाना:- इसमें छोटे एवं सीमांत किसान अपना एक समूह बना सकते हैं. जिससे सकल उत्पाद में वृद्धि होने से अनाज को बेचने के लिए किसी कंपनी से सीधा संपर्क किया जा सकता है. इस प्रकार बिचौलियों के चंगुल से बचकर किसान अपने उत्पादन का पूर्ण रूप से लाभ लेकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं.

आत्मनिर्भरता एक अवसर

कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है. आज के परिदृश्य में खासकर इस कोविड-19 जैसी महामारी के दौर में आय के स्रोत सिमटने के साथ ही कुछ आवश्यक खर्चे भी बढ़ने लगे हैं, जैसे मास्क, सैनिटाइजर, इत्यादि. अब चूँकि महामारी से बचाव भी जरूरी है. अतः येन केन प्रकारेण आय सुनिश्चितता की ओर तत्पर होकर ही किसान का कल्याण हो सकता है. हम आत्मनिर्भरता को एक अवसर मानकर कृषि के नए आयामों की ओर अग्रसर होकर एक समृद्ध जीवन को परिभाषित कर सकते हैं. हालांकि सीमांत श्रेणी के किसान के पास सीमित कृषि उत्पाद ही उत्पन्न हो पाते हैं परन्तु हम नए आयामों की बात करें तो इसी समाज में कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के असीमित अवसर हैं. इन नए आयामों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है.

  • पारंपरिक कृषि पद्धतियां

अगर हम बीते जमाने की ओर गौर करें तो पहले के किसान मिश्रित खेती करते थे. किसान के घर में अनेक प्रकार के कृषि उत्पाद उपलब्ध रहते थे. उनका कृषि कार्यों में व्यस्त प्रवृति कभी भी रोजगार का आभास नहीं होने देता था. परन्तु आज ज्यादातर किसान गेहूं, धान आदि प्रमुख फसलों पर आधारित खेती करते हैं एवं बाकी सारे कृषि उत्पादों के लिए बाजार आदि पर निर्भर हो गए हैं. यही अवसर है जब हम मिश्रित कृषि की ओर अग्रसर हों, ताकि ज्यादा से ज्यादा कृषि उत्पाद हेतु आत्मनिर्भर हो सकें.

  • कृषि उत्पाद लघु उद्योग

इस श्रेणी में कम समय में तैयार होने वाली फसलों का चयन किया जा सकता है. मुख्य रूप से सब्जियों का व्यवसाय. ऐसी फसल कम समय में तैयार हो जाती हैं. अपेक्षाकृत लागत भी कम लगती है. रोजाना खपत होने वाली इन फसलों की मांग बाजार में निरंतर बनी रहती है. अत्यधिक मांग होने से सब्जियां उगाकर छोटे किसान अधिक मुनाफा कमा सकते हैं. ये उपज प्रायः खेतों से ही बिक जाती है, जिससे माल ढुलाई का भी खर्च बच जाता है.

  • कृषि संबंधी उपकरण का व्यवसाय

कृषि एक अचल व्यवसाय है, यह मानव जाति के जीवन काल तक चलने वाला उपयोगी उद्यम है. सीमांत किसान कृषि संबंधी छोटे उपकरण, जैसे हंसिया खुरपी, कुदाल आदि से लेकर मध्यम तकनीकी वर्ग के उपकरणों के मरम्मत में प्रयुक्त सामानों का पूंजी अनुसार व्यवसाय कर आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सकते हैं. इसी संदर्भ में ट्रैक्टर रिपेयरिंग कार्यशाला की स्थापना एक उपयुक्त अवसर साबित हो सकता है. इसे स्थापित करने हेतु कुल 1,00,000 रु०, आवश्यक औज़ारों व उपकरणों पर खर्च करके प्रति वर्ष 1,20,000 रु० का शुद्ध मुनाफा कमाया जा सकता है.

  • गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन का व्यवसाय

बीज, कृषि में प्रयुक्त लागत की प्राथमिक तथा महत्वपूर्ण इकाई है. गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन को 15-20 प्रतिशत बढ़ाकर आधुनिक कृषि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. बीज प्रतिस्थापन दर में वृद्धि व इसमें बदलाव कृषि की पैदावार व पूर्ण उत्पादन दोनों को बढ़ाने में योगदान करता है. किसान द्वारा भंडार किए गए बीज का 80% तक उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर होता है. राष्ट्रीय बीज योजना 2005 के अनुसार विभिन्न स्वपरागित फसलों के लिए 25%, क्रॉस परागित फसलों के लिए 35% एवं संकर फसलों के लिए 100% वांछित बीज प्रतिस्थापन दर की आवश्यकता होती है. कृषि विभाग के कृषि सहभागिता बीज उत्पादन कार्यक्रम व बीज ग्राम कार्यक्रम के परिणाम स्वरूप गुणवत्तायुक्त बीज की उपलब्धता बढ़ने से कृषक समुदाय की सामाजिक व आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है. अतः बीज उत्पादन के क्षेत्र में उद्यमशीलता के विकास की अपार संभावनाएं हैं.

  • वर्मीकम्पोस्टिंग

यह केंचुआ द्वारा सड़े गले अपशिष्टों को विघटित करके तैयार किया जाने वाला पोषक तत्वों से भरपूर एक जैविक उर्वरक है. इसे केंचुआ खाद भी कहते हैं. डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार होने वाली इस जैविक खाद में लगभग 2.5-3 % नाइट्रोजन, 1.5-2 % सल्फर तथा 1.5-2 % पोटाश पाया जाता है. निम्न स्तर पर वर्मीकंपोस्ट का व्यवसाय लगभग 30,000 रु० की लागत से (10x3 फीट) की 10 क्यारियाँ बनाकर किया जा सकता है. उनमें केंचुए छोड़कर प्रत्येक तीन महीने में 5 रु० प्रति किलोग्राम की दर से वर्मीकंपोस्ट की बिक्री कर 35,000 रु० तथा प्रतिवर्ष 1,40,000 रु० शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है. इस प्रकार वर्मीकम्पोस्टिंग आत्मनिर्भरता के संदर्भ में एक उपयुक्त अवसर हो सकता है.

  • समन्वित कृषि प्रणाली

इस प्रणाली में कृषि के विभिन्न घटक, जैसे फसल उत्पादन, सब्जी उत्पादन, फल उत्पादन, पशुपालन, मुर्गी पालन, वानिकी तथा मधुमक्खी पालन इत्यादि को इस प्रकार सम्मिलित किया जाता है कि वे एक दूसरे के पूरक हो जिससे संसाधनों की कार्यक्षमता उत्पादकता व लाभप्रदता मे पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए वृद्धि की जा सके. यह स्व-संपोषित प्रणाली है जिसमें जल एवं पोषक तत्वों का निरंतर प्रवाह होता रहता है, जिससे कृषि लागत में कमी आती है और कृषक की आमदनी में वृद्धि के साथ रोजगार भी मिलता रहता है. इसके अंतर्गत निम्न घटक शामिल हैं जो इस प्रकार है-

  • तापमान प्रबंधन.

  • मृदा प्रबंधन.

  • जल संरक्षण.

  • कृषि लागत में आत्मनिर्भरता.

  • फल और बागवानी.

  • पॉलीहाउस में सब्जियों एवं फूलों का उत्पादन.

  • मशरूम उत्पादन.

  • मधुमक्खी पालन.

  • कृषक परिवार की जरूरतों को पूर्ण करना.

  • सामाजिक आवश्यकताओं के लिए सालभर आमदनी.

  • फसल रोग निवारण केंद्र

यह कृषि संबंधित एक आगामी रोजगार साबित हो सकता है. बढ़ती जनसंख्या के फलस्वरूप प्रतिस्पर्धा के दौर में ज्यादातर छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं आदि में सीमित सीटों के चलते बेरोजगार रह जाते हैं. कृषि स्नातकधारियों के संदर्भ में फसल रोग निवारण व सलाह केंद्र रोजगार के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर वैज्ञानिक पद्धतियों के समुचित प्रयोग का भी साधन बन सकता है. इससे पढ़े-लिखे युवाओं के ज्ञान के उपयुक्त प्रयोग के साथ ही उनसे संबंधित किसानों का भी जीवन समृद्ध होगा.

  • सरकार के सार्थक उपक्रम

किसान की वित्तीय स्थिति व कृषि में सुधार की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता एवं संकल्प के अनुरूप दो प्रमुख पहल जारी किए गए हैं-

  • प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना:- यह भारत सरकार से 100% वित्त पोषित एक केन्द्रीय योजना है. इसे दिसंबर 2018 में लॉन्च किया गया था. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत लाभार्थी को प्रतिवर्ष 6000 रु० का वित्तीय लाभ प्रदान किया जाता है, जो कि 2000 रु० की तीन सामान राशि 4 मासिक किश्तों में देय है. केंद्र सरकार की इस मदद से कई किसानों को फायदा हुआ है. वर्तमान में इस योजना के लगभग 74 करोड़ लाभार्थी हैं. अब किसान, पीएम किसान योजना मोबाइल एप के जरिए अपना स्टेटस ऑनलाइन चेक कर सकते हैं.

सरकार के इन्हीं सार्थक प्रयासों के चलते छोटे व सीमांत किसानों को कुछ हद तक आर्थिक संबल प्राप्त हुआ है. एक आंकड़े के अनुसार विगत वर्षों में कृषि परिवारों की औसत मासिक कृषि घरेलू आय में वृद्धि देखी गयी है.

कृषि अवसंरचना कोष

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा लागू की गई यह एक अति महत्वपूर्ण योजना है. इस योजना की अवधि वित्तीय वर्ष 2020 से वित्तीय वर्ष 2029 तक है. किसान कल्याण के लिए एवं पारिस्थितिक तंत्र एवं सामुदायिक कृषि संपत्ति बनाने व वृद्धि मूल्य श्रृंखला में अधिक से अधिक निवेश करने के लिए सरकार द्वारा 1,00,000 करोड़ रु० की मंजूरी दी गई है. कृषि अवसंरचना कोष योजना से किसानों को विपणन बुनियादी ढांचे में सुधार करने और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए लाभ होगा जो उन्हें अपनी उपज को बेहतर मूल्य प्राप्त करने, अपव्यय को कम करने और सस्ती फसल के बाद बुनियादी ढांचे तक पहुंचाने की अनुमति देगा. इसका मुख्य उद्देश्य कृषि मूल्य श्रृंखला में निवेश को बढ़ावा देना है. इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में कई रोजगार उत्पन्न होने की सम्भावनाएं हैं.

लेखक: दुर्गेश चौरसिया1, डॉ रंजीत रंजन कुमार1, डॉ ज्ञानेंद्र कुमार राय2, सिद्धार्थ कुमार1, डॉ शैली प्रवीण1
1जैव रसायन संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली -110012
2शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

English Summary: become self-sufficient with the help of agriculture

Like this article?

Hey! I am KJ Staff. Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

Share your comments

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें. कृषि से संबंधित देशभर की सभी लेटेस्ट ख़बरें मेल पर पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें.

Subscribe Newsletters

Latest feeds

More News