Corporate

सुमिन्तर इंडिया ने राजस्थान के उदयपुर एवं डूंगरपुर के किसानों को दिया जैविक खेती का प्रशिक्षण

सुमिन्तर इंडिया ऑर्गेनिक्स ने राजस्थान के उदयपुर एवं डूंगरपुर जिले के गांव सुन्वान जी का खेड़ा, आनोद एवं वनकोड़ा में लगभग 150 किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया. यह प्रशिक्षण कंपनी द्वारा चलाए जा रहे जैविक खेती जागरुकता कार्यक्रम के अंतर्गत दिया गया. इन गांवों में अधिकांश किसानों के पास कम खेती है तथा आदिवासी बहुल क्षेत्र है प्रशिक्षण जैविक खेती क्या, क्यों, कैसे आदि प्रश्नों के साथ शुरु हुआ. गाँवों के पास पर्याप्त पशुधन हैं परंतु इनके गोबर की सही उपयोग खेती में नहीं हो रही है.

प्रशिक्षण कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधक (शोध एवं विकास) संजय श्रीवास्तव ने दिया और उन्होंने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि जैविक खेती का मुख्य आधार जैविक खाद है, जो पशुओं के मल- मूत्र एवं फसल अवशेष एवं वनस्पत्तियों से तैयार होती है. वर्तमान में किसान खाद या कम्पोस्ट को एक ढ़ेर के रुप में एकत्र कर वर्ष में एक बार गर्मी में खाली खेत में डालते हैं. ढ़ेर में खाद ठीक से स़ड़ती नहीं है और तेज गर्मी/धूप से उपलब्ध पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. साथ ही अधपकी खाद के उपयोग से खेतों में दीमक का प्रकोप बढ़ जाता है. इससे बचाव हेतु एवं अच्छी खाद मात्र 2 माह में कैसे तैयार हो इसके लिए राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र (NCOF) द्वारा विकसित वेस्ट डी-कंपोजर के उपयोग की विधि के बारे में बताया गया.

प्रशिक्षण में आए हुए किसानों को बहुलीकृत वेस्ट डी-कंपोजर की एक लीटर की बोतल प्रत्येक किसान को दी गयी तथा इसे पुन: कैसे बहुलीकृत कर उपयोग करें इसके बारे में भी बताया गया. इसके साथ ही किसानों को खाद तैयार करने की अन्य विधियां जैसे- घन-जीवमृत, जीवामृत, आदि के बारे में जानकारी दी गई.

प्रशिक्षण में खेत की तैयारी, बीज का चुनाव, जमाव परिक्षण, बीज उपचार, जिवाणु खाद का प्रयोग कर बीजोपचार कैसे करें इसकी जानकारी भी दी गई. उकठा या मरुरोग की समस्या आती है जिससे बचाव हेतु ट्राईकोडर्मा नामक जैविक फफूंद नाशी से बुवाई के पूर्व भूमि शोधन बताया गया.

किसानों को इसकी जानकारी भी दी गई कि फसल बोने के बाद खड़ी फसल में जीवामृत व वेस्ट डी- कंपोजर के घोल का किस प्रकार से प्रयोग किया जाए. प्रशिक्षण के दौरान जीवामृत तथा वेस्ट डी-कंपोजर के घोल को किस प्रकार से बनाया जाए इसके बारे में बताया गया और बना कर दिखा गया. चने की बढ़वार के बाद प्रमुख कीट तना छेदक से बचाव हेतु विषरहित फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग कब, कैसे करें तथा इसके क्या फायदे हैं बताया गया.

कीटों के नियंत्रण हेतु स्थानीय रूप से उपलब्ध पेड़ पौधों के पत्तियों का उपयोग कर विभिन्न प्रकार के हर्बल सत् तैयार कर उनका उपयोग कैसे करें बताया गया. जिसमें दशपर्णी अर्क, पंचपत्ती अर्क एवं सत गौ-मूत्र, पुरानीछाछ, नीम बीज सत्, लहसुन मिर्च सत् आदि को बनाकर दिखा गया. इसका फसल पर उपयोग कर किसान विषमुक्त उत्पादन बिना खर्च के प्राप्त कर सकते हैं.

स्थानीय रूप से उपलब्ध विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों की पहचान करायी गयी जिसका उपयोग वानस्पतिक की राशी में किया जाता है.  प्रशिक्षण का प्रबंधन कार्य कंपनी के सहायक प्रबंधक राशिद एवं अनूप सिंह ने किया.

प्रशिक्षण के दौरान किसानों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का संतोषजनक एवं उत्तर संजय श्रीवास्तव ने दिया तथा जैविक खेती में उत्पादन कम होता है, इस भ्रम को दूर किया. प्रशिक्षण की समाप्ति पर सुमिन्तर इंडिया ऑर्गेनिक्स की तरफ से संजय श्रीवास्तव ने यहां आए किसानों को धन्यवाद दिया.

गिरीश पांडे, कृषि जागरण



Share your comments


Subscribe to newsletter

Sign up with your email to get updates about the most important stories directly into your inbox

Just in