ताइवानी तकनीक से सब्जी उगाकर लीजिए सात गुना ज्यादा पैदावार

चंदौली (जितेंद्र उपाध्याय)। सब्जी की आधुनिक खेती देखना है तो आपको बेदहां गांव आना होगा। चंदौली जिले में स्थित इस गांव के सुरेंद्र सिंह ने इस विधा में महारथ हासिल कर ली है। ताइवानी पद्धति से सब्जी उगाकर वे सामान्य की अपेक्षा दस गुना तक अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। पैदावार इतनी है कि हर रोज 20 मजदूर लगाने पड़ते हैं। इससे स्थानीय लोगों को दैनिक रोजगार भी मुहैया हो गया है। बेदहां और मिर्जापुर के मड़िहान में इस पद्धति से की जा रही सब्जी की खेती अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय है। 

कैसे करते हैं खेती :  खेत की अच्छी जोताई के बाद गीली भुरभुरी मिट्टी की मेड़ बनाकर उसमें चार-चार इंच की दूरी पर बीज डालते हैं। मेड़ को प्लास्टिक से ढक दिया जाता है। जैसे ही बीज अंकुरित होते हैं, प्लास्टिक में छेद कर पौधे बाहर निकल आते हैं। इस विधि में न तो ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही ज्यादा लागत आती है। फसल में कीड़े भी नहीं लगते हैं। हां, ऊंचाई वाले खेत पर ही फसल उगाई जा सकती है। 

बीज और प्लास्टिक ताइवान के :  हरी मिर्च, शिमला मिर्च, खरबूज, तरबूज, टमाटर, खीरा आदि के बीज वे ताइवान से मंगाते हैं। भारतीय बीजों की तुलना में ताइवान के बीज छह से सात गुना ज्यादा पैदावार देते हैं। एक बार तोड़ाई के बाद भी पौधे खड़े रहते हैं। छह माह की फसल में 12 बार तोड़ाई करते हैं।

एक हेक्टेयर में 50 हजार लागत :  हरी मिर्च को ही लें तो पारंपरिक विधि के मुकाबले इस विधि में इसकी लागत काफी कम आती है। एक हेक्टयर में 50 हजार लागत आती है पर मुनाफा चार लाख रुपये तक मिलता है। सुरेंद्र बताते हैं कि कभी कभी तो इतनी पैदावार हो जाती है कि कई मंडियों में फसल पहुंचानी पड़ती है। हर जिंस में मुनाफा करीब आठ से दस गुना तक होता है। 

सिंचाई भी न के बराबर :  इस पद्धति में सिंचाई और उर्वरक की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है। पानी में उर्वरक मिलाकर मेड़ों में डाल दिया जाए तो वह हर पौधे की जड़ में पहुंच जाता है। टपक विधि से भी सिंचाई करते हैं। पौधे के ऊपर पानी टपकाकर भी उनकी सिंचाई हो जाती है। प्लास्टिक से ढक दिए जाने के कारण नीचे से उत्पन्न होने वाली वाष्प सहायक साबित होती है।

प्लास्टिक के कई फायदे : मेड़ों पर बिछाई गई प्लास्टिक से न तो घास पैदा होती है और न ही कीट पतंग फसल को नष्ट कर पाते हैं। घास प्लास्टिक के नीचे ही रहती है और पेड़ों तक नहीं पहुंच पाती। पौधों को बीमारी व कीटों से बचाने के लिए आर्गेनिक दवा का छिड़काव किया जाता है।

फसल से मिला बड़ा फायदा :  सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि धान और गेहूं की फसल पैदा करते-करते थक गए थे। छह साल पूर्व किसान कॉल सेंटर, सब्जी अनुसंधान केंद्र व पूसा इंडस्ट्रीज में जाकर सब्जी की खेती की तकनीक देखी। वहां के सदस्य बने और अपने यहां शुरुआत की। उन्हें भरपूर लाभ मिलता है पर मंडियों में दस फीसद आढ़तिया शुल्क अनावश्यक लगता है। यह बंद होना चाहिए।

Comments