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अमेरिकन केसर की खेती कर कमाए 8 लाख रूपये...

कड़ी मेहनत के अलावा पैंतीस से चालीस हजार रूपये खर्च करके अनुमानित करीब आठ लाख रूपये की केशर का उत्पादन किया है। यह न केवल परिवार और गाँव के लिए लिए हर्ष की बात है, बल्कि प्रदेश भर के किसानों के लिए प्रेरक साबित होगा।

किसान दलीप सिंह और महेंद्र प्रताप सिंह के घर के पास खेत में लहलहा रही केसर किसी स्वप्न से कम नहीं है। दलीप सिंह ने अपनी बेटी के बाल आग्रह पर इंटरनेट पर सर्च करके केसर की खेती पर अध्ययन किया। फिर भिवानी के किसान रतनलाल वर्मा और सोनीपत के किसान दिलबाग सिंह गुलिया के मार्गदर्शन में एक कनाल जमीन पर एक लाख साठ हजार रूपये किलो की दर से आठ हजार रूपये का पचास ग्राम बीज लाकर बोया था। समय समय पर  जैविक दवाइयों का छिड़काव कर पांच महीने में फसल को तैयार किया। फसल उत्पादन के प्रथम चरण में करीब दो किलो केसर निकाल ली है, केशर निकलने के बाद इसका बीज भी महंगी कीमत पर बिकता है।

दलीप सिंह और उनका परिवार केशर के अच्छे उत्पादन से बेहद खुश हैं। दलीप सिंह का कहना है कि सैकड़ों किसान केसर की खेती को देखने के लिए आ चुके हैं। कईयों ने बीज लेने के लिए भी बोला है, वह भी केसर का उत्पादन करना चाहते हैं।

उन्होंने बताया कि अक्तूबर-नवंबर में केशर का बीज बोया था, पिछले दस-पंद्रह दिन से केशर निकालना शुरू किया है। अभी तक दो किलोग्राम के लगभग केसर निकाल ली है और जैसे जैसे केसर के फूलों पर केसर की कलियां पक कर तैयार होती रहेंगी, वैसे वैसे ही एक- एक करके फूलों से केसर निकालते रहेंगे।

दलीप सिंह ने बताया की उन्होंने जो केसर उगाई है उसे अमेरिकन केसर बोला जाता है, जो गुणवत्ता में  दुनिया की तीसरे दर्जे की मानी जाती है। इसकी कीमत बाज़ार में सत(अर्क) के आधार पर लाखों रूपये प्रति किलो ग्राम की दर से बिकती है। जिसके लिए उन्होंने बाबा रामदेव के ट्रस्ट से संपर्क किया है साथ ही दिल्ली खारी बावली में केसर खरीदने वालों का पता निकाला है। 

दलीप सिंह ने दावा किया है कि उन्होंने पूर्णतय: जैविक प्रयोग किया है, कुछ दवाइयां वह दिलबाग सिंह से लेकर आये थे और कुछ दवाइयां उन्होंने नीम- तम्बाकू, हरी और लाल मिर्ची, गौमूत्र आदि से खुद बनाई थी, जिनका समय समय पर छिड़काव किया है। 



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