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हर ऑफिस कुछ कहता है !

कुछ भी पुराना नहीं लगता. ऐसा लगता है कि कल ही तो आया था यहां. लेकिन सच ये है कि 8 महीने गुज़र गए. पता ही नहीं चला. ऑफिस होता तो पता चलता न ! लेकिन ये ऑफिस कभी ऑफिस लगा ही नहीं. हमारे बॉस अक्सर कहते हैं - 'कृषि जागरण इज़ नॉट द ऑफिस, इट्स यौर होम'. इतने महीने यही सोचता रहा कि - ऑफिस घर कैसे हो सकता है ? लेकिन कुछ 2-3 दिनों से घर जैसी ज़बरदस्त फीलिंग ने मेरे अंदर भूंकप मचा रखा है. कुछ छूट रहा है जैसे ऐसा लग रहा है. मैनें पता किया तो पता चला कि आदत छूट रही है. आदत - महीने के 30 दिन में 22 दिन देर से आने की, आदत - पूरे ऑफिस के साथ मसखरी करने की, जोक क्रैक करने की, सीनियर्स और बॉस के साथ मज़े करने की और सबसे ज़रुरी आदत - आते ही सबको गुड मॉर्निंग कहके डिस्टर्ब करने की.

कृषि जैसे सीरियस टॉपिक का कैसे मज़ाक बनाना है, आप मुझसे सीख सकते हैं. मुझे भी यकीन नहीं होता कि 8 महीने जहां नौकरी की वहां की सबसे बेसिक जानकारी देने में भी मैं संकोच करता हूं. अभी कुछ 10 दिन पहले बॉस ने पूछ लिया कि हमारी पत्रिका कितनी भाषाओं में प्रकाशित होती है ?  मेरे पसीने छूट गए. ऐसा नहीं था कि मुझे पता नहीं था लेकिन कसम से मैं भूल गया और मैने कह दिया कि 17 भाषाओं में. बॉस बेहोश होते-होते बचे हैं. बॉस को हमेशा लगता रहा कि मैं अलग हूं. सही लगा लेकिन उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं अलग इसलिए हूं क्योंकि मैं एक नंबर का भूलक्कड़ हूं. बड़ी-बड़ी बातें यूं ही भूल जाता हूं. अभी लिख रहा हूं तो पता नहीं है कि क्या-क्या भूल गया हूं. जैसे एक फिल्म में अलग-अलग किरदार होते हैं वैसे ही हर ऑफिस में भी अलग-अलग कैरेक्टर होते हैं. कोई आपको भाता है और कोई बहुत भा जाता है. ऐसा होना ज़रुरी है नहीं तो ऑफिस तो क्या जिंदगी भी बोर हो जाए. जैसे खाने में हम अलग-अलग टेस्ट ढूंढते हैं वैसे ही ऑफिस भी होना चाहिए. अब रोज़-रोज़ कोई चावल-दाल तो नहीं खा सकता ना

अगर ऑफिस को कभी महसूस किया जाए तो पता चले कि ऑफिस के अंदर वो पूरा शहर बसता है, जिसमें आप रहते हैं. इसलिए नहीं कि यहां अलग-अलग धर्म और जाति के लोग रहते हैं, वो तो रहते ही हैं बल्कि इसलिए कि आपको ये पता चले कि जिस शहर में आप रह रहे हैं उस शहर की पसंद क्या है, वो शहर कैसे जी रहा है, उस शहर की सुबह कैसे होती है और सबसे ज़रुरी ये कि ये शहर सोता कैसे है ? चेहरे पढ़ना भी कला है- ' इट्स अ वैरी डिफरेंट आर्ट'. मैं सुबह ऑफिस में हर एक से हाथ मिलाते-मिलाते भाप लेता कि आज मूड क्या है ?  कोई ढिली हो चुकी जेब से परेशान, किसी का अपने बॉयफ्रेंड-गलफ्रेंड से ताज़ा-ताज़ा झगड़ा हुआ और बात ब्रेकअप तक पहुंच गई, किसी को घर की चिंता और किसी को हेल्थ की. शादीशुदा लोगों के बारे में मैं नहीं लिखूंगा क्योंकि उसमें बॉस भी आते हैं. मुझे दिक्कत हो सकती है. मैं लेखक हूं लेकिन थोड़ा चापलूस और भ्रष्ट टाइप का.

एक ऑफिस में काम करने वाले लोग अलग-अलग ज़िम्मेदारियों से बंधे हुए होते हैं. किसी के कंधों पर ऑफिस साफ रखने की ज़िम्मेदारी है तो कोई दिनभर गाड़ी चला रहा है. यहां तक की बॉस भी बॉस बने रहने के लिए हाथ-पैर मार रहा है. कोई फ्री नहीं है. लेकिन मैं फ्री रहा. पता नहीं क्यों मुझे कभी मेरा काम काम नहीं लगा. शायद यही वो नौकरी है जिसे मैं बेहतर तरीके से कर सकता हूं. शायद ही ऑफिस में कोई बचा हो जिसके साथ मैने खिल्ली न उड़ाई हो लेकिन एक चीज़ बिल्कुल एक जैसी देखी और वो है लोगों के अंदर खुश रहने का ज़ज्बा. लोग किसी भी शहर, देस-परदेस के हों, खुशी तलाशते हैं. कहां से हंसी चुराई जाए, कौन सा पल चेहरों को खुशी से भर दे. सच ये है कि इसी खुशी की तलाश में सब हैं और सबकी तलाश में खूशी...!

 

गिरीश पांडे



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