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गुरुद्वारे के गुरुद्वारे तक !

भगवान से नहीं पंडितों से परेशान हूं, अल्लाह से नहीं मौलवियों से हताश हूं लेकिन राहत मिलती है जब गुरुद्धारे को देखता हूं. कहने को तो वहां भी पंथी होते हैं लेकिन वहां पैसा आता नहीं बांटा जाता है. 'सेवा' के नाम से जो यहां देखने को मिला, वो कहीं और नहीं मिला . गुरुद्वारे को छोड़कर दूसरे धर्म स्थलों का अंदरुनी प्रोसेस आपको समझ नहीं आएगा और यदि आप समझना चाहेंगे तो आपको समझने नहीं दिया जाएगा. शायद इसीलिए आज पंडित और बाबा बाहर कम और अंदर ज्यादा है ( अंदर से मतलब यहां जेल से है ). भक्त की भगवान तक पंहुचे तब तक ये अपना काम कर डालते हैं. प्रसाद से लेकर चढ़ावे तक, सब पर गिद्ध की नज़र रखते हैं. चढ़ावे से समाज सेवा और नारायण सेवा के बजाय स्वंय सेवा हो रही है. महाशिवरात्रि की बात है. चारों ओर भोले बाबा के जयकारे लगे हुए थे. मंदिर घंटियों से गूंज रहा था. भक्तों का हुजुम उमड़ा और हर कोई भोलनाथ के दर्शन चाहता था. हर भक्त फल-फूल से लदा हुआ था और चाहता था कि सब शिवलिंग पर उढेल दे और उढ़ेला भी. दिन के 3 बजे  गए. मैं मंदिर पहुंचा तो समेटा-समेटी चल रही थी. मैने जयकारा लगाया और पूजा की. उसके बाद जब आशीर्वाद लेने पंडित के चरणों में गिरा तो उन्होनें मुझे टीका लगाया और अपने कोने में पड़ी कटोरी से मिसरी के चार दाने दे दिए. प्रसाद तो प्रसाद है लेकिन हैरानी होती है. मंदिर में बैठकर शास्त्र और धर्म-कर्म की बात करने वालों के अंदर लालच और मोह का ऐसा संगम ?

ऐसा ही कुछ मसला मौलवियों के साथ भी है. वो फल और फूल के पीछे तो नहीं है पर हां, अपने धर्म और कौम के खुदा बने फिरते हैं. शौक रखते हैं न्यूज़ चैनल्स पर बैठने का और आए दिन नए-नए फतवे जारी करने का. मेरी जानकारी में बहुत लोग हैं जो मुस्लिम है - मर्द भी और औरत भी. मर्द का तो कुछ पता नहीं पर हां, औरतों और मासूम बच्चों के हालात कभी ठीक नहीं देखे. जो दबी-कूचली हैं वो तो दबी ही रह जाएंगी लेकिन जो आवाज़ बुलंद कर रही हैं उनके लिए अभी दिल्ली दूर है. मजहब की नुमाइंदगी करने वाले कभी नहीं चाहेंगे कि इनकी दुकान बंद हो जाए. दरअसल, ये ताकतवर है क्योंकि इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं. हर कोई चाहता है कि वो अच्छी तालीम हासिल करे, समाज में जाएं,उसका आइना बने. लेकिन क्या ये डरते हैं  कि गर तालीम मिल गई तो कल को सवाल खड़े होंगे ? वही सवाल जो कभी मंटो ने उठाए थे या वही सवाल जो फैज़ ने उठाए थे. सवालों से वही डरता है जिसके पास ठोस जवाब नहीं होते, जिसकी बुनियाद मजहब के नाम पर गुमराह करने वाली चादर की है. आज अल्पसंख्यक कहा जाता है. मैं पूछता हूं - क्यों कहा जाता है ? किसने ये नाम दिया और जिसने नाम दिया उसको ये अधिकार किसने दिया ?

- खैर, इस लेख का मकसद सिर्फ इतना ही है कि धर्म,मज़हब, वर्ग या संप्रदाय मायने तब रखता है जब अधिकार मायने रखते हैं और अधिकार देने वाला संविधान है न कि पंडित और मौलवी. धर्म कोई भी हो, उसका मकसद एक ही है - अमन, प्यार, मौहब्बत और हां शांति या सूकून.



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