मात्र 21 दिन में क्षारीय मिटटी को सुधारता है वेस्ट डी-कंपोजर

कृषि के क्षेत्र में देश बहुत आगे बढ़ रहा है. हर रोज नए नए डेवलपमेंट हो रहे हैं. परन्तु खेती तो मृदा में ही होती है. देश के किसानों ने अंधाधुंध कीटनाशको और उर्वरको का इस्तेमाल करके खेत की मिटटी को ख़राब कर दिया है. जिसकी वजह से फसल में कमी भी आई है.ब्यादी खेत की मिटटी स्वस्थ होगी तो ही पैदावार अच्छी होगी. किसान आजकल क्षारीय और अम्लीय मृदा की समस्या से जूझ रहे हैं. ऐसे किसानों के लिए यह खबर मददगार साबित हो सकती है. वेस्ट डी कंपोजर जिसके विषय में कृषि जागरण पहले भी कई बार खबरे प्रकाशित कर चुका है. किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. इस उत्पाद के इस्तेमाल के किसान अब क्षारीय और अम्लता से प्रभावित खेतों से बेहतर उपज प्राप्त कर सकेंगे। वह भी एक माह से कम समय के भीतर। इसमें बहुत ही आसानी से सुधार किया जा सकता है. राष्ट्रीय जैविक केन्द्र, गाजियाबाद के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार वेस्ट डी कंपोजर किसानों के लिए एक वरदान साबित हो रहा है। इस केन्द्र के वैज्ञानिकों ने वेस्ट डी-कंपोजर तैयार करने का तरीका ईजाद किया है। इसका उपयोग करके किसान 21 दिन के भीतर क्षारीय और अम्लीय मृदा में सुधार देख सकेंगे। वेस्ट डी-कंपोजर का उपयोग 1000 लीटर प्रति एकड़ की दर से किया जाता है। जिससे सभी प्रकार की मिट्टी (क्षारीय-अम्लीय) के रासायनिक और भौतिक गुणों में इस प्रकार के अनुप्रयोग के 21 दिनों के भीतर सुधार आने लगता है। इससे 6 माह के भीतर एक एकड़ भूमि में 4 लाख से अधिक केंचुए पैदा हो जाते हैं। राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र ने इस तरह वेस्ट डी-कंपोजर के 40 मिलीलीटर शीशी की कीमत 20 रुपए रखी है। संस्थान का दावा है कि इससे कुछ ही देर में कई सौ लीटर तरल खाद तैयार (लिक्विड खाद) तैयार हो जाती है। इसकी मदद से घरेलू कचरे से बेहतर जैविक खाद भी तैयार कर सकते है। इस तरह के फॉर्मूले को प्राइवेट इंडस्ट्री को बेच दिया जाता था पहले इस तरीके की तकनीको को प्राइवेट कंपनी को बेच दिया जाता था जिससे की किसानों तक वह तकनीक सही रूप में नही पहुँचती थी इसलिए सरकार ने स्वत :  ही वेस्ट डी कंपोजर को प्रमोट करने का लक्ष्य रखा था ताकि किसानों को इसका फायदा मिल सके.

वेस्ट डी-कंपोजर जैविक खेती कर रहे किसानों के लिए जैविक खाद का बेहतर विकल्प है। कम खर्च में किसान इसकी मदद से स्वयं खाद बना सकता है। परीक्षण परिणाम बताते है कि इसके उपयोग से बीज का एक समान अंकुरण होता है। इसके उपयोग के बाद किसान को फसल में रासायनिक कीटनाशक और उर्वरक देने की जरूरत नहीं रहती है। खास बात यह है कि यह जड़ और तना संबंधी बीमारियों के नियंत्रण में भी यह उपयोगी पाया गया है।

वेस्ट-डी कंपोजर से जैविक खाद बनाने की विधि

कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए 1 टन कूडे-कचरे में 20 लीटर वेस्ट डी-कंपोजर का तैयार घोल छिडक दें। इसके ऊपर एक परत बिछा दें और फिर घोल का छिडकाव करें। इसके बाद सामग्री को ढककर छोड़ दें। तकरीबन 40 दिन में कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगी। इसकी एक शीशी से 20 किलो बीज का शोधन किया जा सकता है। एक शीशी डी-कम्पोस्ट को 30 ग्राम गुड़ में मिला दें। यह मिश्रण 20 किलो बीज के लिए पर्याप्त है। शोधन के आधे घंटे बाद बीज की बुवाई कर सकते हैं।

वेस्ट डी-कंपोजर एक छोटी सी शीशी में होता है। इसके उपयोग के लिए 200 लीटर पानी में 2 किलो गुड के साथ मिलाकर गर्मियों में 2 दिन और सर्दी में 4 दिन तक रखते हैं। इसके बाद यह उपयोग के लिए तैयार हो जाता है। इस दौ सौ लीटर घोल से एक बाल्टी घोल को फिर 200 लीटर पानी में मिला लें। इस तरह यह घोल बनाते रहे और खेत की सिंचाई करते समय पानी में इस घोल को डालते रहें। ड्रिप सिंचाई के साथ भी इस घोल का प्रयोग कर सकते हैं। इससे पूरे खेत में यह फैल जाएगा। इसके अलावा फसलों की बीमारी को दूर करने के लिए हर एक महीने में एक बार वेस्ट डी-कंपोजर का छिड़काव कर सकते हैं।

 

फुरकान कुरैशी

कृषि जागरण

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