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किसान मार्च में उमड़ी जनभावनाएं, हजारों छात्रों ने लिया हिस्सा

न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी, कर्जमाफी और कृषि संकट के समाधान के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग को लेकर किसानों ने रामलीला मैदान से संसद-मार्ग तक मार्च किया. इस मार्च में देशभर से किसानों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. खास बात यह रही कि किसानों के इस मार्च में छात्रों ने भी बढ़ - चढ़कर हिस्सा लिया. आंदोलनकारियों के साथ देश के कई हिस्सों से आई महिलाएं भी थीं.  उनके हाथों में आत्महत्या कर चुके अपने परिजनों की तस्वीरें थीं.

शुक्रवार सुबह 10: 15 बजे रामलीला मैदान से चलकर आंदोलनकारी पौने बारह बजे संसद मार्ग पर पहुंचे. किसानों के हुजूम के चलते भारी ट्रैफिक जाम के हालत पैदा हो गए. किसानों ने जाम में फंसे लोगों को अपनी समस्या और मांगों वाले पर्चे बांटें और जाम से उनको हो रही असुविधा के लिए खेद प्रकट किया. प्रदर्शनकारियों ने लाल, पीले और हरे रंग के झंडे ले रखे थे. यह रंग प्रदर्शन में शामिल उन महिलाओं की वेदना और दुःख को प्रदर्शित कर रहे थे जो कृषि संकट के चलते अपने परिजनों को खो चुकी हैं. देश के दक्षिणी राज्य से आई एक महिला जिसके पति ने आत्महत्या कर ली थी वह शब्दों से अपना दुख नहीं बता पा रही थी. उसकी आँखों से लगातार बेहिसाब आंसू बह रहे थे.

बिहार से आई कमला देवी कहती है "देश में हनुमान और राम मंदिर को लेकर बहस चल रही है जबकि देश के गरीब और लाचार लोगों की समस्यायों पर बात होनी चाहिए". बीरभूमि, पश्चिम बंगाल से आये अभिजीत रे बेहद तल्ख़ स्वर में कहते हैं "शहरी आबादी हमारी मुश्किलों और लचर हालात के बारे में सोचती तक नहीं है जबकि हम अगर खेती करना छोड़ दें तो उनका जीना मुमकिन नहीं हो पायेगा.

किसान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे थे और उनके हाथों में सरकार विरोधी पोस्टर और तख्तियां थीं. आंदोलनकारियों का नेतृत्व स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर समेत कई किसान नेता कर रहे थे. अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के तत्वाधान में किये गए इस मार्च में दिल्ली विश्वविद्यालय के हजारों छात्रों ने किसानों के समर्थन में हिस्सा लिया.

आंदोलन में शामिल देश के अलग- अलग क्षेत्रों से आए किसानों ने अपनी क्षेत्रीय और आंचलिक भाषाओँ में पोस्टर बनाए थे. इसके पीछे उनका मकसद अपनी क्षेत्रीय संस्कृति की पहचान और उनके राज्यों में किसानों को हो रही विविध समस्याओं की तरफ ध्यान खींचना था. आंदोलन में तमिलनाडु के किसान अर्द्ध-नग्न अवस्था में विरोध कर रहे थे. इसके अलावा कुछ ऐसे भी प्रदर्शनकारी थे जो मानव हड्डियों और नर कंकाल की माला पहनकर चल रहे थे.

रोहिताश चौधरी, कृषि जागरण



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