नाम के साथ साथ पैसा भी चाहिए...


पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिले में कुशमंडी के परंपरागत लकड़ी के मुखौटे बनाने वाले कलाकारों को बड़े बाजार की तलाश है ताकि उनका हुनर उनकी आय में बढ़ोतरी करा सके। पीढ़ियों से मुखौटे बनाने वाले कलाकारों का आरोप है कि मुखौटा बनाकर उन्हें पहचान तो मिलती है लेकिन पैसा नहीं। इस मास्क को स्थानीय तौर पर मुखा कहा जाता है। 
ऐसे ही कलाकार सचिन सरकार ने कहा, 'मैंने 10 सिर वाले रावण का मुखौटा बनाया था, जो फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में है लेकिन इससे मुझे कोई ज्यादा आर्थिक लाभ नहीं मिला। प्रसिद्ध होना अच्छी बात है लेकिन इससे मेरी रोजाना की जरूरतें पूरी नहीं होती।' सचिन आगे बताते हैं कि दस सिर वाले मुखौटे को कोलकाता में एक प्रदर्शनी में लगाया गया था और संग्रहालय के एक सदस्य को पसंद आने के बाद लंदन के एक संगठन ने इसे वहां भेजने का प्रबंध किया। 

मुखा बनाने वाले कलाकार कुशबंडी ब्लॉक के माहिषबथन गांव में रहते हैं लेकिन उनकी आजीविका का मुख्य साधन कृषि है। सचिन ने कहा, 'हमारे मुखौटे की कीमत एक हजार से 30 हजार रुपये के बीच है लेकिन मुखौटे बनाने का काम आसानी से उपलब्ध नहीं है।' एक अन्य कलाकार प्रकाश सरकार ने कहा कि अगर हमें स्थानीय बाजारों में मुखौटे की उचित कीमत नहीं मिल रही तो सरकार को इनकी मार्केटिंग बाहर करनी चाहिए। राज्य के बाहर इनकी अच्छी कीमत मिलती है। 

ये मुखौटे परांपरागत तौर पर देवी दुर्गा, लक्ष्मी, काली आदि के होते हैं। पिछले चार वर्ष से राज्य सरकार यूनेस्को और एक निजी संस्था बांग्लानाटक डॉट कॉम के सहयोग से कुशमंडी मुखौटे पर मेले का आयोजन कर रही है। बांग्लानाटक डॉट कॉम के अधिकारी एन रॉय ने कहा कि संस्थान ने कलाकार शंकर को 2015 में फ्रांस में एक हस्तशिल्प प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए भेजा था। उन्होंने कहा, 'हमें जरा भी उम्मीद नहीं थी कि उस प्रदर्शनी के बाद मुखाटै की मांग बढ़ जाएगी। वहां हम जो कुछ भी ले गए ,सब बिक गया।' 

सूत्र: एनबीटी

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