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एनसीसीएफ ने टिकाऊ वन प्रबंधन के लिए नेशनल सर्टिफिकेशन स्कीम की शुरुआत की...

नेटवर्क फॉर सर्टिफिकेशन एंड कन्जर्वेशन ऑफ फॉरेस्ट (एनसीसीएफ) ने सरकार, उद्योग और अन्य स्टेकहोल्डर्स के सहयोग और उनकी भागीदारी से भारत के अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क फॉरेस्ट मैनेजमेंट सर्टिफिकेशन स्टैंडर्ड जारी किए हैं। इस अवसर पर सस्टेनेबल फॉरेस्ट मैनेजमेंट यानी टिकाऊ वन्य प्रबंधन के लिए नेशनल सर्टिफिकेशन स्कीम का भी शुभारंभ किया। एनसीसीएफ द्वारा फॉरेस्ट सर्टिफिकेशन पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में इस स्कीम का एलान किया गया। इस स्कीम से प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी के साथ उपयोग सुनिश्चित होगा और भारत में वन्य उत्पादन के व्यापार के लिए एक बिल्कुल नया ढांचा सामने आएगा।

इस अवसर पर एनसीसीएफ के चेयरमैन और आईएएस (सेवानिवृत्त) श्री विजय शर्मा ने कहा, ‘कठोर प्रक्रिया, कई चरणों में हुई चर्चाओं, क्षेत्रीय परामर्श कार्यशालाएं और पायलट (शुरुआती) परीक्षण के बाद अंतिम रूप देकर घरेलू सर्टिफिकेशन (प्रमाणन) योजना को शुरू करने में तीन साल लग गए। इन स्टैंडर्ड्स से वनों और जैव विविधता में परिवर्तनशीलता का हल निकालना आसान हो जाएगाय जांच और कानूनी तंत्र विकसित करना जिससे अवैध कटान को काबू में किया जा सकेय खरीददार और आपूर्तिकर्ता दोनों के बीच जिम्मेदारी पूर्ण व्यापार सुनिश्चित करनाय गैर टैरिफ प्रवेश रोकना और नए बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करके सही कीमत दिलानाय सक्रिय जोखिम प्रबंधन को मजबूत बनानाय और जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन सुनिश्चित करना आदि संभव होगा।’

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इससे टिकाऊ विकास के लक्ष्यों (एसडीजी), अभिप्रेत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान यानी इंटेंडेड नेशनली डिटरमाइन्ड कॉन्ट्रीब्यूशन (आईएनडीसी), यूनाइटेड नेशंस फोरम ऑन फॉरेस्ट्स (यूएनएफएफ), जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी), ग्रीन इंडिया मिशन (जीआईएम), कम्पन्सेटरी अफॉरेस्टेशन फंड मैनेजमेंटट एंड प्लानिंग अथॉरिटी (सीएएमपीए), नेशनल अफॉरेस्टेशन प्रोग्राम (एनएपी) जैसी राष्ट्रीय योजनाओं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को हासिल करने में भी मदद मिलती है।

फॉरेस्ट सर्टिफिकेशन के घटक विशेष रूप से टिकाऊ विकास के लक्ष्यों (एसडीजी) और रिड्यूसिंग इमिशन फ्रॉम डिफॉरेस्टेशन एंड फॉरेस्ट डिग्रेडेशन (आरईडीडी प्लस) के तत्वों में इजाफा करता है। जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस समझौते में एक बार फिर से आरईडीडी प्लस के माध्यम से टिकाऊ वन प्रबंधन पर जोर दिया गया, जिसमें भारत भी एक पक्ष है। 

इसलिए है जरूरतः वन संसाधन मुख्य रूप से दो वजह से संकट में हैं-पहला लकड़ी के व्यावसायिक इस्तेमाल और दूसरा भूमि उपयोग में बदलाव से वनों की कटाई। अभी तक दो  दृष्टिकोण अपनाए गए-पहला ‘ऊपर से नीचे’, जहां सरकार नीतियां तैयार करती है और लागू करती हैय और दूसरा ‘नीचे से ऊपर’, जो वनों के संरक्षण के लिहाज से ज्यादा भागीदारी पूर्ण दृष्टिकोण है। हालांकि दोनों के बेअसर रहने से तीसरे दृष्टिकोण ‘वन प्रमाणन’ (फॉरेस्ट सर्टिफिकेशन) की दिशा में बढ़ना पड़ा। इसमें केंद्रीय या स्थानीय अधिकार के बजाय व्यावसायिक अधिकार के माध्यम से नीतिगत बदलाव पेश किए गए और बाध्यकारी तंत्र के तौर पर नियामकीय अनुपालन के बजाय बाजार स्वीकार्यता का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा लेसी अमेंडमेंट एक्ट, 2008 (अमेरिका)य यूरोपियन यूनियन टिंबर रेग्युलेशन (ईयूटीआर)य फॉरेस्ट लॉ एन्फोरेसमेंट इन गवर्नैंस एंड ट्रेड (एफएलईजीटी)य इलीगल लॉगिंग प्रोबिशन एक्ट, 2011 (ऑस्ट्रेलिया) आदि विकसित देशों के कानूनों के माध्यम से अवैध रूप से मंगाए गए पौधों और लकड़ी व कागज सहित उनके उत्पादों के व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया है। इससे हाल के दौर में वन प्रमाणन के माध्यम से कानूनी व्यापक स्तर पर कानूनी तौर पर आपूर्ति की जरूरत को बढ़ावा मिला है।

एनसीसीएफ सचिव सुनील पांडे के मुताबिक, ‘राज्य वन विकास निगम और राज्य वन विभागों में प्रमाणित उत्पादों के बाजार में उतरने और उनकी उत्पादों को अच्छी कीमत दिलाने की खासी संभावनाएं हैं। भारत में कुल मांग की तुलना में प्रमाणित लकड़ी की कुल आपूर्ति 10 प्रतिशत से भी कम है। प्रमाणित उत्पादों पर प्रीमियम वसूलकर प्रमाणन की लागत की भरपाई आसानी से की जा सकती है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामाजिक स्वीकार्यता और प्रतिबद्धता के ऊंचे स्तर से बढ़ने वाली ख्याति (या साख) को भी नहीं भूलना चाहिए।’

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एनसीसीएफ में संयोजक और कोषाध्यक्ष श्री सचिन राज जैन ने कहा, ‘इस क्रम में एनसीसीएफ, ट्रीज आउटसाइड फॉरेस्ट्स (टीओएफ), प्रोटेक्टेड एरिया एंड वेटलैंड्स (पीएडब्ल्यू) और नॉन वुड फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स (एनडब्ल्यूएफपी) के लिए प्रमाणन मानक विकसित कर रहा है। इन भारत केंद्रित, अंतरराष्ट्रीय स्तर के बेंचमार्क प्रमाणन मानकों से हमारे संपन्न वनों और जैव विविधता को संरक्षित करने और बढ़ाने में लंबा वक्त लगेगा। एनसीसीएफ टिकाऊ पारिस्थितिकी पर्यटन और टिकाऊ खनन के अन्य स्थायी मानकों के विकास की प्रक्रिया भी शुरू करने की योजना बना रहा है।’

मंत्रालयों, उद्योग संगठनों और कंपनियों जिन्होंने मानकों के विकास में भाग लियाः यूएन एजेंडा 21 के तहत प्रतिष्ठित पेशेवर वन अधिकारियों के प्रतिनिधित्व वाले एक बहुपक्षीय स्टैंडर्ड डेवलपमेंट ग्रुप (एसडीजी) का गठन किया गया, जो भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई)य पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफएंडसीसी) के भारतीय वन प्रबंध संस्थान (आईआईएफएम)य कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालयय वाणिज्य मंत्रालयय कपड़ा मंत्रालयय भारतीय गुणवत्ता परिषदय ग्रीन इनिशिएटिव्स सर्टिफिकेशन एंड इन्सपेक्शन एजेंसी (जीआईसीआईए)य राज्य वन विभागों और राज्य वन विकास निगमों के प्रतिनिधिय इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्सर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन)य विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ)य भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई)य सीआईआई-आईटीसी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंटय इंडियन पेपर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईपीएमए)य हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीएच)य केमिकल एंड एलाइड एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (सीएपीईएक्सआईएल)य सेंटर फॉर इंडियन बैम्बू रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी (सीआईबीएआरटी)य इंटरनेशनल नेटवर्क फॉर बैम्बू एंड रतन (आईएनबीएआर)य द एनर्जी रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) और कई अन्य संगठनों से संबंधित हैं। इसके अलावा आईटीसी पीएसपीडी ग्रीनप्लाई इंडस्ट्रीजय स्टार पेपर मिल्सय तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स लिमिटेड (टीएनएनपीएल)य डालमिया भारत ग्रुप आदि उद्योग जगत के कई नाम भी इससे जुड़े हैं।

एनसीसीएफ के बारे में

नेटवर्क फॉर सर्टिफिकेशन एंड कन्जर्वेशन ऑफ फॉरेस्ट (एनसीसीएफ) एक उभरता हुआ बहुपक्षीय गैर लाभकारी संगठन है। स्टैंडर्ड डेवलपमेंट, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, संरक्षण, नीति की वकालत, क्षमता निर्माण आदि उसकी कुछ प्रमुख गतिविधियों में शामिल हैं। सामाजिक-आर्थिक विकास की प्राथमिकताओं और वैश्विक पर्यावरण चिंताओं के साथ परिदृश्य पूरी तरह बदल रहा है, जिनमें जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण को हो रहा नुकसान, जैव विविधता हानि, बंजर भूमि में इजाफा, वन्य जीव प्रणाली पर दबाव, शहरी वायु की खराब गुणवत्ता और आजीविका को नुकसान शामिल है। संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य वन विभागों, व्यावसायिक वन विशेषज्ञ, सामाजिक संगठनों, शोध एवं शैक्षणिक संस्थानों, उद्योग, वनों में रहने वाले, किसान समूह, कामगार संगठन और कई अन्य के साथ भागीदारी से एनसीसीएफ को विशेष संरक्षण उद्देश्यों को हासिल करने में मदद मिली है।

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