उत्तर भारत में कपास के रेशे की गुणवत्ता में हुआ सुधार

 

उत्तरी भारत में हरियाणा, पंजाब व राजस्थान में कॉटन के रेशा की क्वालिटी में सुधार हुआ है। जिससे आने वाले समय में कॉटन की डिमांड बढ़ती ही जाएगी। कृषि मंत्रालय की पांच सदस्यीय टीम ने केंद्रीय कपास प्रौद्योगिक अनुसंधान केंद्र सिरसा में समीक्षा बैठक की हुई। जिसमें कॉटन के रेशा में 28 एमएम से 32 एमएम यानि 4 एमएम का पिछले पांच सालों के अंदर क्वालिटी में सुधार हुआ है। वहीं आगे भी कॉटन की क्वालिटी में सुधार के लिए पांच के लिए रणनीति बनाई गई है। गौरतलब है कि हरियाणा, पंजाब और राजस्थान देश के प्रमुख कपास उत्पादक प्रदेश हैं। इन प्रदेशों में 15 लाख हेक्टेयर रकबे में कपास की खेती होती है। इससे प्रतिवर्ष 50 लाख गांठों का उत्पादन होता है।

कृषि मंत्रालय की टीम में आनंद कृषि विश्वविद्यालय आनंद गुजरात के कुलपति डॉ. एनसी पटेल के नेतृत्व में पांच सदस्यीय टीम केंद्रीय कपास प्रौद्योगिक अनुसंधान केंद्र सिरसा पहुंची। जिसमें क्वालिटी सुधार के लिए पांच साल तक के कार्य की समीक्षा हुई। समीक्षा में वैज्ञानिकों ने बताया कि उत्तरी भारत में पांच साल से कॉटन की गुणवत्ता में काफी सुधार आया है। पांच साल पहले कॉटन के रेशा में 28 एमएम लंबाई थी। जबकि पिछले सालों से गुणवत्ता में सुधार से 32 एमएम तक पहुंच गई है। केंद्र के प्रभारी डॉ. अमीद हसन ने पांच साल का लेखा जोखा पेश किया।

कृषि मंत्रालय की टीम ने वैज्ञानिकों के साथ कॉटन में गुणवत्ता सुधार के लिए मंथन किया गया। जिसमें वैज्ञानिकों ने कॉटन की सुधार के लिए नई किस्मों को तैयार करने की योजना बनाई। वहीं किसानों को गुणवत्ता रेशा के लिए जागरूक करने का फैसला लिया गया। वहीं किसानों को कॉटन की चुगाई में कोई कचरा साथ न मिले। इसके लिए अच्छे तरीके से चुगाई करने के लिए किसानों को जागरूक करने का फैसला लिया। वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिण भारत में रेशा की 40 एमएम तक की लंबाई है। जिससे कॉटन का धागा टूटता नहीं है। इसे बहुत अच्छी क्वालिटी मानी जाती है। इस कॉटन की दूसरे देशों में निर्यात किया जाता रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार नगदी कपास सदियों से भारतीय किसानों की एक पसंदीदा फसल रह चुकी है। यह अच्छी और पर्याप्त आय अर्जित कर सकती है। कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण रेशेदार फसल होने के साथ-साथ देश की कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कपड़ा उद्योग के लिए कपास रीढ़ के समान है। कपड़ा उद्योग में 60 प्रतिशत रेशा इस्तेमाल होता है।

सिरसा जिले में कॉटन की सबसे अधिक खेती की जाती है। जिसको लेकर जिले को कॉटन काऊंटी जिला भी कहा जाता है। जिले में 2 लाख 8 हजार हेक्टेयर पर कॉटन की बिजाई की जाती रही है कृषि मंत्रालय की पांच सदस्यों की टीम ने केंद्र में समीक्षा बैठक की। वहीं खेतों में जाकर कॉटन की फसलों का भी निरीक्षण किया। पिछले पांच सालों में कॉटन के रेशा में काफी सुधार हुआ है। पिछले पांच सालों में 28 एमएम रेशा की लंबाई थी। जो 4 एमएम बढ़कर 32 एमएम तक पहुंच गई है। इससे किसानों को भी आगे काफी फायदा मिलेगा। क्योंकि जितने रेशा की लंबाई होगी उतनी ही कॉटन मांग बढ़ेगी।

डॉ. हमीद हसन, प्रभारी, केंद्रीय कपास प्रौद्योगिक अनुसंधान केंद्र सिरसा

 

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