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बीज परिसंस्करण में ट्राईकोडर्मा का महत्व

ट्राईकोडर्मा क्या है? आइए जानते हैं विस्तार से इसके बारे में. यह एक घुलनशील जैविक फफुंदीनाशक और कवकनाशी है जो ट्राइकोडर्मा विरडी या ट्राइकोडर्मा हरजिएनम पर आधारित है. ट्राइकोडर्मा फसलों में जड़ तथा तना गलन/सडन उकठा (फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोर्म्, स्केल रोसिया डायलेकटेमिया) जो फफूंद जनित है, में फसलों पर लाभप्रद पाया गया है. धान,गेंहू, दलहनी फसलें, गन्ना, कपास, सब्जियों फलों एवं फल व्रक्षो पर रोगों से यह प्रभावकारी रोकथाम करता है. यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से उपयोगी है. यह एक जैव-कवकनाशी है और विभिन्न प्रकार की कवकजनित बीमारियों को रोकने में मदद करता है. इससे रासायनिक कवकनाशी के ऊपर निर्भरता कम हो जाती है. इसका प्रयोग प्रमुख रूप से रोगकारक जीवों की रोकथाम के लिये किया जाता है. इसका प्रयोग प्राकृतिक रूप से सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसके उपयोग का प्रकृति में कोई दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिलता है. यह प्रकृति में रोग कारकों पर सीधा आक्रमण कर उसे अपना भोजन बना लेता है या उन्हें अपने विशेष एन्ज़ाइम जैसे काइटिनेज, β-1,3, ग्लूकानेज द्वारा तोड़ देता है. इस प्रकार रोगकारक जीवों की संख्या तथा उनसे होने वाले दुष्प्रभाव को कम करके पौधों की रक्षा करता है.

ट्राइकोडर्मा उत्पादन विधि और प्रयोग (कैसे करे उत्पादन )

1. बीजोपचार:- बीजोपचार के लिए प्रति किलो बीज में 5 -10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर जिसमें 2 *10^6 सी.एफ.यू प्रति ग्राम होता है, को मिश्रित कर छांव में सूखा ले फिर बुआई करें.

2. कंद उपचार:-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति लीटर पानी में डालकर घोल बना लें फिर इस घोल में कंद को 30 मिनट तक डुबाकर रखें. इसे छाया में 30 मिनट रखने के बाद बुआई करें.

3. सीड प्राइमिंग: बीज बोने से पहले खास तरह के घोल की बीजों पर परत चढ़ाकर छाया में सुखाने की क्रिया को ‘सीड प्राइमिंग’ कहा जाता है. ट्राइकोडर्मा से सीड प्राइमिंग करने हेतु सर्वप्रथम गाय के गोबर का गारा (स्लरी) बनाएँ. प्रति लीटर गारे में 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा उत्पाद मिलाएँ और इसमें लगभग एक किलोग्राम बीज डुबोकर रखें. इसे बाहर निकालकर छाया में थोड़ी देर सूखने दें फिर बुवाई करें. यह प्रक्रिया खासकर अनाज, दलहन और तिलहन फसलों की बुवाई से पहले की जानी चाहिए.

4. मृदा शोधन: एक किलोग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 25 किलोग्राम कम्पोस्ट (गोबर की सड़ी खाद) में मिलाकर एक सप्ताह तक छायादार स्थान पर रखकर उसे गीले बोरे से ढँकें ताकि इसके बीजाणु अंकुरित हो जाएँ. इस कम्पोस्ट को एक एकड़ खेत में फैलाकर मिट्टी में मिला दें फिर बुवाई/रोपाई करें.

5. नर्सरी उपचार: बुवाई से पहले 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा उत्पाद प्रति लीटर पानी में घोलकर नर्सरी बेड को भिगोएँ.

6. कलम और अंकुर पौधों की जड़ डुबकी: एक लीटर पानी में 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा घोल लें और कलम एवं अंकुर पौधों की जड़ों को 10 मिनट के लिये घोल में डुबोकर रखें, फिर रोपण करें.

7. पौधा उपचार: प्रति लीटर पानी में 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर का घोल बनाकर पौधों के जड़ क्षेत्र को भिगोएँ.

8. पौधों पर छिड़काव: कुछ खास तरह के रोगों जैसे पर्ण चित्ती, झुलसा आदि की रोकथाम के लिये पौधों में रोग के लक्षण दिखाई देने पर 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

उत्पादन करते समय ध्यान रखे

1. उत्पादन हेतु छाँव वाला स्थान का होना ज़रूरी है. जिससे कि सूर्य की किरणें ढ़ेर पर सीधी नहीं तिरछी पढ़े. ढ़ेर में उचित नमी बनाए रखें.

2. 25 - 30 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान का होना बहुत ज़रूरी है.

3. समय-समय पर ढ़ेर को बदलते रहे उसके रख रखाव का ध्यान रखें.

खेतों में प्रयोग विधि

उपरोक्त विधि द्वारा तैयार ट्राइकोडर्मा को बुवाई से पहले 20 किलो ग्राम प्रति एकड़ की दर से मिट्टी में मिला देते हैं. बुवाई के पश्चात भी पहली निराई-गुड़ाई के समय पर भूमि में इसे मिलाया जा सकता है. ताकि यह पौधों की जड़ों तक पहुँच जाए और सही से अपना काम करें.

रोहित ख़ुराना, कृषि जागरण



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