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चने में जेनेटिक कोड की खोज देगी हर मौसम में उच्च पैदावार

45 देशों के 21 अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों की टीम ने एक महान खोज को अंजाम दिया है .  इस महान खोज को अंजाम देने के लिए  वैश्विक स्तर के 39  वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक साथ काम किया. जिसमें उन्होंने चने की 429 प्रजातियों का सूखे और गर्मी के प्रति बर्दाश्त रखने वाले नए जीनों की खोज की है. वैज्ञानिकों की इस  टीम का नेतृत्व हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी-एरिडट्रॉपिक्स (ICRISAT ) ने  बीजीआई शेनज़ेन( BGI-Shenzhen)  के साथ मिलकर किया. वैज्ञानिकों के इस प्रयास ने चने की फसल कीआनुवंशिक विविधता, उसका विकास और उससे जुडी कृषि संबंधी लक्षणों को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है. इस अध्ययन ने चने के उद्भव केंद्र एवं भारत और अफ्रीका में चने के प्रवेश के मार्ग का भी ज़िक्र किया है. कृषि समुदाय के लिए इसका मतलब ये है कि, इस खोज कि मदद से अब चने की ऐसी प्रजातियां विकसित की जा सकेंगी जो उच्च पैदावार के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के अनुकूल होंगी.

21 शोध संस्थानों के 39 वैज्ञानिको ने साथ मिलकर चने की इतनी सारी प्रजातियों के पूर्ण-जीनोम काअनुक्रमण करके विश्व में एक अद्वितीय उपलब्धि प्राप्त की है . तीन साल के लंबे प्रयासों के परिणामस्वरूप, एक शोध पत्र‘

45 देशों के 429 चने के रस का अनुक्रमण:- जीनोम विविधता, वर्चस्व और कृषि संबंधी लक्षणों में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है,

(Resequencing of 429 chickpea accessions from 45 countries provides insights into genome diversity, domestication and agronomic traits’, )

उपरोक्त शोध पत्र  जेनेटिक्स के क्षेत्र की दुनिया की नंबर 1 शोध पत्रिका नेचर जेनेटिक्स (Nature Genetics), (Journal) में भी प्रकाशित हुआ है.

आज चने की खेती के कुल क्षेत्र का 90% से अधिक हिस्सा दक्षिण एशिया में है. वैश्विक स्तर पर सूखा और बढ़ते तापमान से चने की पैदावार को 70% से अधिक का नुकसान होता है. वहीं ठंडे मौसम की फसल होने की वजह से बढ़ते तापमान के कारण  चने की उत्पादकता में और कमी आने की संभावना उत्पन्न हो रही है. इस परियोजना कार्य के प्रमुख और " द इंटरनेशनल क्रोप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी एरिड ट्रॉपिक्स " (ICRISAT) में जेनेटिक गेन्स(Research Program Genetic Gains) के रिसर्च प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. राजीव वार्ष्णेय,  एवं डायरेक्टर सेण्टर ऑफ़ एक्सीलेंसइन जीनोमिक्स एंड सिस्टम्सबायोलॉजी (CEGSB),ने बताया कि “जीनोम-वाइड एसोसिएशन के अध्ययन से हमें 13 महत्वपूर्ण लक्षणों के लिए जिम्मेदार जीन्स की पहचान करने में सफलता मिली है. उदाहरण के लिए, हमने “REN1,  β-1,  3-glucanase, REF6’’ जैसे जीन्स की खोज की है.  जो फसल को 38डिग्री सेल्सियस  तक तापमान सहन करने और उच्च उत्पादकता प्रदान करने में सक्षम करता है.

इस अध्ययन में यह भी पुष्टि की गई है कि चना अफगानिस्तान से होते हुए उपजाऊ वर्धमान (Fertile Crescent ) भूमध्यसागरीय क्षेत्र से भारत आया था और और 200 साल बाद मूल  प्राथमिक केंद्रों में वापस लाया जा सकता है. इस नए अध्ययन से ये भी संभावना प्रकट होती है कि वर्तमान युग में चने का प्रवेश भूमध्य सागर के बजाय मध्य एशिया या पूर्वी अफ्रीका से ही सीधे हुआ होगा. डॉ. वार्ष्णेय ने बताया कि हमारे इस उत्कृष्ट शोध से, चने की उत्पत्ति के केंद्र के संदर्भ में ये संकेत भी मिले हैं कि फर्टाइलक्रिसेंट /  मेडिटेरेनियन, चने की विविधता का प्राथमिक और इथियोपिया द्वितीयक केंद्र होने की संभावना है. हमारे नए अध्ययन से यह भी पता चलता है कि चने का स्थान-परिवर्तन भूमध्यसागरीय/ फर्टाइल क्रिसेंट के समानांतर समय में मध्य एशिया से पूर्वी अफ्रीका में इथियोपिया और दक्षिण एशिया में भारत में हुआ होगा.नए अध्ययन ने बड़े पैमाने पर जर्मप्लाज्म रिसर्च और फसल के  प्रजनन करने के लिए एक नींव स्थापित की है. जिससे चने के घरेलूकरण और उत्तर-घरेलूकरण जैसे विषयों को समझने में भी मदद  मिली है.

इस खोज परअपने विचार व्यक्त करते हुए  ICRISAT  के महानिदेशक डॉ. पीटर कार्बेर्री ने कहा कि, “इस नए खोज से कृषि प्रजनकों, को विविध जर्मप्लाज्म और जीन का उपयोग करके जलवायु-परिवर्तन के लिए तैयार चने की नई किस्म विकसित करने में मदद मिलेगी. जो विकासशील देशों में कृषि उत्पादकता में वृद्धि और स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान होगा. इस अध्ययन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए,  जर्मनी की द ग्लोबल क्रोप डायवर्सिटी ट्रस्ट की  कार्यकारी निदेशक, सुश्री मैरी हागा  ने कहा कि  “यह चने की जर्मप्लास्म संग्रह की विवधता को समझने में ICRISAT और अन्य सहयोगी भागीदारों का शानदार प्रयास हैं. एक ओर इन प्रयासों से फलियों के विज्ञान के अनुसंधान में तेजी आएगी, साथ ही, उच्च उपज देने वाली और जलवायु परिवर्तन से बचाने वाली चने की किस्मों को विकसित करके विकासशील देशों में कृषक समुदाय को मदद पहुंचाएगी. वहीं दूसरी ओर चीन की बीजीआई-रिसर्च कंपनी  के अध्यक्ष  और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. सुसुन, जो कि इस प्रोजेक्ट के सह-प्रमुख हैं ने बताया कि  बीजीआई,  सीजीआई  संस्थानों जैसे ICRISAT के साथ उच्चस्तरीय विज्ञान पर काम के लिए बहुत उत्साहित है. जो ऐसे अनुप्रयोग करने का मौका देते है, जिससे भारत और अफ्रीका में चने की नई किस्म विकसित की जा सके. जो सूखा और गर्मी सहन करने में सक्षम हो.

कृषि अनुसंधान के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) में  शिक्षा विभाग के प्रमुख और महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने कहा “यह वैश्विक कृषि अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है. साथ ही यह अद्वितीय वैज्ञानिक समाधान दुनिया की कृषि सम्बंधित समस्याओं को कम करने में मदद करेंगे.ज्यादातर भारतीय आहारों में चना प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है  और भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है. फिर भी, बढ़ती मांगों के बावजूद, उत्पादन में कमी हुई है. दलहन देश में कृषि के केंद्र में है और यह नया शोध भारत को दलहन उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त करने के लिए मदद कर सकता है.



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