महत्वपूर्ण बिंदु:
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नकली और अपंजीकृत एग्रोकेमिकल्स भारतीय खेती के लिए संगठित आर्थिक अपराध बन चुके हैं.
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उर्वरकों में बढ़ती आयात निर्भरता आत्मनिर्भरता के दावों पर सवाल खड़े करती है.
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कृषि की वृद्धि दर अर्थव्यवस्था से आधी रहना ग्रामीण आय संकट को गहरा करता है.
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रसायन-आधारित खेती से निकलकर जैविक और स्वदेशी पोषण मॉडल ही दीर्घकालिक समाधान हैं.
अगली बार आप जब भी नाश्ता या भोजन करने बैठे तो एक बार गहराई से जरूर सोचिएगा कि क्या आपकी आने वाली पीढियां को भी यह नाश्ता, दोनों पहर का भोजन अबाध रूप से मिलने वाला है? हकीकत तो यही है कि भारतीय खेती इस समय एक साथ कई मोर्चों पर संकट से जूझ रही है. पिछले कुछ दिनों में सामने आई खबरें यदि एक साथ रखी जाएं, तो तस्वीर और भी भयावह दिखती है. एक ओर गुजरात जैसे औद्योगिक रूप से अग्रणी राज्य में नकली और जहरीले एग्रोकेमिकल्स का संगठित नेटवर्क किसानों की फसलों, मिट्टी और भरोसे को नष्ट कर रहा है.
दूसरी ओर, उर्वरकों के मामले में भारत की आयात निर्भरता खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है. तीसरी ओर, अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि के बावजूद कृषि क्षेत्र की सुस्त रफ्तार ग्रामीण भारत की कमजोर हालत को उजागर कर रही है. यह केवल अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई संरचनात्मक विफलताएं हैं.
गुजरात में हालिया छापों और एफआईआर ने यह साफ कर दिया है कि नकली एग्रोकेमिकल्स अब छोटे-मोटे अपराध नहीं रहे. राजकोट, अहमदाबाद और अंकलेश्वर जैसे केंद्रों से संचालित यह नेटवर्क बहुराज्यीय आपूर्ति शृंखलाओं के जरिये किसानों तक पहुंच रहा है. प्रतिष्ठित ब्रांडों के नाम पर बिक रहे ये उत्पाद न केवल फसलें चौपट कर रहे हैं, बल्कि मिट्टी और पानी को भी दीर्घकालिक रूप से प्रदूषित कर रहे हैं. यूपीएल UPL Limited द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में यह स्वीकार किया गया कि नकली उत्पादों का दायरा लगातार फैल रहा है और इसका अनुमानित कारोबार एक हजार करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकता है. यह महज बौद्धिक संपदा का उल्लंघन नहीं, बल्कि किसान और उपभोक्ता दोनों के साथ धोखा है.
इस संकट का असर केवल गुजरात तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र सहित पड़ोसी राज्यों में इन नकली रसायनों की आपूर्ति ने व्यापक फसल क्षति की खबरें दी हैं. तथाकथित “बायो” उत्पादों में रासायनिक अवशेष मिलना और उनका केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड में पंजीकृत न होना, नियामक तंत्र की कमजोरी को भी उजागर करता है. 2015 में फिक्की FICCI की एक अध्ययन रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी थी कि यदि 25 प्रतिशत तक एग्रोकेमिकल्स गैर-प्रामाणिक हुए, तो उत्पादन में चार प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है और करोड़ों टन खाद्यान्न निर्यात जोखिम में पड़ सकता है. आज वही चेतावनी हकीकत बनती दिख रही है.
इसी पृष्ठभूमि में उर्वरकों के मोर्चे पर सामने आए आंकड़े और भी चिंता बढ़ाते हैं. अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच यूरिया आयात में 120 प्रतिशत और डीएपी आयात में 54 प्रतिशत की वृद्धि यह बताती है कि घरेलू उत्पादन लगातार कमजोर हो रहा है. भारतीय फर्टिलाइजर संगठन (Fertiliser Association of India) के आंकड़े साफ कहते हैं कि यूरिया की 27 प्रतिशत और डीएपी की करीब 67 प्रतिशत मांग आयात से पूरी की गई. रुपये की कमजोरी और वैश्विक कीमतों की अनिश्चितता के दौर में यह निर्भरता खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है. आत्मनिर्भरता के दावे तब खोखले लगते हैं, जब खेत की सबसे बुनियादी जरूरतें विदेशी आपूर्ति शृंखलाओं पर टिकी हों.
यहां एक गहरी विडंबना है. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भर खेती को दशकों से आधुनिकता का प्रतीक बताया गया, लेकिन आज वही खेती शेर की सवारी जैसी हो गई है. जब तक शेर पर बैठे हो, तब तक मौत सिर पर मंडराती है, और उतरने की कोशिश करो तो शेर खा जाता है. रसायनों पर टिके रहने से मिट्टी मर रही है, लागत बढ़ रही है और किसान कर्ज में डूब रहा है. लेकिन अचानक बिना वैकल्पिक व्यवस्था के इससे निकलना भी जोखिम भरा लगता है. यही वह नीति जाल है, जिसमें भारतीय किसान फंसा हुआ है.
इस जाल का असर राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में भी दिखता है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के प्रथम अग्रिम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में जहां जीडीपी वृद्धि 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, वहीं कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की वृद्धि केवल 3.1 प्रतिशत रहेगी. देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार देने वाले क्षेत्र की यह सुस्ती ग्रामीण मांग को दबाए रखती है. शहरी सेवाएं और वित्तीय क्षेत्र तेज दौड़ रहे हैं, लेकिन खेत और किसान पीछे छूटते जा रहे हैं. यह असंतुलन लंबे समय में सामाजिक और आर्थिक तनाव को जन्म देगा.
समाधान केवल सख्त छापों और आयात प्रबंधन तक सीमित नहीं हो सकता. नकली एग्रोकेमिकल्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है किसानों को ऐसे विकल्प देना, जिनसे वे रसायनों के चक्र से बाहर निकल सकें. यदि 2047 तक भारत को सचमुच जहर-मुक्त और जैविक खेती की ओर ले जाना है, तो उर्वरकों में आत्मनिर्भरता सबसे पहला कदम होगा. जैविक खाद, हरी खाद और प्राकृतिक माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का स्थानीय स्तर पर उत्पादन ही इस दिशा में ठोस रास्ता है.
इस संदर्भ में बस्तर के कोंडागांव में विकसित प्राकृतिक खेती का मॉडल एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है. मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म और रिसर्च सेंटर में विकसित “नेचुरल ग्रीनहाउस” पद्धति दिखाती है कि कैसे पेड़ों पर आधारित संरचना, लतावार फसलें, पेड़ों के नीचे बची 90% खाली जमीन पर दुर्लभ औषधीय पौधों तथा मसालों की अंतर्वर्ती फसलें और पेड़ों से रोजाना गिरने वाली पत्तियां व अन्य जैविक अवशेष मिलकर एक ऐसा तंत्र बना सकते हैं, जहां एक एकड़ जमीन से कई एकड़ों के बराबर उत्पादन और पोषण मिलता है. पारंपरिक पॉलीहाउस पर जहां 40 लाख रुपये तक की लागत आती है, वहीं यह टिकाऊ मॉडल केवल एक से डेढ़ लाख रुपये में तैयार हो जाता है और इसमें रासायनिक खाद पर एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ता.
मिट्टी में नैसर्गिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के चलते मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, सूक्ष्मजीवों की संख्या कई गुना होती है और केंचुओं के जरिए प्राकृतिक वर्मी कंपोस्ट बनने लगता है. यह न केवल लागत घटाता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते ताप प्रभाव से खेतों को सुरक्षा भी देता है. प्लास्टिक वाला पाली हाउस जहां 7-8 साल में कबाड़ में बदल जाता है वहीं यह प्राकृतिक ग्रीन हाउस सालों साल चलते रहता है, और हर दस 10 साल में बहुमूल्य इमारती लकड़ी के रूप में करोड़ों रुपए का अतिरिक्त फायदा भी देता है.
आज की चुनौती यही है कि नीति-निर्माण ऐसे जमीनी उदाहरणों से सीखे. नकली रसायनों के खिलाफ कानून, उर्वरक आयात की विवशता और कृषि की कमजोर वृद्धि, तीनों एक ही सवाल पूछते हैं. क्या हम खेती को केवल आपूर्ति शृंखला और सब्सिडी का विषय मानते रहेंगे, या उसे फिर से मिट्टी, जैव विविधता और किसान की समझ से जोड़ेंगे. यदि जवाब दूसरा है, तो भारत को शेर की सवारी से उतरने का साहस करना होगा. वह साहस तभी संभव है, जब उतरने के बाद खेत में एक सुरक्षित, स्वदेशी और जैविक रास्ता पहले से तैयार हो.
लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, कृषि तथा ग्रामीण मामलों के विशेषज्ञ एवं 'अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)' के राष्ट्रीय संयोजक
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