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सूखा के चलते रबी फसल की बुबाई में 54 फीसदी की कमी

महाराष्ट्र में पानी की कमी के चलते सर्दियों में बोई जाने वाली फसलों पर बुरा असर हुआ है. ताजा सीजन में पिछले वर्ष के नवंबर के मध्य तक हुई बुबाई के मुकाबले 54 फीसदी की कमी आई है. कृषि विभाग के अधिकारीयों का कहना है कि राज्य में सूखे के चलते गर्मियों में बोई गई फसल के उत्पादन पर भी असर पड़ेगा. 

राज्य में पीने की पानी की भी भारी किल्लत है. इसी के चलते सूखा प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में पेयजल आपूर्ति करने वाले टेंकरों की संख्या पिछले साल के मुकाबले आठ गुना तक बढ़ गई है.

मौजूदा रबी सीजन में 15 नवंबर तक महज 13.05 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुबाई हो पायी है जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान 28.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुबाई की गई थी. रबी के मौसम में राज्य में सबसे प्रमुख फसल ज्वार की होती है. इसका इस्तेमाल मवेशियों के चारे के रूप में किया जाता है. ताजा स्थिति को देखते हुए ज्वार और मक्के जैसी फसलों का बुबाई का रकबा बहुत ही कम है जिसका सीधा असर इनकी पैदावार पर भी पड़ेगा. नतीजतन पशुओं के लिए चारे की किल्लत जैसी समस्या से दो चार होना पड़ सकता है.

देश भर में जारी ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे मोटे अनाज की बुवाई 45% कम हुई है. साथ ही दालों की बुबाई में भी 18 फीसदी की कमी दर्ज की गई है. सीधे तौर पर कहें तो सभी रबी फसलों की बुबाई में 36 फीसदी की गिरावट देखी जा रही है.

पिछले दो महीनों के दौरान मूंग, उडद, चना और तुअर दालों की थोक और खुदरा कीमतों में 15 फीसदी उछाल आया है. मुख्य रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक में उगाई जाने वाली प्रमुख रबी फसल ज्वार के दामों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है.

वर्तमान में राज्य के जलाशयों में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1 9% कम पानी उपलब्ध है. सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस हफ्ते तक महाराष्ट्र के जलाशयों में जल भंडारण 53.9 1% था जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान इसकी मात्रा 73.32% थी.

राज्य सरकार 715 टैंकरों से गांवों में पेयजल की आपूर्ति कर रही है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह संख्या महज 89 थी. मराठवाड़ा क्षेत्र के लातूर शहर, जिसे 2016 के सूखा के दौरान ट्रैन से पानी की आपूर्ति की गई थी अब उसे 10 दिनों में एक बार पानी मय्यसर हो रहा है. 2016 के सूखे के दौरान यहाँ 20 से 25 दिनों में एक बार पीने के पानी का उपयोग किया जाता था.

रोहिताश चौधरी, कृषि जागरण 



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