मछली पिंजड़ा-पालन की वर्तमान स्थिति एवं उसके लाभ

मछली पालन कोई नया विषय नहीं है बल्कि सैंकड़ों, वर्षों पहले न केवल भारत वर्ष में अपितु सम्पूर्ण विश्व के अन्दर शुरू होने वाला एक व्यवसाय है जो कि व्यवसाय होने के साथ-साथ संतुलित आहार का भी एक जरिया है लेकिन यह मछली पालन कई सौ साल पहले पारम्परिक ढंग से किया जाता था जिसमें मछुआरे समुद्रों, नदियों, तालाबों एवं पोखरों में जाल फेंककर मछली पकड़ते थे एवं उसे भोजन के रूप में इस्तेमाल करते थे। धीरे-धीरे समय के साथ इस क्षेत्र में नई तकनीकियों का विकास हुआ जिसमें नए जालों का निर्माण, मत्स्य बीज उत्पादन इकाई (हैचरी) कृत्रिम तालाब का निर्माण, रेस-वे कल्चर, रिज़रवायर फिशरी, प्रोसेसिंग प्लान्ट का विकास हुआ। इसी के साथ-साथ एक ओर तकनीक पिंजड़ा पालन का भी विकास हुआ है जिसमें किसी बड़े जलाशय में पिंजड़ा बनाकर उसमें मछली पालन किया जाता है।

मछली पिंजड़ा पालन की आवष्यकता

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि दिन-प्रतिदिन जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है एवं खेती योग्य भूमि कम होती जा रही है तो वर्तमान समय में हमारे सामने ये चुनौती है कि कम समय एवं कम भूमि में अधिक पैदावार कैसे की जाए। एक अनुमान के अनुसार 2020 तक भारत में मछली की मांग 13 मिलियन टन हो जाएगी जबकि वर्तमान में यह उत्पादन केवल 10.06 मिलियन टन है (65 प्रतिशत जमीन पर स्थित जल स्रोतों से एवं 35 प्रतिशत उत्पादन समुद्रों से)

कुछ सालों से समुद्रों से प्राप्त होने वाला मछली उत्पादन स्थिर हो गया है एवं इसे तुरंत बढ़ाना संभव नहीं है। इन परिस्थितियों में या हालातों में जमीन पर स्थित जल स्रोत जैसे रिज़रवायरर्स महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। भारत में वर्तमान में 19370 रिज़रवायर हैं जो कि 15 राज्यों में फैले हुए हैं। इनका क्षेत्रफल 3.15 मिलियन हैक्टेयर है एवं अगले 10 साल में यह क्षेत्रफल दोगुना होने की संभावना है क्योंकि कई सारे वाॅटर प्रोजेक्ट स्थापित हो रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिसर के प्रतिष्ठित संस्थान सी.आई.एफ.आर.आई. द्वारा विकसित तकनीकी, जारी रिपोर्ट व दिशा-निर्देश को पूरे देश में अलग-अलग रिज़रवायर्स में लागू किया गया एवं औसत उत्पादन जो 20 किलोग्राम/हैक्टेयर प्रतिवर्ष था उसे 110 किलोग्राम/ हैक्टेयर/ वर्ष तक बढ़ाने में सफलता मिली।

हालांकि रिज़रवायर मछली उत्पादन में एवं क्षमता में एक बहुत बड़ा अन्तराल है। रिज़रवायर से मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए 3000 मिलियन से भी अधिक एडवान्स साईज की मछली अंगुलिकाओं की आवश्यकता है लेकिन सम्बन्धित जाति की मछली की एडवान्स साईज के मछली अंगुलिकाओं की अनुपलब्धता के कारण अधिकतर जलाशय अन्डर स्टॉक रह जाते हैं।

इस अवस्था में मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए मछली पिंजड़ा पालन को अपनाना एवं विस्तार करना एक सही तरीका है जो कि मछली पालकों के लिए आजीविका एवं रोजगार के अवसरों को बढ़ा सकता है। मछली पिंजड़ा पालन मत्स्य अंगुलिका को पालने एवं मछली उत्पादन (मार्केट साइज) दोनों उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। इसमें जमीन पर आधारित नर्सरी तालाब पर निर्भरता कम हो जाएगी एवं प्रति इकाई मछली उत्पादन बढ़ जाएगा।

आई.सी.ए.आर.-सी.आई.एफ.आर.आई. द्वारा मछली पिंजड़ा पालन तकनीक के जरिए औसतन 60 अंगुलिकाएं/m3 संचय करके 50 kg/m3 मछली उत्पादन प्राप्त किया जा चुका है।

वर्तमान में मछली पिंजडा पालन की स्थिति

मछली की लगभग 80 जातियां इस समय पिंजड़े में पाली जाती है। इनमें से पूरे विश्व में अटलांटिक साल्मन सम्पूर्ण पिंजड़ा पालन उत्पादन का लगभग आधा (51%) हिस्सा पूर्ण करती है। इसके अलावा 27% उत्पादन पंगेसियस प्रजाति, तिलापिया आदि मछलियों से होता है।

मीठे पानी के मछली पिंजड़ा पालन में चीन इस समय 7.00 लाख टन (68.4 प्रतिशत) उत्पादन के साथ प्रथम स्थान पर है। इसके बाद वियतनाम 1,26000 Tonn (12..2%) और इन्डोनेशिया 67700 Tonn (6.6%) उत्पादन कर रहा है।

चाइना में यह 30 जातियों के साथ किया जाता है। मीठे पानी में किए जाने वाले पिंजड़ा पालन के उत्पादन में पंगास मछली 41.1% उत्पादन के साथ नं. 1 पर है एवं तिलापिया मछली 26.7 प्रतिशत उत्पादन के साथ दूसरे नं. पर व कॉमन कॉर्प का उत्पादन 6.6% है।

पंगास मछली 50 m3 से 1600 m3  आकार के पिंजड़े में पाली जाती है एवं इन पिंजड़ों में 100 से 150 अंगुलिकाएं संचित करके 100 से 120 किलोग्राम/ m3  उत्पादन प्राप्त किया जाता है।

मछली पिंजड़ा पालन के लाभ

- यह पानी को स्वतंत्र रूप में पार होने देता है जिससे कि पानी के बहाव के साथ गंदगी बह के दूर हो जाती है ।

- रिजरवायर के उपलब्ध क्षेत्र को प्रभावकारी ढंग से उपयोग करता है ।

- अधिक लचीलापन ।

- कम कीमत तालाब के निर्माण की तुलना ।

- मछलियों की देख-भाल करना व सेम्पलिंग करना आसान होता है ।

- कुछ संचय घनत्व व उच्च उत्पादन क्षमता ।

- अधिक उत्तर जीविता ।

- प्रभावशाली खाद्य प्रबंधन ।

- आसान रख-रखाव व आसानी से मछली पकड़ना ।

- प्रबंध के लिए कम मजदूरों की आवश्यकता ।

- उच्च ठ रू ब् अनुपात ।

- उच्च उत्पादन लागत की तुलना में ।

- मछली संग्रहण युक्ति के रूप में कार्य करते हैं ।

वर्तमान मछली पिंजड़ा पालन की स्थिति एवं उत्पादन क्षमता एवं पाली जाने वाली मछलियां

आई.सी.ए.आर.-सि.आई.एफ.आर.आई द्वारा मछली पिंजड़ा पालन की क्षमता का प्रदर्शन किया जा चुका है। मछली पिंजड़ा पालन को 2010-12 के दौरान एन.एफ.डी.बी, आर.के.वी., एन.एम.पी.एस. से आर्थिक मदद मिलने के बाद इसमें तेजी से वृद्धि हुई है। इसकी वजह से देश के 15 राज्यों के रिजरवायर में मछली पिंजड़ा पालन को वृहद् स्तर पर अपनाया गया है।

झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र इस तकनीक का वृहद् स्तर पर उपयोग हो रहा है। वर्तमान में वहां पर अलग-अलग आकार के 6000 से भी अधिक फ्लोटिंग पिंजड़े हैं ।

पाली जाने वाली मछलियां - पंगास, तिलापिया, जयन्ति रोहु, लेबियो बाटा, मुरेल्स, रंगीन मछलीयाँ, फ्रेश वाटर प्रोन आदि वर्तमान में Cage Culture is 50 kg/m3 औसत उत्पादन प्राप्त किया जा रहा है।

भारत में वर्तमान समय में जमीन पर स्थित जल स्त्रोतों के लिए गेलवेनाइज्ड आयरन के बने हुए पिंजडे एवं एच.डी.पी.ई माड्यूलर पिंजड़े वृहद स्तर पर अपनाए जा रहे हैं और अब माड्यूलर पैंटून फाईबर से बने हुए पिंजड़े भी प्रचलित हो रहें हैं।

नई पीढ़ी के पिंजडे 5 X 5 X 4 व 6 X 6 X 4 आकार के प्रचलित हो रहे हैं एवं यह आकर्षक बात है कि निजी फार्म भी उच्च उत्पादन क्षमता की वजह से पिंजड़ा पालन को अपना रहे हैं ।

पंगास की खेती के लिए प्रोटीन अनुपात 20 से 30 प्रतिशत  होना चाहिए एवं इसके लिए एफ.सी.आर. 1.3- 1.5 बीःसी 1.48 से 1.85 जबकि आई.एम.सी के लिए 2.24 से 2.50 पाया गया है।

मछली पिंजड़े के आकार एवं प्रकार

भारत में मछली पालन के लिए विभिन्न आकार एवं आकृति व विभिन्न पदार्थों के बने हुए पिंजडे इस्तेमाल किए जाते हैं। शुरूआत में बांस से बने हुए विभिन्न आकृति के पिंजड़े इस्तेमाल किए जाते थे। इसके बाद गेलवेनाइज्ड आयरन के बने हुए पिंजड़े इस्तेमाल किए जाने लगे एवं काफी लोकप्रिय हुए व वर्तमान में लगभग 80% गेलवेनाइज्ड आयरन से बने हुए पिंजडे इस्तेमाल हो रहे है।

गेलवेनाईज्ड़ आयरन के पिंजडों में 4 No./Battery (6 ग 4 ग 4) व एच.डी.पी.ई मॉड्यूलर पिंजड़ों के लिए 6 No./Battery(6 X 4 X 4) उपयुक्त है। बड़े आयताकार पिंजड़े मार्केट के आकार की आई.एम.सी. के लिए उपयुक्त हैं। झारखण्ड राज्य के चाण्डिल रिजरवायर में बड़े आयताकार 36 X 16 X 5  0 12 X 3 X 5 व 12 व्यास के गोलाकार पिंजडे़ इस्तेमाल किए जाते हैं। 

पिंजड़ा पालन के लिए किस प्रकार की मछली का चयन करें

- बाजार में मांग हो।

-बाजार में कीमत अच्छी हो।

- वातावरणीय कारकों में होने वाले उतार-चढ़ाव को सहन कर सके व उनके लिए अधिक संवेदनशील न हो।

- बाहरी स्रोत से दिए गए भोजन को सीमित जगह में आसानी से ग्रहण कर सकें।

- मछली की हैण्डलिंग के दौरान जैसे - जाल बदलते समय, जाल साफ करते समय, मछली को एक जगह से दूसरी जगह स्थानान्तिरित करते समय तनाव में ना आए।

- अधिकतर जलाशय ओलिगो ट्रोफीक होते हैं एवं मछलियां अधिक मात्रा में संचय की जाती हैं। इसलिए भोजन के बाहरी स्रोत की आवश्यकता होती है। अतः अधिक वृद्धि दर व उतरजीवीता के लिए इसे आसानी से ग्रहण कर सकें। कुछ उपयुक्त मछलियों के उदाहरण निम्न हैं। उत्तम बीज की उपलब्धता के अनुसार इनका चयन कर सकते है:-

रोहु, कालबासु, लेबियो बाटा, सिरायनस रीबा, कटला, सी बास, तिलापिया, पंगास, कॉमन कॉर्प, फ्रेश वॉटर प्रोन (झींगा) आदि ।

ऐसे मुद्दे जिनमें सरकार वैज्ञानिकों को सुधार करने की आवष्यकता है-

- हमें वातावरण की शुद्धता को ध्यान में रखते हुए कम कीमत वाले पिंजड़े बनाने होंगे ।

- क्षेत्र की प्रमुखता/पसंद के अनुसार मत्स्य विविधिकरण ।

- पिंजड़ा पालन के लिए एक उपयुक्त स्ट्रेन तैयार करना होगा ।

- क्षेत्र विशेष के लिए मछली पिंजड़ा पालन को बढ़ावा देने कि लिए विशेष योजनाएं बनानी होंगी ।

- क्षेत्र विशेश के हिसाब से पसंदीदा मछली की मत्स्य बीज इकाइयां (हैचरी) एवं प्रजनन स्टॉक विकसित करने होगी ।

- स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों को इस्तेमाल करते हुए कम प्रदूषण फैलाने वाला, कम कीमत वाला व सम्बन्धित मछली की प्रजाति के लिए उपयुक्त कृत्रिम संतुलित आहार बनाना होगा ।

 

कृषि जागरण मासिक पत्रिका, जनवरी माह

नई दिल्ली

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