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₹1.72 लाख करोड़ का बजट, विकास का बड़ा दावा
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आकार बढ़ा है, अब असर जमीन पर दिखना बाकी है.
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किसान केंद्र में, पर आय बढ़ाने की असली परीक्षा आगे
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₹10,000 करोड़ की योजना राहत दे सकती है, स्थायी समृद्धि नहीं.
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महिला और युवा उद्यमिता को अवसर का संकेत
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घोषणाएं मजबूत हैं, लेकिन आसान ऋण और बाजार अभी भी चुनौती.
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असली सवाल: बजट घोषणा बनेगा या बदलाव?
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क्रियान्वयन की गति ही सफलता तय करेगी.
छत्तीसगढ़ का ताजा बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक आश्वासनों, आर्थिक आकांक्षाओं और सामाजिक अपेक्षाओं का मिश्रित आख्यान है. लगभग ₹1.72 लाख करोड़ के आकार वाला यह बजट पहली नजर में विस्तारवादी और जनोन्मुख प्रतीत होता है. राज्य सरकार ने कृषि, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्योग और अधोसंरचना को विकास की धुरी बताया है. किंतु बजट को पढ़ते समय बार-बार यह प्रश्न मन में उठता है कि क्या हम विकास की वास्तविक यात्रा पर हैं या घोषणाओं के एक सुव्यवस्थित उत्सव में सहभागी बन रहे हैं.
भारतीय परंपरा में कहा गया है, “अर्थस्य मूलं राज्यम्” अर्थात राज्य की स्थिरता का आधार उसकी अर्थव्यवस्था होती है. इस दृष्टि से देखें तो किसानों के लिए ₹10,000 करोड़ की कृषक उन्नति योजना निश्चित ही महत्वपूर्ण कदम है. छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह निवेश ग्रामीण क्रयशक्ति बढ़ाने की क्षमता रखता है. परंतु अनुभव यह भी बताता है कि आर्थिक सहायता तभी स्थायी परिणाम देती है जब वह उत्पादक निवेश में बदल सके. अन्यथा अनुदान अल्पकालिक राहत तो देता है, दीर्घकालिक परिवर्तन नहीं.
महिला सशक्तिकरण को बजट का प्रमुख स्वर बताया गया है. 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाली बेटियों के लिए ₹1.5 लाख की सहायता योजना सामाजिक सुरक्षा का संदेश देती है. एक युवा महिला उद्यमी की दृष्टि से यह स्वागतयोग्य है, किंतु प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल सहायता राशि से संभव है? उद्यमिता को पूंजी से अधिक भरोसेमंद बाजार, प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता होती है.
यहां अंग्रेजी अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स का कथन याद आता है, “The difficulty lies not so much in developing new ideas as in escaping from old ones.” हमारे बजट अक्सर नई योजनाओं की घोषणा करते हैं, पर प्रशासनिक ढांचे की पुरानी जटिलताओं से मुक्त नहीं हो पाते. युवा उद्यमी आज सब्सिडी नहीं, बल्कि सरल ऋण प्रक्रिया और जोखिम साझा करने वाली नीति चाहता है.
राज्य की अनुमानित 11.5 प्रतिशत से अधिक जीएसडीपी वृद्धि दर का दावा उत्साहजनक है. यदि यह वृद्धि वास्तविक उत्पादन, प्रसंस्करण और स्थानीय उद्योगों में दिखाई दे तो छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी राज्यों में स्थान बना सकता है. किंतु विडंबना यह है कि खनिज संपन्नता के बावजूद मूल्य संवर्धन अभी भी सीमित है. कच्चा माल बाहर जाता है और रोजगार अवसर भी उसके साथ ही पलायन कर जाते हैं.
संस्कृत का एक प्रसिद्ध वचन है, “उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी” अर्थात परिश्रमी और उद्यमी के पास ही समृद्धि आती है. यदि राज्य वास्तव में उद्यमिता को बढ़ावा देना चाहता है, तो उसे छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए स्थानीय क्लस्टर, प्रोसेसिंग यूनिट और निर्यात सहायता तंत्र को मजबूत करना होगा. केवल योजनाओं के नाम बदलने से आर्थिक संरचना नहीं बदलती.
बजट में अधोसंरचना और सड़कों पर निवेश का संकेत भी दिया गया है. यह आवश्यक है क्योंकि बाजार तक पहुंच ही ग्रामीण उत्पादन को मूल्य दिलाती है. परंतु यहां भी वही पुरानी कहानी सामने आती है. सड़क बनती है, लेकिन उसके किनारे उद्योग नहीं बनते. बिजली पहुंचती है, पर उत्पादन इकाइयां नहीं खुलतीं. विकास का गणित तभी पूर्ण होगा जब अधोसंरचना और उद्योग नीति एक साथ चलें.
व्यंग्य यह है कि हर बजट में “ऐतिहासिक” शब्द अवश्य जुड़ जाता है, जबकि किसान और उद्यमी के जीवन में परिवर्तन अक्सर “क्रमिक” ही होता है. सरकारी दस्तावेजों में आत्मनिर्भरता तेजी से आती है, पर बैंक की शाखा में पहुंचते ही उद्यमी को गारंटी, गिरवी और प्रक्रियाओं का लंबा अध्याय पढ़ना पड़ता है.
“यथा बीजं तथा फलम्” यह भारतीय ज्ञान परंपरा का सरल सिद्धांत है. यदि नीति का बीज पारदर्शिता और दक्षता का होगा, तभी परिणाम विकास का मिलेगा. अन्यथा योजनाएं आंकड़ों में सफल और जमीन पर संघर्षरत ही दिखाई देंगी.
एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि बजट ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला भागीदारी को विकास का आधार माना है. यह सोच सही दिशा में संकेत करती है. छत्तीसगढ़ की वास्तविक शक्ति उसके गांव, वन और स्थानीय ज्ञान परंपरा में निहित है. यदि वन उत्पाद, जैविक खेती और स्थानीय प्रसंस्करण को वैश्विक बाजार से जोड़ा जाए, तो राज्य एक वैकल्पिक आर्थिक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है.
अब प्रश्न सुझावों का है. पहला, महिला और युवा उद्यमियों के लिए “सिंगल विंडो” वास्तव में सिंगल होनी चाहिए, न कि कई खिड़कियों का गलियारा. दूसरा, कृषि को केवल समर्थन मूल्य तक सीमित न रखकर मूल्य संवर्धन उद्योगों से जोड़ा जाए. तीसरा, स्टार्टअप नीति में ग्रामीण नवाचारों को प्राथमिकता दी जाए. चौथा, सरकारी खरीद में स्थानीय उद्यमों के लिए न्यूनतम आरक्षण सुनिश्चित किया जाए.
अंततः बजट को लेकर न अत्यधिक उत्साह उचित है, न निराशा. अंग्रेजी लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने लिखा था, “Progress is impossible without change.” परिवर्तन की दिशा तय हो चुकी है, अब गति और ईमानदारी तय करेगी कि यह बजट इतिहास बनेगा या केवल एक और दस्तावेज.
छत्तीसगढ़ के इस बजट ने आशा का बीज अवश्य बो दिया है. अब देखना यह है कि शासन उसे केवल घोषणा की मिट्टी में छोड़ता है या नीति, पारदर्शिता और क्रियान्वयन के जल से सींचकर वास्तविक विकास का वृक्ष बनाता है. क्योंकि अंततः बजट की असल सफलता सदन की तालियों से नहीं, लोगों के जीवन में आए सार्थक परिवर्तन से मापी जाती है.
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