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Farm laws: कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर हुई मोदी सरकार, किसानों के बीच खुशी की लहर

लगभग एक साल से देश में चल रही उथल-पुथल के बाद आज कुछ ऐसा हुआ जिसने सभी को हैरान कर दिया है. दरअसल, कृषि कानूनों (Farms Laws) की तारीफ करते-करते केंद्र सरकार ने इस कानून को वापस लेने का निर्णय लिया है.

प्राची वत्स
Krishi Kanun
Krishi Kanun

लगभग एक साल से देश में चल रही उथल-पुथल के बाद आज कुछ ऐसा हुआ जिसने सभी को हैरान कर दिया है. दरअसल, कृषि कानूनों (Farms Laws) की तारीफ करते-करते केंद्र सरकार ने इस कानून को वापस लेने का निर्णय लिया है.

गौरतलब है कि गुरु नानक जयंती के मौके पर तमाम लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर यही उम्मीदे लगाए बैठे थे कि वह किसी न किसी गुरुद्वारे जाएंगे. आगामी चुनाव के मद्देनजर अमृतसर जाने की संभावना भी जताई जा रही थी. इसके अलावा, ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही थीं कि वह फिर से खोले गए करतारपुर कारिडोर गुरुद्वारा दरबार साहिब भी जा सकते हैं. मगर अचानक से जब यह घोषणा हुई कि पीएम मोदी शुक्रवार सुबह 9 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन देंगे तो हर कोई हैरत में पड़ गया.

गुरु पर्व से जुड़े शुरुआती संबोधन के बाद जब पीएम मोदी ने खेती और किसानों के हित में अपनी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का ब्योरा दिये. तत्पश्चात उन्होंने कृषि कानूनों की पृष्ठभूमि को समझाना शुरू किया. इस दौरान उन्होंने उस बड़े तबके को धन्यवाद दिया, जिसने इन सुधारों का समर्थन किया. फिर वह किसानों के विरोध-प्रदर्शन वाले बिंदु पर आए.

आखिर में जब उन्होंने एलान किया कि कुछ असंगत प्रदर्शनकारी समूहों की इच्छा को देखते हुए सरकार इन तीनों कृषि कानूनों को निरस्त कर रही है, तो इस घोषणा ने सभी को आश्चर्य चकित कर दिया. लोगों को भरोसा ही नहीं हो रहा था. सरकार के इस रुख से खुश होने वाले भी यह नहीं समझ सके कि मजबूत फैसले लेने और अपने रुख पर अडिग रहने वाली सरकार यकायक कैसे झुक गई?

आपको बता दें कि 26 नवंबर को किसान आंदोलन (Farmers Protest) के एक साल पूरे होने वाले थे. जिसको लेकर बताया जा रहा है कि कानून वापसी के पीछे एक बड़ा कारण पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं. जिसमें पंजाब, यूपी और उत्तराखंड जैसे कृषि आधारित प्रदेश शामिल हैं.                     

सरकार के मुताबिक यह कानून किसानों के हित में हैं जबकि किसान कह रहे थे कि यह कुछ औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाए गए हैं. राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद बिल 27 सितंबर को कानून बन गए थे. इन कानूनों को लेकर दोनों पक्षों के क्या तर्क थे, आईए विस्तार से जानते हैं क्या हैं ये पूरा मामला-

क्या है एमएसपी और मंडी का मामला?

कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम लाने के पीछे सरकार का तर्क था कि इस कानून के तहत देश के किसानों को उनकी उपज बेचने के लिए अधिक विकल्प मिलेगा. साथी ही खरीद-फरोख्त पर टैक्स वसूली पर रोक लगेगी, लेकिन किसानों को लगा कि इसकी वजह से धीरे-धीरे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) खत्म हो जाएगा और कृषि उपज मंडी समिति (APMC) यानी मंडियां बंद हो जाएंगी.

दरअसल, इस डर के पीछे वजह ये थी इस बिल में सरकार ने मंडी से बाहर भी ट्रेड एरिया घोषित कर दिया था. लेकिन इस ट्रेड एरिया में एमएसपी मिलेगा या नहीं इस पर कुछ भी स्पष्ट नहीं था. यानी मंडी के अंदर लाइसेंसी ट्रेडर किसान से उसकी उपज एमएसपी पर लेते, लेकिन बाहर कारोबार करने वालों के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं थी.

सवाल ये है कि केंद्र सरकार ने बिल में कहीं भी नहीं लिखा था कि मंडियां खत्म हो जाएंगी. फिर किसानों को ऐसा क्यों लग रहा था?

दरअसल, मंडियों के अंदर कारोबार पर औसतन 6-7 फीसदी तक का मंडी टैक्स लगता है. यह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है. लेकिन सरकार ने नए कानून के तहत मंडियों के बाहर जो ट्रेड एरिया घोषित किया था उस पर कोई टैक्स नहीं लगने की बात की गई थी.

ऐसे में किसानों और व्यापारियों को लगता था कि टैक्स न लगने के कारण मंडी से बाहर कृषि कारोबार फले-फूलेगा, जबकि वहां पर एमएसपी जैसे दाम का कोई बेंच मार्क तय नहीं है. आढ़तिया अपने 6-7 फीसदी टैक्स का नुकसान न करके मंडी से बाहर खरीद करेंगे. इस फैसले से मंडी व्यवस्था धीरे-धीरे चरमरा जाएगी. सरकारी मंडियां बंद हो जाएंगी. इस तरह धीरे-धीर किसान बाजार के हवाले चला जाएगा. जहां उसकी उपज का सही रेट नहीं मिलेगा.

कांट्रैक्ट फार्मिंग के प्रावधान

सरकार का तर्क था कि मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा बिल के तहत होने वाली कांट्रैक्ट फार्मिंग (Contract farming) से किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिलेगा. खेती से जुड़ा जोखिम कम होगा. आय में वृद्धि होगी, क्योंकि दाम पहले से तय हो जाएगा, लेकिन इस प्रावधान से नाख़ुश किसानों ने सरकार को अपने निशाने पर ले लिया, क्योंकि इसमें किसानों के अदालत जाने का हक छीन लिया गया था. जिसको लेकर किसानों ने अपने हक़ के लिए आवाज उठा ही लिया.

वहीं, दूसरी तरफ किसानों और कांट्रैक्ट फार्मिंग करवाने वाली कंपनियों के बीच कोई विवाद होने पर एसडीएम ही फैसला करता. उसकी अपील सिर्फ जिलाधिकारी के यहां होती न कि अदालत में.

हालांकि, जमीन छिन जाने वाली आशंका बेबुनियाद थी, क्योंकि इसमें साफ लिखा गया था कि किसी रकम की वसूली के लिए कोई पक्ष किसानों की कृषि भूमि (Agri Land) के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पाएगा.

English Summary: Agriculture law bill returned after 532 days, happy atmosphere among farmers Published on: 19 November 2021, 07:12 PM IST

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