सुरों के जादूगर : किशोर कुमार

यह कब जन्में कब मरें, यह जानकारी तो आपको हर जगह मिल जाएगी। परंतु यह किसलिए जिए यह जानकारी आपको हम बताते हैं। किशोर कुमार जब तक जिए सिर्फ संगीत के लिए जिए। उनके पास मानों धुनों का ख़ज़ाना था। यूं तो उन्होने भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपने संगीत को अमर कर दिया परंतु स्वंय भी वह एक सदाबहार इंसान थे। किशोर कुमार के बड़े भाई दादा मुनी यानी अशोक कुमार एक बड़े अभिनेता थे और संगीत को लेकर बेहद रुचि लिया करते थे। संगीतकार एस.डी.बर्मन का अशोक कुमार के घर पर आना जाना लगा ही रहता था और दोनों एक लंबा समय साथ में गुज़ारते थे। एक दिन अशोक कुमार ने एस.डी.बर्मन से कहा कि - दादा यह मेरा छोटा भाई है किशोर, यह भी गाता है।

एस.डी.बर्मन ने कहा कि कुछ सुनाओ, इसपर किशोर कुमार ने उन्हें एक गीत गुनगुना के दिखाया । गीत के पूरा होने पर बर्मन साहब ने किशोर से कहा कि कल अपने भाई के साथ स्टूडियो आना वहीं मिलेंगे। बर्मन साहब ने किशोर की काबिलियत पहचान ली थी और वह उसे निखारने का कार्य कर रहे थे। अशोक कुमार ने किशोर को बर्मन साहब के साथ ही रख दिया।

वैसे किशोर कुमार अभिनेता बनने की तैयारी में थे और उन्होनें बतौर अभिनेता रहते हुए कुछ फिल्में भी की, कुछ हिट हुई तो कुछ औसत और किशोर कुमार खुद को एक बेहतर अभिनेता के रुप में निखार रहे थे परंतु किसे पता था कि उनकी असली मंज़िल संगीत थी। किशोर कुमार ने जब गीत गाना प्रारंभ किया तो उनकी आवाज़ उस दौर के गायकों से एकदम अलग थी और किशोर कुमार का अंदाज़ भी सबसे जुदा था। लोगों ने किशोर कुमार को बहुत प्यार दिया और देखते ही देखते वह समय भी आ गया जब ऐसी कोई फिल्म ही नहीं बची जिसमें किशोर कुमार का गीत न हो। लोग सिनेमा हॉल में किशोर कुमार के गीतों की वजह से जाने लगे, उनकी लोकप्रियता का कोई पैमाना नहीं था वह हर पैमाने को पार कर चुके थे।

तेरे जैसा यार कहां, कोरा कागज़ था, राहों पे रहते हैं, ये क्या हुआ और न जाने कितने ऐसे गीत जो लोगों की ज़ंबा पर चढ़ गए और आज तक चढ़े हुए हैं । किशोर कुमार दुनिया के लिए अपनी आवाज़ और संगीत का एक ऐसा खज़ाना छोड़ गए हैं जो न जाने कितनी पीढ़ियों के लिए एक बहुमूल्य विरासत है।

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