MFOI 2024 Road Show
  1. Home
  2. कविता

सोए हुए जज्बों को जगाना ही नहीं था

सोए हुए जज्बों को जगाना ही नहीं था ऐ दिल वो मोहब्बत का ज़माना ही नहीं था महके थे चराग़ और दहक उट्ठी थीं कलियाँ गो सब को ख़बर थी उसे आना ही नहीं था

KJ Staff
KJ Staff

सोए हुए जज्बों को जगाना ही नहीं था

सोए हुए जज्बों को जगाना ही नहीं था
ऐ दिल वो मोहब्बत का ज़माना ही नहीं था

महके थे चराग़ और दहक उट्ठी थीं कलियाँ
गो सब को ख़बर थी उसे आना ही नहीं था.

दीवारा पे वादों की अमरबेल चढ़ा दी
रूख़्सत के लिए और बहाना ही नहीं था.

उड़ती हुई चिंगारियाँ सोने नहीं देतीं
रूठे हुए इस ख़त को जलाना ही नहीं था.

नींदें भी नजर बंद हैं ताबीर भी क़ैदी 
ज़िंदाँ में कोई ख़्वाब सुनाना ही नहीं था.

पानी तो है कम नक़्ल-ए-मकानी है ज़्यादा
ये शहर सराबों में बसाना ही नहीं था.

गुलाम मोहम्मद क़ासिर

स्त्रोत : कविता कोष

English Summary: Gulam Mohammad Kasir Published on: 27 May 2018, 01:35 IST

Like this article?

Hey! I am KJ Staff. Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

Share your comments

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें. कृषि से संबंधित देशभर की सभी लेटेस्ट ख़बरें मेल पर पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें.

Subscribe Newsletters

Latest feeds

More News