टैक्टोना ग्रैंडिस की खेती दे लाखों का फायदा...

टैक्टोना ग्रैंडिस लकड़ी का राजा कही जाने वाली वर्बेनेसी परिवार से संबंध रखती है जिसको आम भाषा में लोग सागौन की लकड़ी के नाम से जानते हैं। संस्कृत में इसे शाक कहते हैं। सागौन का पेड़ बहुत लंबा होता है और अच्छी किस्म की लकड़ी पैदा करता है। यही वजह है कि इसकी देश-विदेश में अच्छी मांग है। सागौन से बना सामान अच्छी क्वालिटी का होता है और लंबे समय तक खराब नहीं होता है। यही वजह है कि सागौन की लकड़ी से बने सामान की मांग घरों व दफ्तरों में बनी रहती है।

कम रिस्क अच्छा मुनाफा

सागौन के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए आमतौर पर सागौन की अच्छी किस्म की ही खेती की जाती है। इसमें कम रिस्क लेकिन मुनाफा बहुत अच्छा होता है। लगभग 14 वर्षों में सागौन की लकड़ी परिपक्व हो जाती है। अच्छी सिंचाई, उपजाऊ मिट्टी के साथ वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए एक पेड़ से 10-15 क्यूबिक फीट लकड़ी ली जा सकती है। इस दौरान पेड़ के मुख्य तने की लंबाई 25-30 फीट, मोटाई 35-45 इंच तक होती है।

एक एकड़ में 400 पौधे

एक एकड़ में लगभग 400 अच्छी गुणवत्ता के आनुवांशिक पेड़ तैयार किए जा सकते हैं। इसके लिए सागौन के पौधों के बीच 9/12 फटी का अंतराल रखना होता है।

सागौन के प्रकार - भारत में सागौन कई प्रकार में पाई जाती है।

  1. नीलांबर सागौन (मालाबार)
  2. दक्षिणी और मध्य अमेरिकन सागौन
  3. पश्चिमी अफ्रीकन सागौन
  4. अदिलाबाद सागौन
  5. गोदावरी सागौन
  6. कोन्नी सागौन

उपयुक्त समय

सागौन के लिए नमी और ऊष्णकटिबंधीय वातावरण जरूरी होता है। यह अधिक तापमान को आसानी से बर्दाश्त कर लेता है। सागौन के बेहतर विकास के लिए उच्चतम 39-44 डिग्री सेंटीग्रेड और निम्नतम 13-17 डिग्री सेंटीग्रेड उपयुक्त है। 1200 से 2500 मिलीमीटर बारिश वाले इलाके में इसकी अच्छी पैदावार होती है। इसकी खेती के लिए बारिश, नमी, मिट्टी के साथ-साथ रोशनी और तापमान भी अहम भूमिका निभाता है।

अच्छी पैदावार के लिए जलोढ़ मिट्टी

सागौन की अच्छी पैदावार के लिए जलोढ़ मिट्टी में इसकी खेती करनी चाहिए। इसमें चूना, पत्थर, शीष्ट, शैल, भूसी और कुछ ज्वालामुखीय चट्टानें जैसे कि बैसाल्ट मिला हो। इसके उलट सूखी बलुवाई, छिछली, अम्लीय 6.0 पीएच और दलदलीय मिट्टी में पैदावार बुरी तरह प्रभावित होती है। मिट्टी में अम्लता की मात्रा ही खेती के क्षेत्र और विकास को निर्धारित करती है। सागौन के लिए मिट्टी की अम्लता का रेंज 5.0-8.0 से 6.5-7.5 के बीच होता है।

कैल्शियम की भूमिका

सागौन की खेती कहां होगी इसके निर्धारण के लिए कैल्शियम की मात्रा अहम भूमिका निभाती है। कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, नाइट्रोजन और आर्गेनिक तत्वों से भरपूर मिट्टी सागौन के लिए सबसे उपयुक्त है। कई शोध में पाया गया है कि सागौन के विकास और लंबाई के लिए कैल्शियम की अधिक मात्रा बेहद जरूरी है। यही वजह है कि सागौन को कैलकेरियस प्रजाति का नाम दिया गया है। उदाहरणार्थ जहां सागौन की अधिकता होगी वहां कैल्शियम उतनी ही ज्यादा मात्रा में होगा।

नर्सरी में पौधरोपण

सागौन ही नर्सरी के लिए हल्की ढालयुक्त सूखी हुई बलुई मिट्टी वाला क्षेत्र जरूरी होता है। इसकी नर्सरी की क्यारी 1.2 मीटर की होनी चाहिए। इसमें 0.3 मीटर से 0.6 मीटर की जगह छोड़ी जानी चाहिए। क्यारियों की लाइन के लिए 0.6 से 1.6 मीटर की जगह छोड़ी जाती है। जानकारी के लिए बता दें कि एक क्यारी में 400-800 तक पौधे लगाए जा सकते हैं। इसके लिए क्यारी की खुदाई 0.3 मीटर तक करें और जड़, खूंटी व कंकड़ को निकालें। जमीन पर पड़े ढेले को अच्छी तरह तोड़ कर मिलाएं। एक माह के लिए इस मिट्टी को खुला छोड़ दें। एक माह बाद क्यारी में बालू और जैविक खाद भरें।

जमीनीस्तर

नमी वाली इलाकों में जल भराव से बचने के लिए क्यारी को 30 सेंमी. तक ऊंचा उठाया जाता है। वहीं सूखे इलाके में क्यारी को जमीनी स्तर पर रखा जाता है। खासतौर से बेहद सूखे इलाकों में जहां 750 एमएम बारिश होती है वहां पानी में थोड़ी डूबी क्यारियां अच्छा परिणाम देती हैं। एक मानक क्यारी से जो कि 12 मीटर की होती है उसमें लगभग 3 से 12 किलो बीज का इस्तेमाल होता है।

रोपाई के तरीके

फैलाकर या छितराकर क्रमिक या डिबलिंग तरीके से 5-10 फीसदी अलग रखकर बुवाई करें। जानकारी के लिए बता दें कि डिबलिंग या क्रमिक तरीके से बुवाई अधिक फायदेमंद होती है। यह अधिक मजबूती के साथ पैदावार भी अधिक देती है। सागौन की खेती के लिए शेड की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि सूखे इलाकों में अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि इसमें खरपतवार भी नहीं पनपते हैं।

जगह का महत्व

सागौन का रोपन 2x2 मीटर, 2.5x2.5 मीटर या 3x3 मीटर के बीच होना चाहिए। इसके लिए 4x4 मीटर या 5x1 मीटर का अंतराल रखना जरूरी है।

सावधानियां

बढ़, लैटेराइट या उसकी बजरी, चिकनी मिट्टी, काली कपासी मिट्टी, बलुई और बजरी सागौन के पौधे के लिए अच्छा नहीं होता है। पौधरोपण के लिए पूरी जमीन की अच्छी जुताई, एक लेवल में करना जरूरी होता है। पौधरोपण की जगह पर सही दूरी पर एक सीध में गड्ढा कर खुदाई जरूरी होता है।

 सागौन रोपण के लिए जरूरी बातें

  • पूर्व अंकुरित खूंटी या पॉली पॉट का इस्तेमाल करें।
  • 45x45x45 सें.मी. की नाप के गड्ढे की खुदाई करें।
  • मिट्टी में मसाला, कृषि क्षेत्र की खाद और कीटनाशक को दोबारा डालें।
  • बजरी वाले इलाके में गड्ढे में जैविक खाद का इस्तेमाल करें।
  • पौधरोपण के समय गड्ढे में 100 ग्राम खाद मिलाएं।
  • मिट्टी की उर्वरता को देखते हुए विभिन्न मात्रा में खाद मिलाते रहें।
  • सागौन की खेती के लिए सबसे अच्छा मौसम मानसून का होता है।
  • पहली बारिश के वक्त पौधे की अच्छी बढ़त के लिए निराई-गुड़ाई का भी काम करते रहना चाहिए। पहले साल में एक बार, दूसरे साल में दो बार और तीसरे साल में एक बार निराई-गुड़ाई पर्याप्त है।
  • पौधरोपण के बाद मिट्टी की तैयारी को अंतिम रूप दें और जहां आवश्यकता हो वहां सिंचाई की व्यवस्था करें।
  • शुरूआती सालों में खरपतवार को हटाने का काम करना सागौन की अच्छी बढ़त को सुनिश्चित करता है।
  • सागौन के पेड़ की वृद्धि और विकास के लिए सूर्य की पर्याप्त रोशनी जरूरी है।

खरपतवार नियंत्रण

सागौन के पौधरोपण के शुरूआती समय में खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी है। 2-3 सालों में खरपतवार हटाने का अभियान चलाते रहना चाहिए। पहले साल में तीन बार नियमित अंतराल पर खरपतवार, दूसरे साल में दो बार व तीसरे साल में एक बार खरपतवार नियंत्रण करना जरूरी है।

सिंचाई तकनीक

शुरूआती दिनों में पौधे की वृद्धि के लिए सिंचाई बेहद अहम है। खरपतवार नियंत्रण जितना जरूरी है उतनी ही जरूरी सिंचाई भी है जो 3,2,1 के अनुपात में होना चाहिए। इसके साथ ही मिट्टी का भी काम चलते रहना चाहिए। अगस्त और सितम्बर महीने में दो बार खाद डालना चाहिए। लगातार तीन साल तक प्रत्येक पौधे में 50 ग्राम एनपीके 15:15:15 के अनुपात में डाला जाना चाहिए। नियमित तौर पर सिंचाई और पौधे की छंटाई से तने की चैड़ाई बढ़ जाती है। यह सब कुछ पौधे के शीर्ष भाग के विकास पर निर्भर करता है जैसे कि प्रति एकड़ वृक्षों की संख्या में कमी।

13 से 40 डिग्री में बढ़ते हैं पौधे

सागौन की खेती में पौधों की बढ़वार 13-40 डिग्री तापमान पर अच्छी होती है। हर वर्ष 1250 से 3750 एमएम की बारिश इसकी खेती के लिए पर्याप्त होती है। अच्छी गुणवत्ता के लिए साल में 4 माह सूखा मौसम चाहिए। इस दौरान 60 एमएम से कम बारिश लाभदायक है। पेड़ की बीच अंतर, तने की काटछांट की टाइमिंग में अगर देरी की गई या फिर पहले या अधिक काटछांट की तो विकास पर फर्क पड़ता है।

5-10 में होती है कटाई

सागौन के पौधे की कटाई-छटाई पौधरोपा के 5-10 साल के बीच करनी चाहिए। जगह की गुणवत्ता और पौधों के बीच अंतराल को भी ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। अच्छी जगह और नजदीकी अंतराल 1.8x1.8 मीटर और 2x2 मीटर वाले पौधों की पहली और दूसरी कटाई के बाद इसकी कटाई-छंटाई 5वें और 10वें साल पर की जाती है।

पौधरोपण के बीच लगाएं अंतर फसल

पहले दो सालों के बीच सागौन की खेती के बीच में अंतर फसल लगाना चाहिए। सागौन की खेती के बीच में आमतौर पर गेहूँ, धान, मक्का, तिल और मिर्च के साथ-साथ सब्जी की खेती की जाती है। कुछ फसल जैसे कि गन्ना, केला, जूट, कपास, कद्दू, खीरा की खेती सागौन के साथ नहीं की जाती है।

समस्याएं

निष्पत्रक और दीमक जैसे कीट बढ़ रहे सागौन के पौधे को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। सागौन के पौधे में आमतौर पर पाॅलिपोरस जोनालिस लग जाता है। यह पौधे की जड़ों को गला देता है। गुलाबी रंग की फफूंद पौधे को खोखला कर देती है। ओलिविया टेक्टोन व अनसिनुला टेक्टोन की वजह से पाउडर जैसी फफूंद पैदा हो जाती है जिससे असमय पत्ता झड़ने लगता है।

उपाय

पौधे की सुरक्षा के लिए रोगनिरोधी उपाय करना जरूरी है। केलोट्रोपिस प्रोसेरा, डेट्यूरा मेटल और अजादिराचता इंडिका के ताजा पत्तों के रस सागौन के पौधे में लगने वाले रोगों से लड़ने में बेहद कारगर हैं। जैविक और अकार्बनिक खाद की तुलना में हानिकारक कीटों को इससे पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • काटे जाने वाले पेड़ पर चिह्न लगाएं और नंबर अंकित करें
  • क्षेत्रीय वन अधिकारी से संपर्क करें और उन्हें पूरा ब्यौरा दें
  • क्षेत्रीय वन विभाग जांच के लिए अपने अधिकारी भेजकर रिपोर्ट तैयार करवाएगा
  • काटछांट या कटाई के बारे में स्थानीय वन अधिकारी को ब्यौरेवार रिपोर्ट भेजें
  • अनुमति मिलने के बाद ही कटाई करें
  • इसके लिए 3000 फुट की ऊंचाई के जंगल अधिक उपयुक्त हैं।

10-15 क्यूबिक फीट लकड़ी

14 वर्षों के दौरान एक सागौन का पेड़ 10-15 क्यूबिक फीट लकड़ी देता है। सागौन का मुख्य तना 25-30 फीट ऊंचा, 35-45 इंच मोटा होता है। एक एकड़ में उन्नत किस्म में लगभग 400 सागौन के पेड़ लगाए जा सकते हैं।

विपणन

सागौन के लिए बाजार में बेहद मांग है। इसकी लकड़ी को बेचना बेहद आसान है। इसके लिए बायबैक योजना के अलावा स्थानीय टिंबर मार्केट भी होते हैं। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद मांग होने की वजह से सागौन की खेती बेहद फायदेमंद है।

कहां पाया जाता है सागौन?

सागौन के वन भारत, बरमा, थाइलैंड, फिलिपिन्स, जावा, मलाया प्रायद्वीप, झांसी, असम, पंजाब, मप्र के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। बरमा में 80 वर्ष की उम्र के पेड़ का घेरा 2 फुट व्यास का हो जाता है जबकि भारत में इतना मोटा होने में 200 वर्ष का समय लग सकता है। भारत के ट्रावनकोर, कोचीन, मद्रास, कुर्ग, मैसूर, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के जंगलों के सागौन की उत्कृष्ट लकड़ियां अधिकांश्ज्ञ बाहर चली जाती हैं। थाईलैंड की लकड़ी भी पाश्चात्य देशों में चली जाती है।

रेल के डिब्बों में सागौन

सागौन की लकड़ी का इस्तेमाल उत्कृष्ट कोटि के जहाजों, नावों, बोगियों, भवनों की खिड़कियों और चैखटों, रेल के डिब्बों, फर्नीचर आदि बनाने में किया जाता है। इसकी लकड़ी बहुत अल्प सिकुड़ती है लेकिन मजबूत बहुत होती है। इस पर आसानी से पाॅलिश चढ़ जाती है जिससे यह और अधिक आकर्षक हो जाती है।   

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