बेल वाली सब्जियों में कीट प्रबंधन

वेल वाली सब्जियों के अंतर्गत घीया (लौकी), तोरई, ककड़ी, करेला, टिण्डा, काशीफल, पेठा, खरबूज व तरबूज इत्यादि फसलों की खेती की जाती है। इन फसलों की खेती ग्रीष्म, बरसात तथा जायद मौसम में सफलतापूर्वक करके कृषकों द्वारा अच्छी आमदनी अर्जित की जाती है। इन फसलों में उत्पादन के दौरान अनेकों प्रकार के कीट फसलों को क्षति कर उत्पादन क्षमता को प्रभावित करते हैं।

अतः इन फसलों में समेकित कीट प्रबंधन तकनीकी को अपनाकर उचित समय पर कीट प्रबंधन करके फसलों को आर्थिक नुकसान से बचाकर अच्छा मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।

प्रमुख कीट

कद्दू का लाल कीट ( लाल सूण्डी)

इस कीट के प्रौढ़ बेलनाकार, जिनका ऊपरी रंग गेरूआ, लाल, पीला होता है। इस कीट की ग्रब व प्रौढ़ दोनों ही अवस्था में फसलों को हानि पहुंचाती है। ग्रब अवस्था पौधों की मुलायम जड़ों को खुरच-खुरच कर खाती है जबकि प्रौढ़ कीट पौधों की मुलायम कालिकों व पत्तियों को काट कर खाते हैं। इससे पौधों की वृद्धि रूक जाती है तथा पत्तियाँ छिद्रयुक्त दिखाई देती हैं। इस कीट का प्रकोप मध्य फरवरी से मध्य अप्रैल तक तथा जून से अगस्त-सितम्बर तक जारी रहता है।

प्रबंधन

फसलों की बुवाई से पहले खेतों की गहरी जुताई करें तथा पूर्व फसल के अवशेषों या कीट संक्रमित बेलों को उखाड़कर मिट्टी में दबा दें।

1. फसल में कीट संक्रमण दिखाई देने पर कीटनाशी मैलाथियॉन 5 प्रतिशत धूल (पाउडर) या मिथाइल पैराथियॉन 2 प्रतिशत धूल 10-12 किलोग्राम प्रति एकड़ फसल पर शाम के समय बुरकाव करें।

2. कीटनाशी- (मैलाथियॉन 50 ई.सी या साइपमैथ्रिन 25 ई.सी या फैनवलरेट 20 ई.सी) 50-100 मि.लि. मात्रा को प्रति 100 लिटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ फसल पर शाम के समय छिड़काव करें।

3. फसल में इन कीटों की ग्रब अवस्था जमीन में रहकर जड़ों को काटती हैं जिनकी रोकथाम हेतु क्लोरोपाइरीफॉस 20 ई.सी. 1.5 लिटर मात्रा को फसल की बुवाई के एक माह बाद सिंचाई जल के साथ इस्तेमाल करें जिससे कि पौधों की जड़ों में मौजूद ग्रब-लटों को नष्ट किया जा सके।

4. इन कीटों की प्रौढ़ अवस्था को कीट पकड़ने के हस्त जालों द्वारा पकड़कर आसानीपूर्वक नष्ट किया जा सकता है। यह प्रक्रिया सुबह शाम के समय अपनाकर कीटों की संख्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

फल मक्खी

यह कीट विकसित मुलायम फलों को क्षति पहुंचाते हैं। फल मक्खी का प्रकोप मार्च से- अक्टूबर माह तक जारी रहता है। इन कीटों की मादा मक्खी अपने अण्डे रोपक को मुलायम फलों के गूदे में घुसाकर उनमें अण्डे देती है जिनसे 1-2 दिन में (गिडार) फलों के अंदर ही निकलकर गूदे को खाकर विकसित होती हैं तथा फलों के अंदर ही अपशिष्ट पदार्थ छोड़ती हैं जिससे फल सड़ने लगता है। फलों के क्षतिग्रस्त भाग से तीव्र गंध आने लगती है तथा फल टेड़े- मेड़े विकृतियुक्त हो जाते हैं जिससे फलों की गुणवत्ता खराब होती है जो कि विपणन योग्य नहीं रहते।

प्रबंधन

1. वयस्क/प्रौढ़ मक्खी को आकर्षित करने के लिए मिथाइल यूजी नॉल गंधपाश ट्रैप 8-10 की संख्या में प्रति एकड़ फसल में लगाएं, जिनके प्रयोग से फल मक्खी कीटों को आसानीपूर्वक नष्ट किया जा सकता है।

2. फल मक्खी के संक्रमण से क्षतिग्रस्त फलों को खेत में एकत्रित कर मिट्टी में गहराई पे दबा दें। अतः इधर-उधर फेंककर खुले में न छोड़े अन्यथा मैगंट कृमिकोष अवस्था से गुजर कर फलमक्खी कीटों की संख्या में वृद्धि होने से इस कीट का प्रकोप तेजी से होने लगता है।

3. समय पर खेतों की निराई-गुड़ाई करते रहें। विशेषकर शुरू की अवस्था में जिससे कि बेलों के आसपास भूमि में पड़ी, दबी कृमि कोष अवस्था में धूप तथा भक्षी व परजीवी कीटों द्वारा नष्ट किया जा सकता है।

4. फल मक्खी कीट दिन व रात के समय मक्का के पौधे पर शरण लेते हैं इसलिए बेल वाली फसलों के खेतों के चारों ओर 3-4 पंक्तियों में मक्का फसल लगाएं तथा इसी तरह 50 मीटर की दूरी या बेलवाली फसलों के मध्य मक्का फसल की पंक्तिंया/कतारें लगाएं। जब मक्का के पौधों पर फल मक्खी कीट की उपस्थिति दिखाई दे तब केवल मक्का के पौधों पर मैलाथियॉन जैसे कीटनाशकों का छिड़काव कर इस प्रकार इन सब्जियों पर कीटनाशकों के कमतर प्रयोग से सब्जियां कीटनाशी रहित व पौष्टिक उपलब्ध होंगी।

5. विष प्रलोभन का प्रयोग- एक किलोग्राम गुड़ को 1.0-1.5 लिटर पानी में घोलकर उसमें 1-2 मि. लि. कीटनाशी मैलाथियॉन मिलाएं। अब इसे घोलकर 10-12 जगहों पर फसल के मध्य अलग-अलग दूरी पर रखें। फल मक्खियां इस घोल की तरफ आकर्षित होंगी और इसे पीने से नष्ट होंगी।

6. कीट संक्रमण व क्षति स्तर फलों के आर्थिक क्षतिस्ता के देखते हुए कीटनाशी मैलाथियाॅन 50 ई.सी 400 मि.लि. या कार्बारिल पाउडर 400 ग्राम को 200 लिटर पानी में घोल कर शाम के समय प्रति एकड़ फसल में छिड़काव करें।

पत्तियों का सुरंगी कीट चेंपा हरा तेला व माइट:

ये कीट आकार में छोटे होते हैं। इनके शिशु व प्रौढ़ दोनों ही अवस्था में पौधों के मुलायम भागों, पत्तियों तथा कलिकाओं का रस चूसकर कमजोर बना देते हैं। पत्तियों के सुरंगी कीट पत्तियों के मध्यशिरा में अण्डे देती है जिससे बारीक गिडार निकलकर पत्तियों की दोनों सतह पर टेड़ी-मेढ़ी लाईनें दिखाई देने लगती हैं। फसलों में इन कीटों का प्रकोप लगभग पूरे फसल अवधि के दौरान जारी रहता है।

प्रबंधन

1. फसल क्षेत्र को खरपतवार रहित रखें।

2. हरा तेला व सुरंगी की मक्खियों को नष्ट करने के लिए लाइट-ट्रैप का फसलों में प्रयोग करें। अतः रात को फसल क्षेत्र में लाइट-ट्रैप जलाएं

3. कीटनाशी डायमेंथोएट 30 ई.सी या मैलाथियॉन 50 ई.सी 200 मि.लि. मात्रा को 200 लिटर पानी में घोल के शाम के समय प्रति एकड़ फसल क्षेत्र में छिड़काव करें।

नोट: फलों के विपणन के कम से कम 10 दिन सब्जी पहले रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव बंद कर दें। कीटों का प्रकोप जारी रहने की अवस्था में सुरक्षित कीटनाशकों/वनस्पति कीटनाशकों का ही फसलों में प्रयोग करें। कीटनाशी छिड़काव के एक सप्ताह तक फलों-सब्जियों की बिक्री या उपयोग में न लाएं जिससे कि कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से बचा जा सकें।

 

भरत सिंह, विशेषज्ञ (पौध संरक्षण)
कृषि विज्ञान केंद्र
(भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान)
शिकोहपुर गुड़गांव
हरियाणा

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