ऊँटों को बचाने के लिए अहम कदम

भारत में पशुपालन व्यवसाय एक बड़ी हिस्सेदारी रही है| ऊंटपालन इसी का एक अहम हिस्सा है| ऊंट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है | राजस्थान में ऊंट को ठीक उसी तरह पाला जाता है जैसे कि दूसरे राज्यों में दूध के लिए गायें और भैंसों को पाला जाता है| इस राज्य के लोग ऊंट से भी उसी तरह से प्यार करते है, जैसे कि दूसरे पशुओं से| आज जब भारत विश्व में दूध उत्पादन में सबसे ऊपर है, ऐसे में ऊंट की प्रजाति को बचाना किसी चुनौती से कम नही रह गया है|

यह एक ऐसा पशु है, जिसका इतिहास राजाओं-महाराजों के काल से भी पुराना है| भारत के राजस्थान राज्य के रेगिस्तान में ऊँटों की संख्या सबसे ज्यादा है| जबकि ऊंट राजस्थान का राज्य पशु है, ऐसे में इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है|प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक साल 2003 मे देशभर में ऊँटों की संख्या 7 लाख से अधिक थी| साल 2007 में 4,98,000 और साल2012 में 4,00,000 के आस पास थाद्य लेकिन धीरे- धीरे यह आंकड़ा तेजी का सात कम होता गया| आज यह संख्या मात्र 3 लाख से अधिक रह गयी है| यानी पिछले 14 सालों में 42 प्रतिशत रेगिस्तान के जहाज की संख्या में कमी आई है| लगभग4,00,000 ऊंट कम हुए है| यह हकीकत में एक चिंता का विषय है, ऊंट का इस्तेमाल राजा-महाराजा पहले युद्ध के लिए करते थे, लेकिन इसके बाद ऊंट का इस्तेमाल अन्य कामों में भी किया जाने लगा| ऊंट को मुख्य रूप से बोझा धोने, कृषि कार्यों में किया जाता है| इसके अलावा ऊंट के दूध का इस्तेमाल रोजमर्रा में भैंस व गायें के दूध की जगह पर भी किया जाता है| ज्ञात रहे ऊंट की कई प्रजातीयां भारत में मौजूद है|

भारत में ऊंट की मुख्य प्रजातियाँ भारत में ऊंट की 9 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती है| यह प्रजातियाँ भारत के अलग-अलग राज्य में पाई जाती है| इनमें मुख्य प्रजाति इस प्रकार है| बीकानेरी, जैसलमेरी, जालोरी, मारवाड़ी, मेवाड़ी मुख्य रूप से राजस्थान में पाई जाती है, जबकि कच्छी और खरई प्रजाति गुजरात में पाई जाती है| इसके अलावा मध्य प्रदेश में मालवी और हरियाणा में मेवाती प्रजाति पाई जाती है| इनमें सबसे अहम है बीकानेरी और जैसलमेरी मुख्य प्रजातियाँ है| इन प्रजातियों के कुछ ऊंट दूध देने और बोझा ढोने दोनों के कार्यों के लिए उपयुक्त होते है| इसमें कच्ची ऊंट दूध देना और वजनी कार्य दोनों में काम आता है| जबकि बीकानेरी ऊंट वजन ढोने और जैसलमेरी ऊंट दौड़ में काम आता है| इसके अलावा कश्मीर में दो कूब वाला ऊंट भी पाया जाता है| यह ऊंट पर्यटकों के लिए आकर्षण के लिए होता है| इसकी संख्या में दुगुना वृद्धि हुयी है|

इस समय सफेद ऊँटों की प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है| बीकानेरी और जैसलमेरी प्रजाति के सफेद ऊँटों की संख्या बहुत कम हो गयी है| जहाँ पर राजस्थान के जिलों में इन ऊँटों की संख्या 2000 के आस-पास हुआ करते थे आज इनकी संख्या 400 से 500 के मध्य ही रह गई है| यह सफेद ऊंट देखने में बहुत सुंदर लगते है और ये मालवाहक और दुधारू दोनों काम करते है|विलुप्त होने का कारण ऊँटों के विलुप्त होने का मुख्य कारण बड़ी मात्रा में इनका कटान है| कई राज्यों में बड़े पैमाने पर ऊँटों का बड़े स्तर पर कटान होना है| इनके मांस को भारी मात्रा में दूसरे देशों में निर्यात किया जाता है| इसके अलावा दुसरे राज्यों में भी ऊँटों को बेचा जाता है|

रेगिस्तान के जहाज को बचाने के लिए सरकार की मुहीम जबकि ऊंट राजस्थान का राज्यपशु है, इसको बचने के लिए सरकार ने एक पूरे राज्य में कुछ नियम इनको बचाने की मुहीम के तहत लागू किये हैंद्य

1. दूसरे राज्यों में ऊँटों के बेचने पर प्रतिबन्ध रू सरकार ने इनको दुसरे राज्यों में ऊंट के बेचने पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगा दिया हैद्य इससे कटान के लिए दूसरे राज्यों में जाने वाले ऊंट पूरी तरह से सुरक्षित हो गए है|

2. ऊंट पालन को बढ़ावा रू सरकार राज्य में ही ऊंट पालन को बढ़ावा देने पर कार्य कर रही है| इसके तहत जो पशुपालक ऊंट पालते है| सरकार की ओर से उनको अनुदान राशी दी जाती है|

3. राष्ट्रीय ऊंट अनुसन्धान केंद्र बीकानेर द्वारा भी इनके प्रजनन को बढाने के लिए कार्य कर रही हैद्य राष्ट्रीय ऊंट अनुसन्धान केंद्र द्वारा बड़े स्तर परइनको बचाने के लिए सोशल मीडिया कैम्पेन, प्रदर्शनी, डोक्युमेंट्री आदि के जरिए मुहीम चला रही है|

4. ऊंट के दूध का कलेक्शन सरकारी डेरी आरसीडीऍफ द्वारा किया जाता है

सरकार द्वारा अन्य तरीको से भी ऊंट पालन को बढ़ावा दिया जा रहा हैद्य इसके कुछ मुख्य तथ्य इस प्रकार है|

1. सरकार द्वारा इनके उत्थान के लिए राजस्थान ऊंट बिल पारित किया गयाद्य जिसके तहत सरकार द्वारा ऊंट का सरकारी पंजीकरण अनिवार्य है|

2. ऊंट बीमा को भी को भी सरकार द्वारा बढ़ावा दिया गया द्य यानि ऊंट पलक को अपने पशु का बीमा करना आवश्यक है|

3. ऊंट पालने पर उसके पालक को सरकार के पशुपालन विभाग में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है| इसके लिए सरकार गर्भवती मादा ऊंटनी के रजिस्ट्रेशन पर 3000 रूपये देती है| उसके बाद उसके बच्चे को एक महीने का हो जाने पर दूसरी किस्त 3000 रूपये देती हैद्य उसके बाद बच्च्चे की आयु 9 माह होने पर तीसरी किस्त 4000 रूपये देती है|

पशुपालको को रही है समस्या ऊँटों को पालने वाले किसानों को काफी समस्याए हो रही है| कोटा के एक ऊंट पालक किसान कहते है कि सबसे बड़ी समस्या तो हमारे सामने चारे की है| क्योंकि घास के मैदान राज्य में बहुत कम है इसलिए सभी पशु छह महीने दुसरे राज्य में रहते है और छह महीने अपने राज्य में इसके अलावा सरकार द्वारा लगाए गए दुसरे राज्य में बेचने के प्रतिबन्ध से व्यवसाय पर फर्क पड़ा है| क्योंकि पहले इनको बेचकर पशुपालको को कमी हो जाती थी| एक ऊंट की कीमत लगभग 50,000 से 70,000 तक बेचा जाता था वही इनके बच्चे की 20000 से 50000 रूपए तक कीमत मिल जाती थी| ऊंट पालकों का कहना है की उनके पास इसके अलावा कोई और व्यवसाय का साधन नहीं है| सरकार द्वारा दिया जाने वाले अनुदान में ऊँटों को पालने का भी पूरा नहीं हो पाता है|

निष्कर्ष : ऊंट जबकि बहुउपयोगी है, इसके लिए इनकी विलुप्त होती प्रजाति को बचाना बहुत जरुरी है| इसके लिए एक नेशनल पार्क की आवश्यकता है| जिस तरह से इनकी संख्या कम हुयी है इसको देखकर तो लगता है की आने वाले 15 सालों में ऊंट पूरी तरह से विलुप्त हो जायेंगे| इसके लिए सरकार को कुछ और कदम उठाने चाहिए| इसी के साथ चाहिए की ऊंटपालको को हो रही परेशानी को ध्यान में रखते हुए अनुदान बढाने या देने के बजाए आत्मनिर्भर बनाया जाए| जिससे की ऊंटपालक ऊंट पालने के साथ-साथ अन्य लघु उद्योग भी कर सके| इसी के साथ इनके प्रजनन को और अधिक बढ़ाने के लिए अनुसन्धान पर जोर दिया जाए|

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